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मंगलवार, 28 अगस्त 2018

1138....वो फूल खिल के रहेंगे जो खिलने वाले हैं.....


जय मां हाटेशवरी......

हज़ार बर्क़ गिरे लाख आँधियाँ उट्ठें
वो फूल खिल के रहेंगे जो खिलने वाले हैं.....
स्वागत है आप सभी का.....
पेश है मेरी पसंद के कुछ चुने हुए लिंक.....

My Photo
भूख ने रुप बदल लिया
चांद को वे समझाने में लगे
कि रोटी गोल है
इस तरह कुछ
सुबहें , भी थकी मिली
कही हाथ, तो कही पैर
न जाने कितनों के घरों में
बिखरा पडा था 'मैं॑॑॑ '!!!


ये मौसम क्यों नही बदल जाता ...!!!
दूर से ही सही कोई साथ होता ,
रगों मैं खुश एहसास होता .
डरी -डरी अंगुलिया हिम्मत जुटाती ,
जुबा कहते कहते लड़खड़ाती .
गर्म साँसे फिर भारी हो जाती .
हाय फिर कोई दामन बचाता,
ये मौसम क्यों नही बदल जाता .......



बहन का धागा भाई का विश्वास
भाई सरहद पर लड़े ,रख कर देश की आन।
बहिना की राखी मिली ,बांध कलाई शान।
सूना सूना सा लगे ,बिन बहना के पर्व।
काश बहिन होती यदि ,मैं भी करता गर्व।  


एक वसीयत मेरी भी ....... निवेदिता
फूलों के अथाह रंग हों
खुशबू से मदहोश हो जाऊँ
किताबों से घिरे इस घने से
जंगल में बस गुम हो जाऊँ
एक वसीयत मेरी भी .......


हुजूम ...
मेरे बाप की जागीर है, पैसा है
अब, मैं उससे ..

आसमान में मोबाइल उड़ाऊँ
या साईकल से व्हाट्सअप-व्हाट्सअप करूँ
तुम्हें क्या ?

मेरी फ़ोटो
आशाएँँ " (लघु कविताएँ)
डाल से विलग पत्ती
ब्याह के बाद  बेटी

अपनों से बिछड़
गैर सी आंगन में खड़ी
 
दिल में कसक
लबों पे मुस्कुराहट
   
दृगों में नमी  और
गुम वजूद की चाहत



दलित एक्ट, आरक्षण, वोटबैंक और संवैधानिक शोषण
वोट बैंक की राजनीति देखिए कि जब सुप्रीम कोर्ट अपने अनुभव से कहता है कि दलित एक्ट का 95% दुरुपयोग हो रहा है और निर्दोष क्यों लोग सताए जा रहे हैं और इस में जांच कर गिरफ्तारी हो तो वोट के लिए सत्ताधीश विधेयक लाकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदल देते हैं! अब जब सुप्रीम कोर्ट पूछ रहा है कि आखिर यह आरक्षण कब तक रहेगा और एक IAS के बेटे और पोते को आरक्षण क्यों दिया जाना चाहिए तब इस पर भी वोट बैंक की राजनीति शुरु हो गई है!

तब इस गैर बराबरी का परिणाम अंबेडकर की जताई आशंका के अनुरूप एक दिन क्यों उत्पन्न नहीं होगा? एक दिन ऐसा आएगा जब इस गैर बराबरी की वजह से भारत का लोकतंत्र खतरे में पड़ेगा...?


