सादर अभिवादन,,
बिना किसी ताम-झाम के
बिना किसी ताम-झाम के
सीधे चलें...आज..
शांति का संदेश दे रहा
जो भारत सारी दुनिया को
स्वयं अशांत क्यों हो बैठा ?
प्रीत की डोर से बांधा जिसने
दुनिया के हर कोने को
स्वयं दुविधा में क्यों पैठा ?
मूर्ख लोग ईर्ष्यावश दुःख मोल ले लेते हैं।
द्वेष फैलाने वाले के दांत छिपे रहते हैं।।
ईर्ष्यालु व्यक्ति दूसरों की सुख सम्पत्ति देख दुबला होता है।
कीचड़ में फँसा इंसान दूसरे को भी उसी में खींचता है।।
कितना भोला, कितना चंचल होता है ये मन
कभी इधर तो कभी उधर भटका करता पल-छिन
बार-बार सोचा, इसको कर लूँ अपने वश में
रहा मगर हर बार फिसलता है ये चंचल मन
विधि की विडंबना देखिये
जब बच्चा पैदा होता हैं
नर्स पैर में
माँ के नाम का टैग
बाँध देती हैं
माँ की गोद में देते ही
माँ के नाम का टैग उतार देती हैं
मैं भी
भीड़ में
पाँव दबाए
घुस गया,
देख मुझे
मदारी
अचंभित हुआ
मुस्कुराते बोला-
'ओहो ! आप आ गए
आइए जनाब
अभी मैं
मंत्र फूँकता हूँ
आपको गधा बनाता हूँ
और आज की प्रथम व शीर्षक कड़ी
आज बाँटना हैं तुमसे
कुछ भूली सी यादें
कुछ भीगे से पल
कुछ छिटके से आज
कुछ छूटे से कल
कुछ रुसवा सी रातें
कुछ गुमसुम से दिन
कुछ झूठे से लम्हे
कुछ सच्चे पल छिन
आज्ञा दें...
दिग्विजय को
दिग्विजय को



