।।प्रातः वंदन।।
बरसात का बादल तो दीवाना है क्या जाने
किस राह से बचना है किस छत को भिगोना है
निदा फ़ाज़ली
पर बारिशों में अहसान तो दोनों का रहता है मकान पे
बस जरा सा छत ने जता दिया तो नींव ने छुपा लिया..
तो समय को जाया न करते हुए रूख करते है इन गूढ़ रूपी शब्दों के नींव की यानि कि मर्म की..
रचनाकारों के नाम क्रमानुसार पढ़ें...
आदरणीय दिगंबर नासवा जी
आदरणीय विश्वमोहन जी
आदरणीया कुसुम कोठरी जी
आदरणीया अपर्णा वाजपेयी जी और
आदरणीय जयन्ती प्रसाद शर्मा जी.✍
बिगाड़ देता हूँ ज़ुल्फ़ तेरी
नहीं चाहता हवा के सर कोई इलज़ाम
रखना चाहता हूँ तुझपे
बस अपना ही इख़्तियार
क़बूल है क़बूल है
आवारा-पन का जुर्म सो सो बार मुझे
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मीत मेरे मन के
सौगात मेरे तन के!
जनमते ही चला
मिलने को तुमसे।
'प्रेय' पथ की मेरी
प्रेयसी हो तुम
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मुस्ल्सल बह गया तो फिर बस समंदर होगा ।
दिन ढलते ही आंचल आसमां का सूर्खरू होगा
रात का सागर लहराया न जाने कब सवेरा होगा।
तारों ने बिसात उठा ली असर अब गहरा होगा
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मैं इस बार मिलूँगी
भीड़ में निर्वस्त्र,
नींद जब भाग खड़ी होगी दूर
आँख बंद होने पर दिखेगी सिर्फ भीड़,
बाहें पसारते ही सिमट जायेगा तुम्हारा पौरुष,
तब, झांकना अपने भीतर
एक लौ जलती मिलेगी
वंही;
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अभी कली है नहीं खिली है,
नहीं कर उनसे छेड़।
वे अबोध हैं तू निर्बोध है,
प्रीत की रीत का नहीं प्रबोध है।
समझेंगी वे चलन प्रेम का,
रे भ्रमर देर सवेर.....................मधुकर मत.......
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।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह 'तृप्ति'✍



