सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष
बूढ़े तन पे युवा मन
अंदाज़ा नहीं होगा कि
सामने वाला चुप है तो
कमजोर नहीं है
कसूरवार कौन है
मैं तू या
भांग
शाम को हम भाई अपने दोस्तों के साथ
छत पर बैडमिंटन खेलते थे, उस शाम को भी खेले।
खेलते समय हमें याद ही नहीं रहता था कि
कब शाट मारा, कब प्वाइंट बने किन्तु खेलते भी रहे।
अंदाज़ा नहीं होगा कि
सामने वाला चुप है तो
कमजोर नहीं है
कसूरवार कौन है
मैं तू या
भांग
शाम को हम भाई अपने दोस्तों के साथ
छत पर बैडमिंटन खेलते थे, उस शाम को भी खेले।
खेलते समय हमें याद ही नहीं रहता था कि
कब शाट मारा, कब प्वाइंट बने किन्तु खेलते भी रहे।

ओ रसगुल्ले इधर से
आइधरर से आ, उधर से आ,
सीधे मुंह में गिरती आ
एक सेर मलाई और दो
रसगुल्लेइतनी ही है मांग मेरी

शिव जाग मनुज ललकार रहा
मन में श्रद्धा, भक्ति में निष्ठा, ले करते सब यात्रा अमरनाथ की,
कितने ही लालायित भक्त, उस हिमलिंग का दर्शन करते,
प्रान्त-प्रान्त से आते उपासक, अपना जीवन धन्य करते।
पर हिम शिखा पर बसने वाले, भांग धतुरा रसने वाले,
इस तपती धरती पर अब, तू एक हिम लिंग को तरस रहा।
शिव जाग मनुज ललकार रहा, शिव देख मनुज ललकार रहा
इजाजत दे मुझे
मुझे लौटना है अँधेरों के पास, दूर इस बेदर्द-सहर से, हमेशा के लिए,
इजाजत दे मुझे जाने को, तेरे शहर से, हमेशा के लिए …
जो तुम लौटोगे अगर, तो कोई इशारा करो,
जगह दो दिल में या फिर बंजारा करो,
बस एक तेरे इंतजार में, ज़िंदग़ी के लम्हें गए हैं ठहर से,
अब तो इजाजत दे दे मुझे, जाने को तेरे शहर से,
पोषम पा
उस गली से गुजरा हूँ आज, इकलौता देवदार का पेड़ खड़ा रहता था
जहाँ वहां अब एक टेलिकॉम टाबर है, पेड़ की जड़ों पर
सीमेंट का चबूतरा है, मैंने बच्चों को देखा है, सपाट धरातल पर
पड़े हुए, भांग के नशे में, देवदार का पेड़ तो रहा नहीं,
बच्चों की मनोस्थिति भी, बदल गयी है

पिता की मौत
जीवन इतना जटिल
कितने छिलके निकालेंगे दु:खों के
उसके बाद सुख का क्या भरोसा
कौन से छिलके की परत कब आंसुओं में डुबो दे
हमारी सिसकियों से हमारे ही कान के परदे फट जाएँ
ह्रदय का पारा कब नाभी में उतर आये
><
फिर मिलेंगे .... प्रतीक्षित

शिव जाग मनुज ललकार रहा
मन में श्रद्धा, भक्ति में निष्ठा, ले करते सब यात्रा अमरनाथ की,
कितने ही लालायित भक्त, उस हिमलिंग का दर्शन करते,
प्रान्त-प्रान्त से आते उपासक, अपना जीवन धन्य करते।
पर हिम शिखा पर बसने वाले, भांग धतुरा रसने वाले,
इस तपती धरती पर अब, तू एक हिम लिंग को तरस रहा।
शिव जाग मनुज ललकार रहा, शिव देख मनुज ललकार रहा
इजाजत दे मुझे
मुझे लौटना है अँधेरों के पास, दूर इस बेदर्द-सहर से, हमेशा के लिए,
इजाजत दे मुझे जाने को, तेरे शहर से, हमेशा के लिए …
जो तुम लौटोगे अगर, तो कोई इशारा करो,
जगह दो दिल में या फिर बंजारा करो,
बस एक तेरे इंतजार में, ज़िंदग़ी के लम्हें गए हैं ठहर से,
अब तो इजाजत दे दे मुझे, जाने को तेरे शहर से,
पोषम पा
उस गली से गुजरा हूँ आज, इकलौता देवदार का पेड़ खड़ा रहता था
जहाँ वहां अब एक टेलिकॉम टाबर है, पेड़ की जड़ों पर
सीमेंट का चबूतरा है, मैंने बच्चों को देखा है, सपाट धरातल पर
पड़े हुए, भांग के नशे में, देवदार का पेड़ तो रहा नहीं,
बच्चों की मनोस्थिति भी, बदल गयी है

पिता की मौत
जीवन इतना जटिल
कितने छिलके निकालेंगे दु:खों के
उसके बाद सुख का क्या भरोसा
कौन से छिलके की परत कब आंसुओं में डुबो दे
हमारी सिसकियों से हमारे ही कान के परदे फट जाएँ
ह्रदय का पारा कब नाभी में उतर आये
><
फिर मिलेंगे .... प्रतीक्षित

उपरोक्त चित्र को आधार मान कर रचना लिखनी है
सबको अपने ढंग से पूरी कविता लिखने की आज़ादी है
आप अपनी रचना आज शनिवार 19 मई 2018
शाम 5 बजे तक भेज सकते हैं।
चुनी गयी श्रेष्ठ रचनाऐं
आगामी सोमवारीय अंक 21 मई 2018 को प्रकाशित की जाएगी ।
रचनाएँ पाँच लिंकों का आनन्द ब्लॉग के सम्पर्क प्रारूप द्वारा प्रेषित करें
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