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शनिवार, 19 मई 2018

1037... भांग




सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष

बूढ़े तन पे युवा मन
अंदाज़ा नहीं होगा कि
सामने वाला चुप है तो
कमजोर नहीं है
कसूरवार कौन है
मैं तू या

भांग

शाम को हम भाई अपने दोस्तों के साथ
छत पर बैडमिंटन खेलते थे, उस शाम को भी खेले।
खेलते समय हमें याद ही नहीं रहता था कि
कब शाट मारा, कब प्वाइंट बने किन्तु खेलते भी रहे।



My photo
ओ रसगुल्ले इधर से
आइधरर से आ, उधर से आ,
सीधे मुंह में गिरती आ
एक सेर मलाई और दो
रसगुल्लेइतनी ही है मांग मेरी



शिव जाग मनुज ललकार रहा

मन में श्रद्धा, भक्ति में निष्ठा, ले करते सब यात्रा अमरनाथ की,
कितने ही लालायित भक्त, उस हिमलिंग का दर्शन करते,
प्रान्त-प्रान्त से आते उपासक, अपना जीवन धन्य करते।
पर हिम शिखा पर बसने वाले, भांग धतुरा रसने वाले,
इस तपती धरती पर अब, तू एक हिम लिंग को तरस रहा।
शिव जाग मनुज ललकार रहा, शिव देख मनुज ललकार रहा

इजाजत दे मुझे

मुझे लौटना है अँधेरों के पास, दूर इस बेदर्द-सहर से, हमेशा के लिए,
इजाजत दे मुझे जाने को, तेरे शहर से, हमेशा के लिए …

जो तुम लौटोगे अगर, तो कोई इशारा करो,
जगह दो दिल में या फिर बंजारा करो,

बस एक तेरे इंतजार में, ज़िंदग़ी के लम्हें गए हैं ठहर से,
अब तो इजाजत दे दे मुझे, जाने को तेरे शहर से,

पोषम पा

उस गली से गुजरा हूँ आज, इकलौता देवदार का पेड़ खड़ा रहता था
जहाँ वहां अब एक टेलिकॉम टाबर है, पेड़ की जड़ों पर
सीमेंट का चबूतरा है, मैंने बच्चों को देखा है, सपाट धरातल पर
 पड़े हुए, भांग के नशे में, देवदार का पेड़ तो रहा नहीं,
 बच्चों की मनोस्थिति भी, बदल गयी है

मेरा फोटो

पिता की मौत

जीवन इतना जटिल
कितने छिलके निकालेंगे दु:खों के
उसके बाद सुख का क्या भरोसा
कौन से छिलके की परत कब आंसुओं में डुबो दे
हमारी सिसकियों से हमारे ही कान के परदे फट जाएँ
ह्रदय का पारा कब नाभी में उतर आये

><

फिर मिलेंगे .... प्रतीक्षित


उपरोक्त चित्र को आधार मान कर रचना लिखनी है
सबको अपने ढंग से पूरी कविता लिखने की आज़ादी है


आप अपनी रचना आज शनिवार 19  मई 2018 
शाम 5 बजे तक भेज सकते हैं।
चुनी गयी श्रेष्ठ रचनाऐं
आगामी सोमवारीय अंक 21 मई 2018  को प्रकाशित की जाएगी ।
रचनाएँ  पाँच लिंकों का आनन्द ब्लॉग के सम्पर्क प्रारूप द्वारा प्रेषित करें




9 टिप्‍पणियां:

  1. विभा जी
    सुप्रभात,

    आज की हलचल में सभी रचना उम्दा थी
    सभी पाठकों से अनुरोध है कि आप कम से कम "पिता की मौत" बहादुर पटेल जी की रचना जरूर पढ़ें।
    ऐसी रचनाएं ब्लॉग पर पढ़ने को बहुत कम मिलती हैं।
    इससे अवगत करवाने के लिए विभा जी का आभारी हूँ।

    ब्लॉग "पोषम पा" पर रमेश जी की कविताएं प्रकृतिवादी विचारधारा की सर्वोश्रेष्ठ कविताएं हैं आपको भरपूर मजा मिलेगा।

    पाखंडी और धर्म विशेष साहित्य से बचने की सलाह रहेगी।

    आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  2. आदरणीय दीदी
    सादर नमन
    बेहतरीन प्रस्तुति
    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  3. सुप्रभातम् दी,
    हमेशा की तरह आपकी विशेष प्रस्तुति बहुत अच्छी लगी। सारी रचनाओं ने प्रभावित किया। एक से बढ़कर एक रचनाएँ हैं।
    आभार दी इतना सुंदर संकलन पढ़वाने के लिए।
    सादर।

    उत्तर देंहटाएं
  4. वाह शानदार दी लिंक तो पूरे नही पढ़े पर झलकिंया काफी प्रभावित कर रही है सारा मसौदा एक अलग अंदाज से सजा है, कहूंगी लाजवाब जौहरी सी परख लिखे नायाब प्रस्तुति।
    सभी रचनाकारों को बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  5. वाह!!शानदार प्रस्तुति । सभी लिंक एक से बढकर एक ।

    उत्तर देंहटाएं
  6. शुभप्रभात......
    सूंदर संकलन......
    प्रत्येक शनीवार को आप की प्रस्तुती का इंतजार रहता है.......
    क्योंकि आप कभी अनुपस्थित नहीं रहते......
    आप के प्रिश्रम को नमन......
    आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत सुन्दर हलचल प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  8. हलचल में सभी रचना सारगर्भित।आपकी विशेष प्रस्तुति का इंतजार रहता है।
    बहुत बढिया
    आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  9. बेहतरीन प्रस्तुतिकरण उम्दा लिंक संकलन....

    उत्तर देंहटाएं

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