इंसान
उदासी को समेट कर
रख दो ऐसी जगह
जहां से वो दिखे ही न
और आंसुओं को
खुशी से वाश्प
बना उड़ा दो
और लग जाओ
जीवन को जीने में

अब बारी है हम-क़दम की
हम-क़दम
सभी के लिए एक खुला मंच
आपका हम-क़दम का चौंतीसवाँ क़दम
इस सप्ताह का विषय है
'बैरी'
...उदाहरण...
बह गया
रिम-झिम, रिम-झिम,
गहन घन-संताप
सजल हुआ बैरी उर फिर
सुनकर क्‍यूँ मेघ मल्‍हार  ?
-दीपा जोशी

उपरोक्त विषय पर आप को एक रचना रचनी है

अंतिम तिथिः शनिवार 01 सितम्बर 2018
प्रकाशन तिथि 03 सितम्बर 2018  को प्रकाशित की जाएगी ।

रचनाएँ  पाँच लिंकों का आनन्द ब्लॉग के
सम्पर्क प्रारूप द्वारा प्रेषित करें


धन्यवाद।




सोमवार, 27 अगस्त 2018

1137...हम-क़दम का तैंतीसवा क़दम..आँखें

सादर नमस्कार
सर्वशक्तिमान ने सुंदर संसार का निर्माण किया और सृजन के चमकात्कारिक स्वरुप को प्रत्येक जीव देख पाये, इसके लिए जीव 
देह को सबसे अनमोल कृति आँख का उपहार दिया।
कहते है आँखें मन का दर्पण होती हैं।
नेत्र,दृष्टि,नयन,लोचन जैसे नामों से सुशोभित आँखों का काम बाहरी वस्तुओं का अवलोकन कर मस्तिष्क तक संदेश पहुँचाना है। शरीर 
का सबसे संवेदनशील और कोमल अंग आँख होता है।
बिना आँख के जीवन अंधकारमय है।

साहित्य में लगभग हर विधा, सभी भाषा और लिखने वाले हर 
रचनाकारों के द्वारा आँख पर अनगिनत शब्द-शिल्प गढ़े गये हैं।
हमक़दम के हमारे विषय "आँखें" पर हमारे रचनाकारों की क़लम से बेहद सारगर्भित और सुंदर रचनाओं का प्रस्फुटन हुआ है।

तो चलिए आपके द्वारा सृजित रचनाओं के संसार में 
★◆◆◆★★◆◆◆★
सर्वप्रथम पढ़िए आदरणीय कुलदीप जी की रचना
उसकी आँखों से देख रहा हूँ

मेरी बुझी हुई
आंखे देखी
छोड़ दिया मंझधार में मुझे.....
एक की आंखों ने
बुझी हुई आंखों में भी 
अपने लिये प्यार देखा,
.... कहा, मेरी आंखे हैं तुम्हारे लिये.....


★★★★★
आदरणीय लोकेश नदीश जी 


ख़्वाब जिसके तमाम उम्र संजोई आँखें
उसकी यादों ने आंसुओं से भिगोई आँखें

तेरे ख़्वाबों की हर एक वादाखिलाफ़ी की कसम
मुद्दतें हो गई हैं फिर भी न सोई आँखें

ज़िक्र छेड़ो न अभी यार तुम ज़माने का
हुश्न के ख़्वाबों-ख़्यालों में है खोई आँखें

★★★★★

आदरणीया उर्मिला सिंह जी

कई पोशीदा राज छुपाती हैं आँखे..
कई सवालों का जबाब देती हैं आंखे!
अनगिनत ख्वाब तैरते इन आँखों में..
मय के छलकते प्याले होती है आंखे !!

★★★★★

आदरणीया डॉ. इन्दिरा गुप्ता जी
एक गजब की बात सुनो 
इस जग  की रीत बताये 
आँख के अंधे नाम नयन सुख 
क्या क्या गुण गिनवाये !

पल में तोला पल में माशा 
दादुर सी कूद लगाये 
बैठ हिंडोला दूर देश की 
सैर खूब करि आये !

