सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष
क्या-क्या बदल जायेगा
बदलते तिथि दिन माह के साथ
उलझे जीवन को सुलझाते
सब तो यही कहते वाह के साथ
अंत ही आरंभ है

मैं कभी पेंसिल को तो कभी पेन को घिस-घिस कर आगे बढता गया और
जब कुछ सालो मे 12 सीढीया चढकर शिखर पर पहुचा तो लगा के
अबतक जो रबर सिर्फ मेरे लिखे हुये को मिटा देता था ।
ठीक उसी प्रकार शायद अब मैं भी अपने हिसाब से अपनी किस्मत लिख सकूंगा ।
पर तभी कही से कई सारी आवाजो से बस एक ही सवाल मुझे हर पल पूछा गया ।
अंत ही आरंभ है

जिंदगी आईसक्रीम की तरह है,टेस्ट करो तो भी पिघलती है,
वेस्ट करो तो भी पिघलती है,इसलिए जिंदगी को
टेस्ट करना सीखो, वेस्ट तो हो ही रही है।
अंत ही आरंभ है
आपको आपसे बेहतर कोई नही समझ सकता
इसलिए स्वयं पर विश्वास रखें ।
हमेशा सकारात्मक सोचें ।
धैर्य रखें , हिम्मत न हारें , और न ही उम्मीद छोङें
यकीन मानिए आप पहले से बेहतर, मजबूत और समझदार बन जायेंगे ।
ज़िन्दगी के सही मायने क्या है ...यह सीख जायेंगे ..
ओ भगवान
हो सकता भक्तों के सीने पर चढकर
बन रहे पुल से नाराजगी हो तुम्हारी
लेकिन तुम्हारी कृपा के बोझ तले
मजदूर ही क्यों दबे
क्यों नहीं कंपनी के दफ्तर को ढहा दिया
विदाई की बेला
तुम्हारी अद्यतन स्मृतियों को
और वादा करता हूँ कि
अब जब भी याद करूँगा तुम्हें
तो मेरे चेहरे पर भी मौजूद होगी
ठीक वैसी ही एक चिरन्तन मुसकान
जैसी छाई रहती थी हमेशा तुम्हारे चेहरे पर।
फिर!-फिर मिलेंगे...
अब बारी है इक्कावनवें अंक की
विषय है
छुवन
उदाहरण
विषय है
छुवन
उदाहरण
छुवन तुम्हारे शब्दों की
उठती गिरती लहरें मेरे मन की
ऋतुएँ हो पुलकित या उदास
साक्षी बन खड़ा है मेरे आँगन का ये अमलतास
अंतिम तिथिः 29 दिसंबर 2018
प्रकाशन तिथिः 31 दिसंबर 2018
आज्ञा दें
उठती गिरती लहरें मेरे मन की
ऋतुएँ हो पुलकित या उदास
साक्षी बन खड़ा है मेरे आँगन का ये अमलतास
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