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मंगलवार, 15 मई 2018

1033....माँ-सास... बहुत बारीक सा अंतर


जय मां हाटेशवरी.....
आज कल 10वीं व 12वीं के परीक्षा-परिणाम आ रहे हैं......
अधिकांश माता-पिता को चिंता है कि.....
कहीं उनके बच्चों के नंबर पड़ोसी के बच्चों से कम न आ जाए.....
अगर किसी बच्चे के नंबर माता-पिता की उमीदों से कम आ जाए तो.....
इस नकरातमक प्रवृति के कारण, कई माता-पिता अपने बच्चों को अनेक प्रकार से प्रताड़ित करना प्रारंभ कर देते हैं.....
जिस कारण कई मासूम बच्चे आत्महत्या तक कर देते हैं......
 ये हीन भावना बच्चों के प्रगतीशील मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है......
हे परीक्षा परिणाम
मत सताओ बच्चों को, प्यारे बच्चों के मासूम दिलों से खेलना बंद करो।
न जाने कितने मासूम दिलों से तुम खेलते हो ,न जाने कितने बच्चों के भविष्य को रौंद चुके हो तुम।
न जाने कितने माँ बाप को खून के आंसू रुला चुके हो तुम।
तुम्हे किसने यह अधिकार दिया कि तुम एक कागज पर लिखे अंको के आधार पर।
किसी की प्रतिभा का आंकलन करो ,तुम कौन होते हो यह निर्णय देने वाले की मार्कशीट के अंक बच्चे की प्रतिभा का प्रतिबिम्ब हैं।
क्या बिलगेट्स ,सचिन ,गांधी की प्रतिभा तुम्हारे अंको की मोहताज रही है ?
क्या नरेंद्र मोदी को तुमने प्रधानमंत्री लायक बनाया ?
क्या शिवराज तुम्हारे अंको के आधार पर कामयाबी के शिखर तक पहुंचे ?
क्या न्यूटन ओर आइंस्टीन को तुमने वैज्ञानिक बनाया ?
नहीं ये सभी प्रतिभाएं तुम्हारी अंको की लंगड़ी गाड़ी में चढ़ी।
ये सभी कड़ी मेहनत एवं लगन से शिखरों तक पहुंची हैं।
क्या तुम उस मासूम के करीब से गुजरे हो जिसके अंक तुमने सिर्फ इसलिए काटे हैं।
कि उसने रट कर तुम्हारा उत्तर नहीं दिया?
क्या तुमने उन माँ बाप के चहरों की उदासी देखी है जिनके बच्चे
तुम्हारी दी हुई लक्ष्मण रेखा पार नहीं कर सके ?
हे परीक्षा परिणाम
हो सके तो उन सही बच्चों के टूटे हुए दिलों में झांकना
जो कक्षा में प्रथम स्थानों पर नहीं आ सके।
हो सके तो उन सभी माँ बाप के बिखरते सपनों को
महसूस करना जिनके बच्चे IIT ,IIM एवं मेडिकल में नहीं जा सके।
क्या ये सब प्रतिभा हीन हैं ?क्या इनका कोई भविष्य नहीं है ?
तुमने तो एक कागज के टुकड़े पर अंक लिख कर
इनको प्रतिभा हीन प्रमाणित कर दिया।
तुमने इनकी कापियों को लाल ,हरा ,काला कर
इनके भविष्य पर अंको का ताला लगा दिया।
हे परीक्षा परिणाम तुम देखना
यही बच्चे तुम्हे झूठा साबित करेंगें।
ये तुम्हारे अंकों के कागज को रद्दी की टोकरी में फेंक कर।
बनेगें बिलगेट्स ,गांधी ,सचिन ,नरेंद्र मोदी और अब्दुल कलाम।
यही बच्चे बनेगें इंदिरा ,कल्पना ,सानिया और सायना।
यही बच्चे साबित करेंगे की तुम्हारा आंकलन सिर्फ कागज पर लिखे
कुछ अंको के आलावा कुछ नहीं है।
इसलिए हे परीक्षा परिणाम सुधर जाओ और मत डराओ इन मासूम बच्चों को।
---- रचनाकार सुशील शर्मा



