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शनिवार, 21 जुलाई 2018

1100... मुसाफिर



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मुझे सोने से पहले मीलों दूर जाना है।
1-11-111 पार करते  हम आ पहुँचे हैं

वाँ अंक पर

मेरे पास से गुज़र कर मेरा हाल तक न पूछा
मैं यह कैसे मान जाऊँ के वो दूर जा के रोया
निकले थे इस आस पे , किसी को बना लेंगे अपना
एक ख़्वाइश ने उम्र भर का बना दिया

मुसाफिर

शज़र को सींचते हैं  खून पसीने से मगर
कुछ फल के लिए ,क्यों झगड़ जाते हैं मुसाफिर !!

सुना है दरख़्त पतझर में  वीरान होता है
मगर अब पल भर में ,बिछड़ जाते हैं मुसाफिर !!

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मुसाफिर

जब गुजरूँगा उस रास्ते से तो क्या मैं पहचान पाऊँगा उस रास्ते को।
आज मिल रही है हर रास्ते पर ठोकरे, है नहीं दूर दूर तक कोई संभालने वाला।

समझ में नहीं आ रहा कैसे संभालू अपने इन लड़खड़ाते हुए कदमो को।

कभी कभी अपने दिल को तसल्ली देने के लिए सोचता हूँ।
कैसा होगा वो एहसास जब मंजिल मिलेगी मुझे।

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बटोही

यह बुरा है या कि अच्छा व्यर्थ दिन इस पर बिताना
अब असंभव छोड़ यह पथ दूसरे पर पग बढ़ाना

तू इसे अच्छा समझ यात्रा सरल इससे बनेगी
सोच मत केवल तुझे ही यह पड़ा मन में बिठाना



मुसाफिर

यूं तो मौसम कई ग़मगीन भी आये,
कई अश्क हमें पल – पल सताए !!

कुछ ने मुझको बाँधा, कुछ ने रोकना चाहा,
बंधिशो में अपनी, हमें तोड़ना भी चाहा !!

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मुसाफिर

‘हमारी असली यात्रा उस दिन शुरु होती है
जिस दिन हमारा दुनिया की हर चीज से,
हर रिश्ते से, भगवान पर से विश्वास उठ जाता है और
यात्रा उस दिन खत्म होती है जिस दिन ये सारे विश्वास लौटकर हमें गले लगा लेते हैं। ...
भटकना मंजिल की पहली आहट है। कोई सही से भटक ही ले
तो भी बहुत कुछ पा जाता है। सच्ची आजादी का कुल मतलब अपनी मर्जी से भटकना है।’

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अब बारी है हम-क़दम हेतु विषय की
अट्ठाइसवाँ अँक...
हम-क़दम 
सभी के लिए एक खुला मंच
आपका हम-क़दम अट्ठाईसवें क़दम की ओर
इस सप्ताह का विषय है
'हिंडोला'
...उदाहरण...
हिंडोला कुँज वन डालो झूलन आईं राधिका प्यारी
कहे के खंभ लगवाए कहे की लगी डोरियाँ प्यारी
सोने के खंभ लगवाए रेशम लगी डोरियाँ प्यार
हिंडोला...
कहाँ से आये श्याम बनवारी कहाँ से आई राधिका प्यारी
गोकुल से आये बनवारी मथुरा आइ राधिका प्यारी
हिंडोला...
कि झोंका धीरे से दे ओ हमें डर लगता भारी
डरो मत राधिका प्यारी हमें तो तुम जान से प्यारी
हिंडोला...

उपरोक्त विषय पर आप सबको अपने ढंग से 
लोकगीत बनाइये

आप अपनी रचना आज शनिवार 21 जुलाई 2018  
शाम 5 बजे तक भेज सकते हैं।
चुनी गयी श्रेष्ठ रचनाऐं आगामी सोमवारीय अंक
23 जुलाई 2018  को प्रकाशित की जाएगी । 
रचनाएँ  पाँच लिंकों का आनन्द ब्लॉग के 
सम्पर्क प्रारूप द्वारा प्रेषित करें

फिर मिलेंगे.....
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15 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय दीदी
    सादर नमन
    बेहतरीन प्रस्तुति
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  2. सादर चरणस्पर्श
    उम्दा प्रस्तुति
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  3. सुंदर संकलन बेहतरीन रचनाएं

    जवाब देंहटाएं
  4. 1100वें अंंक की बधाई। सुन्दर प्रस्तुति।

    जवाब देंहटाएं
  5. वाह! ११०० वीं प्रस्तुति का ख़ास अंदाज़ मन को हरषा गया. बधाई और आभार!!!

    जवाब देंहटाएं
  6. बेहतरीन संयोजन अनुभवों का बघार सुंदर संकलन।
    सभी रचनाकारों को बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  7. 1100 वें अंक की सुंदर प्रस्तुति..
    सभी रचनाकारों को बधाई
    धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं
  8. बहुत अच्छी हलचल प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं
  9. सुंदर संकलन।
    सभी रचनाकारों को बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  10. आदरणीय दीदी -- सादर प्रणाम | आज ग्यारहसौंवे अंक को देख पढ़ मन बहुत आह्लादित है | सभी चर्चाकार बधाई के पात्र हैं | आज की प्रस्तुती भी खास और शीर्षक भी खास |सभी लोग मुसाफिर हैं संसार के पथ पर यूँ तो पर इस सफर का आनन्द बड़ा ही सुहाना और रोमांचक है जब अप्रत्याशित ढंग से सब कुछ होता रहता है | सभी रचनाओं को पढ़ लिया है | आपके चयन को नमन और सभी रचनाकारों को भी हार्दिक शुभकामनाएं | मंच से जुड़ने वाले सभी सहयोगियों और पाठकों को बधाई आज के खास दिन के लिए | सादर आभार और नमन |

    जवाब देंहटाएं

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