प्रश्न हैं,
बने बनाये हैं,
बहुत हैं,
फिर किसलिये
नये ढूँढने जाता है
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सादर अभिवादन....
इस बार काफी से कम रचनाएँ हैं
सोचनीय भी नहीं है....
सोचनीय भी नहीं है....
आज की प्रस्तुति में आप पाठकों से राय अपेक्षित है...इस कार्यक्रम को चालू रखा जाए या बन्द किया जाए......यदि आप लोगों को अपनी सृजन क्षमता इससे प्रभावित होती है या विकसित होती है...या
आपको कुछ नया सीखने को मिलता है.....कृपया बताएं
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आज देखिए किसने क्या लिखा
सब की मन अलग-अलग कहता है.....
सब की मन अलग-अलग कहता है.....
यह प्रश्नों का संसार भी
कितना निराला है !
विश्व के हर कोने में
कोने में बसे हर घर में
घर में रहने वाले
हर इंसान के मन में
उमड़ते घुमड़ते रहते हैं
ना जाने कितने प्रश्न,
बस प्रश्न ही प्रश्न !
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पा लेना ही प्रेम नहीं हो सकता है,
सब कुछ खोकर भी क्या प्रेम पनपता है?
प्रश्न किया जब जब मेरे मनमीत ने
उत्तर देने जन्म लिया एक गीत ने
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बच्चे ने प्रश्न किया
ममता क्या होती है ?
मां ने कहा
तू हंसता मै तुझ में जीती
ममता यही होती है।
बच्चे ने प्रश्न किया
मां तूं कैसे जीती है ?
मां ने कहा
तूं मेरा प्रति पल जीता
और मैं तुझ में जीती।
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सखी रेणुबाला जी
हुआ शुरू दो प्राणों का -- मौन -संवाद- सत्र !
मन प्रश्न कर रहे - स्वयम ही दे रहे उत्तर !!
हैं दूर बहुत पर दूरी का एहसास कहाँ है ?
कोई और एक दूजे के इतना पास कहाँ है ?
न कोई पाया जान सृष्टि का राज ये गहरा-
राग- प्रीत गूंज रहा हर दिशा में रह- रह कर !!
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सखी रेणुबाला जी
हुआ शुरू दो प्राणों का -- मौन -संवाद- सत्र !
मन प्रश्न कर रहे - स्वयम ही दे रहे उत्तर !!
हैं दूर बहुत पर दूरी का एहसास कहाँ है ?
कोई और एक दूजे के इतना पास कहाँ है ?
न कोई पाया जान सृष्टि का राज ये गहरा-
राग- प्रीत गूंज रहा हर दिशा में रह- रह कर !!
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प्रश्न अनेक और उत्तर एक
प्रश्नों की लम्बी श्रंखला से
सत्य परक तथ्यों के हल
न था सरल खोजना
बहुत कठिनाई से
उस तक पहुंच पाते
प्रश्न बहुत आसान लगते
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उग आते हैं कुछ प्रश्न ऐसे
जेहन की जमीन पर
जैसे कुकुरमुत्ते
और खींच लेते हैं
सारी उर्वरता उस भूमि की
जो थी बहुत शक्तिशाली
जिसकी उपज थी एकदम आला
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"एक प्रश्न
वो बेटी
उस पिता से पूछती है,
"क्यों बोझ मान लिया मुझे?
मेरे जन्म से पहले ही,
क्या किसी बेटी को देखा है,
बूढ़े माता-पिता को वृद्ध आश्रम में भेजते हुए?...."
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अब इसमें क्या अच्छा है ?.
मूलमंत्र माना इसे मैने....
और अपने मन में, सोच में , व्यवहार में
भरने की कोशिश भी की....
परन्तु हर बार कुछ ऐसा हुआ अब तक,
कि प्रश्न किया मन ने मुझसे ,
कभी अजीब सा मुँह बिचकाकर...
तो कभी कन्धे उचकाकर
"भला अब इसमें क्या अच्छा है" ??
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सखी डॉ. इन्दिरा गुप्ता
यक्ष प्रश्न सी लिखी हुई है
हर रेख चेहरे पर
घूम घेर कर पूछ रही है
क्या गलती थी जीवन भर ।
निश्चल नेह या निस्वार्थ कर्म
क्या यही खोट था मेरा
जिसके चलते जीवन से पहले
पड़ाव आ गया मेरा ।
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सखी अनीता लागुरी
यहां कुछ प्रश्न
मैंने भी पूछे
माँ से अपनी...
क्यों लड़के की चाह में
मुझे अजन्मा ही मारने चली..?
क्यों छठे माह तक
बिना किसी भय के
सींचती रही रक्त से अपने..!
सुनाती रही लोरी
और सहलाती रही
उदर को अपने...!!
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श्री पंकज प्रियम जी
न मन्दिर न मस्जिद
न चर्च न हो गुरुद्वारा
सबकुछ सबके दिल मे
फिर क्यूँ ढूंढा जग सारा
सब जानते फिर भी नही मानते हैं
हरबार एक नया प्रश्न पूछ डालते हैं
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अनुजा दिव्या अग्रवाल
कोई भी
नहीं चाहिए
प्रश्न अभी
घिरी हुई हूँ
अभी मैं बहुत से
प्रश्नों से घिरी
नहीं न जीना
चाहती मैं......ये
छटपटाती ज़िन्दगी
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सखी डॉ. इन्दिरा गुप्ता
यक्ष प्रश्न सी लिखी हुई है
हर रेख चेहरे पर
घूम घेर कर पूछ रही है
क्या गलती थी जीवन भर ।
निश्चल नेह या निस्वार्थ कर्म
क्या यही खोट था मेरा
जिसके चलते जीवन से पहले
पड़ाव आ गया मेरा ।
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सखी अनीता लागुरी
यहां कुछ प्रश्न
मैंने भी पूछे
माँ से अपनी...
क्यों लड़के की चाह में
मुझे अजन्मा ही मारने चली..?
क्यों छठे माह तक
बिना किसी भय के
सींचती रही रक्त से अपने..!
सुनाती रही लोरी
और सहलाती रही
उदर को अपने...!!
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श्री पंकज प्रियम जी
न मन्दिर न मस्जिद
न चर्च न हो गुरुद्वारा
सबकुछ सबके दिल मे
फिर क्यूँ ढूंढा जग सारा
सब जानते फिर भी नही मानते हैं
हरबार एक नया प्रश्न पूछ डालते हैं
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अनुजा दिव्या अग्रवाल
कोई भी
नहीं चाहिए
प्रश्न अभी
घिरी हुई हूँ
अभी मैं बहुत से
प्रश्नों से घिरी
नहीं न जीना
चाहती मैं......ये
छटपटाती ज़िन्दगी
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प्रश्न उठना और
उठते प्रश्न को
तुरंत पूछ लेना
बहुत अच्छी बात है
लेकिन
किसी के लिये
समझना जरूरी है
किसी के लिये
बस एक मजबूरी है
प्रश्न कब पूछा जाये
किस से पूछा जाये
क्यों पूछा जाये
सबसे बड़ी बात
यह देखना
पूछने के लिये
उठे प्रश्न की
क्या औकात है
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