ऐसे कई उदाहरण हैं जो गाहे-बगाहे रोजमर्रा के जीवन में हमारे आसपास मिल जाते हैं। बहरहाल मैं आज तलक नहीं समझ पाया हूँ कि इम्तिहान, एग्जाम, परीक्षा, पोजिशन, रैंक, परसन्टेज, ग्रेड आदि का असल जिन्दगी से जुड़ाव है भी या नहीं। यदि ‘कुछ तो आँकने-जाँचने का तरीका हो’ के मसले को एक तरफ रख दें तो मुझे लगता है कि ये भारी-भरकम शब्द खुशी से अधिक गम देते हैं। बेचैनी पैदा करते हैं। घबराहट का ग्राफ बड़ाते हैं। निराशा के घाव देते हैं। कुण्ठा का घेरा डालते हैं। मनोबल को गिराते हैं। खुद को कायर मान लेने वालों की तादाद बढ़ाते हैं। इससे आगे देखें तो यह अवसाद से आगे जाकर घर छोड़ने से लेकर जीवनलीला तक समाप्त करा देते हैं।

हर साल खासकर बोर्ड परीक्षा के परिणाम आने के एक दिन बाद टी॰वी॰चैनल रोते-बिलखते परिजनों को दिखाते हैं, जिनके बच्चे फेल होने के चलते अपनी अनमोल   जिन्दगी को अलविदा कह देते हैं। अखबारों के मुखपृष्ठों पर ऐसी कई खबरें पढ़ने को मिलती हैं जिसमें परीक्षा के परिणामों से खिन्न विद्यार्थी   आत्महत्या कर लेते हैं।
समाज की संवेदनाएं बस अफसोस जताने से आगे नहीं बढ़ पातीं। परीक्षा के परिणामों के आते ही अंकों की अन्‍तहीन दौड़ में शामिल विद्यार्थी क्या, अभिभावक क्या शिक्षक भी सीना फुलाते नजर आते हैं। मैं सबसे पहले इस व्यवस्था को बदस्तूर जारी रखने वाले नीति-नियंताओं से, इस कुव्यवस्था में बच्चों के साथ खुद को झोंकने वाले अभिभावकों से और इस बेशरम पौधे की तरह बढ़ने वाली कुपरिपाटी को खाद-पानी देने वाले शिक्षकों से कुछ पूछना चाहता हूँ। यदि जवाब हों तो मेरी जिज्ञासा शान्‍त कीजिएगा।

......जो कुछ पढ़ा......वो पेश है आप के लिये......


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कर्मशील हो जीवन अपना
कृषक या मजदूर. घर के कामों में मशीनों के बढ़ते चलन की वजह से हाथ-पैर के जोड़ों में गति नहीं होती और यदि कोई नियमित व्यायाम न करे तो उनमें पीड़ा होने लगती
है. इससे बचने का उपाय है कि प्रतिदिन कुछ न कुछ शारीरिक श्रम किया जाये. कुछ खेती करें, गमलों में ही सब्जियां उगायें. मोहल्ले में जाकर सबको साथ लेकर योग
की कक्षा चलायें या स्वच्छता का बीड़ा उठायें. समाज को आगे ले जाने का बीड़ा श्रमशील व्यक्तियों ने ही उठाया है. जीवन की अंतिम श्वास तक जो सक्रिय रह सकेगा वही मृत्यु का स्वागत हँसते-हँसते कर सकता है.


नज़रे इनायत
सुबह हुई व्यस्त कार्यक्रम रोज का
 कहीं ना छूट पाया
हम उस में इतने हुए व्यस्त
रात कहाँ गुजारी यह तक याद न रहा
कितने वादे किये
उनसे पूरा करना भी भूले |


तू ठहर सही, मैं आऊँगा..!
पहले जाने कितने मौके मैंने खूब गँवाये हैं।
इस बार यकीनन तुझको अपने दिल का हाल सुनाऊँगा॥
सोचा है इस बार सही, मिल कर सब कुछ कह जाऊँगा।
हाँ माना कुछ देर रही; तू ठहर सही, मैं आऊँगा॥


माँ कहती थी
मेरी माँ मुझसे न जाने क्या-क्या कहती थी....
समझाती थी यदा कदा....
मीठी-मीठी बातों से बचना जरा,
दुनियाँ के लोगों में है जादू भरा.....


शायद .. कोई .. आस-पास है ... !!
कुछ ..
अजीब-सा अहसास है
मन उदास है
शायद .. कोई .. आस-पास है ... !!


