सादर अभिवादन
आज संजय भाई को होली मनाने की छूट दे दी
आज संजय भाई को होली मनाने की छूट दे दी
चुनिन्दा रचनाएँ कुछ यूँ कह रही है...
ठूंठ सिखाये जीवनियाँ
बन्ना सा वन
जमे बन ठनके
बाँध मुरेठा केसरियाँ
चीथड़े पोशाकें
बदरंग चेहरे
सतरंगी बनाए
जोश फगुनियाँ
भेज कनकनियाँ
आये कुनकुनियाँ
शुरू हुए उठंगुनियाँ
सोचि सोचि राधे हारी, कैसे रंगे बनवारी
कोऊ तौ न रंग चढ़े, नीले अंग वारे हैं |
बैजनी बैजन्तीमाल, पीत पट कटि डारि,
ओठ लाल लाल, श्याम, नैन रतनारे हैं |
हरे बांस वंशी हाथ, हाथन भरे गुलाल,
प्रेम रंग सनौ कान्ह, केस कजरारे हैं |
केसर अबीर रोली, रच्यो है विशाल भाल,
रंग रंगीलो तापै मोर-मुकुट धारे हैं ||
सुनो !! दुराचारी मानव !!
कटी टांगों से भी नहीं दे पाऊँगा श्राप
खुश रहना !!
पशु हूँ, पशु ही रहूँगा !!
हो सके तो पश्चाताप के दो आंसू ही कर देना मुझे समर्पित !!
रंग गुलाल
अम्बर हुआ लाल
मचा धमाल !
थी जुबाँ मुरब्बे सी होंठ चाशनी जैसे
फिर तो चन्द लम्हे भी हो गये सदी जैसे
चाँदनी से तन पर यूँ खिल रही हरी साड़ी
बह रही हो सावन में दूध की नदी जैसे
और ये है शीर्षक रचना का अंश
जिन मनहूसों को नहीं आती हँसी पसंद
हुए उन्हीं की कृपा से, हास्य-सीरियल बंद
हास्य-सीरियल बंद, लोकप्रिय थे यह ऐसे
श्री रामायण और महाभारत थे जैसे
भूल जाउ, लड्डू पेड़ा चमचम रसगुल्ले
अब टी.वी.पर आएँ काका के हँसगुल्ले
आज्ञा दें और सुनें ये गीत
दिग्विजय




