सादर अभिवादन
वर्ष का अंतिम रविवार
कुछ ज़ियादा ही ठण्डा है
कुछ ज़ियादा ही ठण्डा है
ज्यादा बात न करते हुए चलें रचनाओं की ओर...

आज शिखर पर हूँ मैं,
पर दिल में सवाल है
कि मर-मर कर ऊपर पहुंचने से
जीते हुए नीचे रहना
क्या ज़्यादा अच्छा नहीं है?

पुरोहित की है अपनी बेबसी, शाम गहराते ही
बंद हो गए मंदिर के दरवाज़े, ख़ामोश
हैं सभी, पृथ्वी हो या आकाश,
सिर्फ़ अंतर गहन सारी
रात है जागे।

तुम तो पढ कर सुनाओगे नहीं
कभी वह खत
जिसे भागने से पहले
वह अपनी मेज पर रख गई
तुम तो छुपाओगे पूरे जमाने से
उसका संवाद
चुराओगे उसका शीशा उसका पारा

समय नहीं होगा
जब अवसर होगा ।
जब समय होगा
अवसर नहीं होगा ।
ऐसे ही क्रम चलेगा ।
लुकाछिपी खेलेगा
और समय बीत जाएगा ।
पता भी ना चलेगा ।
टूटा है यदि दिल तुम्हारा ।
गम की बातें कह सकते हो ।।
मन में अपने ऐंठ छुपाए ।
सब से सुन्दर तुम लगते हो ।।
लगते हो तुम मलयानिल से ।
जब अल्हड़पन से हँसते हो ।।

ये तो तेरा-मेरा रोज़ का मसला हैं,
जंगे ज़िन्दगी में ,
ये कहा सुन ही तो असल असला हैं,
यूँही खट्टे मीठे तजुर्बों की रवानी हैं,
हम्हे तो बस यूँही अब निभानी हैं,
थोड़ा तुम क़दम बढ़ाओ,
मैं कुछ मान जाता हूँ
क्यों नहीं मिलता
कुछ सम्मान है
किसी का नाम होने से
किसी को हो रहा
बहुत नुकसान है
कोई करे कुछ तो
उसके लिये कभी
इसकी और उसकी
हो रही पहचान से
किसी की सांसत में
देखो फंस रही जान है
आज बस इतना ही
फिर मिलेंगे अगले साल
यशोदा
यशोदा