ऐसे में कैसे मनाएं मदर्स डे ?
उसने जवाब दि‍या- यह दर्द एक बेटी की मां ही समझ सकती है कि‍ आज के दौर में  बेटी को पालकर सुरक्षि‍त बड़ा करना कि‍तना कठि‍न हो गया है। रोज बलात्‍कार और हत्‍या की खबरें पढ़कर मेरा रोम-रोम इस भय से कांपता रहता है कि‍ कहीं कोई दुर्घटना अपनी बेटी के साथ घटि‍त न हो जाए। उसेे स्‍कूल बस तक छोड़ना-लाना, उसे टयूशन के लि‍ए साथ लेकर जाना और बाहर बैठकर इंतजार करना।  खेलने के लि‍ए पार्क में ले तो जाती हूं, मगर कुछ दूर में बैठकर नि‍रंतर उस पर नजर रखती हूं। घर के आसपास आने जाने वाले सभी पर चाहे वो मर्द हो या लड़का, मेरी संदेह भरी नजर टि‍की रहती है। सच है, मैं कि‍सी पर वि‍श्‍वास नहीं कर सकती। मैं एक जासूस जैसा महसूस करती हूं
इस हाल में कैसे कोई मातृ दि‍वस मना सकता है। अपनी मां को ही मां मानकर इज्‍जत देना काफी नही हैं। हर मां को अपनी मां समान माना जाए और छोटी-छोटी बच्‍चि‍यों को अपनी बेटी मानने न लगे लोग,  कोई भी मां अपनी बेटी की सुरक्षा को लेकर इतनी आशंकि‍त न रहे, तभी सही अर्थ में मातृ दि‍वस मनाया जा सकता है।

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क्या मैं आपको 'मम्मी' कह कर बुला सकती हूं?
दिपाली सब सुन रही थी। उतने में उसके सास की आवाज़ आई, "क्यों, तु ऐसा क्यों कह रहीं हैं? तुझे जब मंजु हुई थी तब क्या तुझे सुदीप से कम तकलीफ़ हुई थी?"
"ऐसा थोड़े ही होता हैं? चाहे बेटा हो या बेटी तकलीफ़ तो दोनों समय एक सी ही होती हैं?" शर्मा आंटी ने कहा।
सास की आवाज़ आई- "जब दोनों समय तकलीफ़ एक जैसी ही होती हैं तो बेटी होने पर लड्डू में मेवा कम क्यों डाला जाएं? वैसे तुने तो विज्ञान की पढ़ाई की हैं ना। तुझे तो अच्छे से पता हैं कि बेटा या बेटी होना पुरुषों के शुक्राणुओं पर निर्भर रहता हैं। फ़िर मैं दिपाली को किस बात की सजा दूं? मैं तो बादाम थोडे से ज्यादा ही
मंगवाऊंगी ताकि बाद में दिपाली को बादाम का हलवा बना कर भी खिला सकूँ!!"
यह सब सुन कर दिपाली सोचने लगी कि कितनी खुशकिस्मत हैं वह, जो उसे इतनी सुलझे हुए विचारों वाली सास मिली। थोड़ी देर बाद जब उसकी सास कमरे में आई तो दिपाली भावातिरेक में उनके गले लग गई और बोली, "क्या मैं आपको 'मम्मी' कह कर बुला सकती हूं?"

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माँ-सास... बहुत बारीक सा अंतर
माँ सी शक्ल पाई हूँ
उनकी खूबसूरती नहीं पा सकी
हर ठिठके पल में उनको याद की
वैसे हर पल में सोचती कि वे होती तो क्या करतीं
और नकल करने से निवारण होता गया
कुछ अगर कमियां रही तो
नकल तो नकल है...


हर दोपाया आदम नही
मानव योनि
के अलावा
भले ही
मानव योनि में जन्म
होता हो
पूर्व कर्मों का फल
किन्तु मानव रचना को
इंसान कहलाने के लिये
गुजरना होता है
एक सतत प्रकिया से
बनना पड़्ता है वो कमल
जो रखता है
स्वच्छ स्वयं को
-0-0-
हम-क़दम 
सभी के लिए एक खुला मंच
आपका हम-क़दम  उन्नीसवें क़दम की ओर
इस सप्ताह का विषय है एक चित्र..

उपरोक्त चित्र को आधार मान कर रचना लिखनी है
सबको अपने ढंग से पूरी कविता लिखने की आज़ादी है

आप अपनी रचना शनिवार 19  मई 2018 
शाम 5 बजे तक भेज सकते हैं। चुनी गयी श्रेष्ठ रचनाऐं आगामी सोमवारीय अंक 21 मई 2018  को प्रकाशित की जाएगी ।
रचनाएँ  पाँच लिंकों का आनन्द ब्लॉग के सम्पर्क प्रारूप द्वारा प्रेषित करें




























धन्यवाद।

15 टिप्‍पणियां:

  1. शुभ प्रभात भाई कुलदीप जी
    अच्छी व सारगर्भित रचनाएँ चुनी आपने
    मन प्रसन्न हो गया
    आभार
    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  2. सस्नेहाशीष व शुभकामनाओं संग शुक्रिया मेरे शब्दों को यहाँ स्थान देने के लिए
    अति सुंदर प्रस्तुतीकरण
    उम्दा संकलन

