।।भोर वंदन।।
"जानकी जीवन, विजयदशमी तुम्हारी आज है,
दीख पड़ता देश में कुछ दूसरा ही साज है।
राघवेंद्र! हमें तुम्हारा आज भी कुछ ज्ञान है,
क्या तुम्हें भी अब कभी आता हमारा ध्यान है?"
मैथिलीशरण गुप्त
त्योहारों बीच कुछ पल रचनात्मक रूप से..आनन्द लिजिए लिंक पर क्लिक कर..✍️
विजयादशमी को दशहरा क्यों कहते हैं
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एक दशहरा ऐसा भी हो
जल जाए हर कलुष हृदय से,
अहंकार का मुकुट गिरे फिर
भूमि पर श्री राम के शर से !
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बारिश का मौसम है सर
बोर हो गया हूँ पढ़-पढ़कर
जल्दी से अब छुट्टी कर
झींगुर ने भी दौड़ लगाई
सबने हाँ में हाँ मिलाई
चलो भाइयों मौज मनाएँ
हम सब बारिश में नहाएँ..
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बहारें भी आ आकर लौट गयीं
तेरा इंतज़ार करते करते
खोया चॉंद से चेहरे का नूर
तेरा इंतज़ार करते करते ।..
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।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह ' तृप्ति '..✍️

सुंदर अंक
जवाब देंहटाएंआभार
सादर वंदन