    उत्तर देंहटाएं
  3. मेरी रचना को स्थान देने हेतु आभार।
    सुंदर संकलन।

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत शानदार लिंकों का चयन सभी रचनाऐं सारगर्भित।
    सभी चयनित रचनाकारों को बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  5. वाह!!बहुत सुंदर प्रस्तुति...।

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत सुन्दर हलचल प्रस्तुति और सटीक 'हे परीक्षा परिणाम'।

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत सुंदर प्रस्तूति। मेरी रचना शामिल करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत अच्छी हलचल प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  9. बहुत सुंदर प्रस्तुति कुलदीप जी,और अगले हमकदम का विषय भी अद्भुत है.. सभी रचनाकारों को शुभकामनाएं सारि रचनाएँ एक से बढ़कर एक हैं

    उत्तर देंहटाएं
  10. अंकों की अंतहीन दौड़ में अब बच्चे के साथ उसके अभिभावक और शिक्षक भी दौड़ रहे हैं। मेरे जैसे अनेकों शिक्षक होंगे जो बच्चों को अपने विषय का सारा ज्ञान देना चाहते हैं किंतु मजबूर हो जाते हैं इस अंकों की स्पर्धा के आगे....बच्चों को विद्यार्थी नहीं बल्कि परीक्षार्थी बना दिया है हम सबने ! कुछ अतिरिक्त बताने, समझाने की कोशिश करो तो कई बच्चे पूछ बैठते हैं - मैम क्या ये परीक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण है ? शिक्षकों पर अभिभावकों और स्कूल प्रशासन का दबाव बना रहता है कि वे बच्चों को बोर्ड की परीक्षा के लिए तैयार करें....जीवन की परीक्षा के लिए तैयार करने का ना लक्ष्य है ना किसी को चिंता...बच्चा कहाँ जाए ? कई बार इसी मोड़ से अच्छे अच्छे बच्चों का राह भटकना देखा है,अपनी ही रिश्तेदारी में दसवीं में फेल होने पर मासूम लड़की द्वारा फाँसी लगाकर आत्महत्या करने का दर्दनाक वाकया देखा है....इस पर जितना लिखें कम है। याद आता है कि हमारे पापा तो सिर्फ इतना पूछते थे कि बच्चे पास हो गए? और 'हाँ' सुनते ही पेड़े लाकर मुहल्ले में बाँट देते थे। कभी हमारे अंक पूछे ही नहीं उन्होंने....और आज बच्चों के कम अंक आने पर घर में मातम का सा माहौल हो जाता है। इस परिस्थिति में बदलाव आना निकट भविष्य में तो संभव नहीं लगता। आदरणीय भाईसाहब ने गंभीर विषय उठाया है भूमिका में। झकझोरता है मन को....
    आज के अंक में शामिल रचनाओं को पढ़ना बाकी है। चयनित रचनाकारों को बधाई। सादर।

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. आदरणीय कुलदीप जी,
      बेहद शानदार भूमिका के साथ सुंदर रचनाओं से संकलित अंक तैयार किया है आपने।

      हटाएं
  11. बहुत सही कहा आपने। अंकों की दौड़ में हम अपने बच्चे गँवा देते हैं। मेरी रचना शामिल करने के लिए आपका आभार, धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  12. मुझे लगता है कि एक शिक्षक को शिक्षक बाद में पहले मनोवैज्ञानिक होना जरूरी है।
    परिणाम जानने के लिए परीक्षा नहीं सतत मूल्यांकन व अवलोकन होना चाहिए।
    ताकि बुद्धि के साथ साथ सृजनात्मकता का भी पता लगाया जा सके।

    आज की भूमिका बहुत विचारणीय है।

    लिंक शायद पांच से ज्यादा रहे होंगे लेकिन चुनिदा थे

    आभार।

    हम दम का विषय बेहद उत्साहित है।

    उत्तर देंहटाएं
  13. Rohitas ghorela15 मई 2018 को 11:42 pm
    मुझे लगता है कि एक शिक्षक को शिक्षक बाद में पहले मनोवैज्ञानिक होना जरूरी है।
    परिणाम जानने के लिए परीक्षा नहीं सतत मूल्यांकन व अवलोकन होना चाहिए।
    ताकि बुद्धि के साथ साथ सृजनात्मकता का भी पता लगाया जा सके।

    आज की भूमिका बहुत विचारणीय है।
    SAHI KHA AAPNE -
    Independence day speech

    उत्तर देंहटाएं

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