★★★★★

आदरणीया शकुंतला राज जी

कोई पूछे उनसे जिनके होती नहीं हैं
आँखे...........
जन्म लिया बिटिया का मैंने
सबने देखा मुझे.....
तो कहा चाँद का टुकड़ा हैं
इसकी आंखे तो समुद्र जैसी गहरी हैं
मृगनयनी, कजरारी आंखे
चंचलता से भरी हुई आंखे

★★★★★

आदरणीया ऋतु आसूजा जी

“ आँखें ही तो हैं , जो सुन्दरता को
       पढ़ती हैं , सुन्दर - सुन्दर विचारों को
       गढ़ती हैं “
        “कवि, लेखकों की आँखें
       प्रकृति की सुन्दरता को निहारती हैं
       मन मंदिर में पनपते सुन्दर विचारों को
       सुन्दर ,प्रेरक कहानियों
       कविताओं के रूप में रचती हैं “

★★★★★

आदरणीया नीतू ठाकुर जी

आँखों में अश्क़ भरकर रूखसत वो हो गए
उम्मीद हसरतों को तेरे  बाद भी रही

हमको पराया कर गए शब्दों के तीर से
हर बात तेरी याद तेरे बाद भी रही

आँखों में नमी दिल में बसती उदासियाँ
सौगात तेरी साथ तेरे बाद भी रही

★★★★★

आदरणीया कुसुम कोठारी जी

आंखें बेजुबान कितना बोलती है
कभी रस कभी जहर घोलती है
बिन तराजु ये तो मन तोलती है
कभी छुपाती कभी राज खोलती है। 

इन आंखों के कितने अफसाने हैं
इन आंखों के कितने दीवानें है
इन आंखों में कितने बहाने हैं
इन आंखों के चर्चे सदियों पुराने हैं। 

★★★★★

आदरणीया आशा सक्सेना जी

झील सी गहरी नीली आँखें
खोज रहीं खुद को ही
नीलाम्बर में धरा पर
रात में आकाश गंगा में |
उन पर नजर नहीं टिकती
कोई उपमा नहीं मिलती
पर झुकी हुई निगाहें 
कई सवाल करतीं |

★★★★★

आदरणीया साधना वैद जी

मुझे छेड़तीं, मुझे लुभातीं,
सखियों संग उपहास उड़ातीं,
नटखट, भोली, कमसिन आँखें !

हर पल मेरा पीछा करतीं,
नैनों में ही बाँधे रहतीं,
चंचल, चपल, विहँसती आँखें ! 

★★★★★
आदरणीय पंकज प्रियम् जी

कारी कजरारी तेरी आँखों में
मादकता भारी तेरी आँखों में
डूबता उतराता हूँ अंदर बाहर
अजब खुमारी तेरी आँखों में।

★★★★★

आदरणीया अभिलाषा चौहान जी

जवानी की आंखें
चंचल अल्हड़ रूमानियत से
भरी ये आंखें
मानो कोई झील हिलोरें लेती
डुबाने को तत्पर
जमाने को
बदल जाती है पल में इनकी
तासीर
लहराता जोश का समंदर

★★★★★

आदरणीया अभिलाषा चौहान जी

वो आंखें सूनी सपाट  खुली हुई
दुनिया का अथाह दर्द समेटे
कुछ भोगा हुआ
कुछ अपनों का दिया
भावना विहीन पथराई सी
देख जिन्हें रूह कांप उठी
समझ कर भी नहीं समझ पाए

★★★★★

आदरणीया अनुराधा चौहान जी

रेत के घरोंदों से
बिखर जाते हैं
सपने मेरे
जब तुम
पास होकर भी
पास नहीं होते हो
कभी आंखों ही आंखों में
समझ लेते थे

★★★★★

आदरणीय पुरुषोत्तम जी जी

खामोशियों में कहकहे लगाती है तेरी ये दो आँखें!
कभी चुपचाप युँ ही मचाती है शोर ये,
जलजला सा लेकर ये आती कभी हृदय में,
कभी मुक्त धार लिए बहती है चुपचाप ये दो आँखें....
★★★★★
और.चलते-चलते पढ़िये मेरी लिखी एक रचना
आँखों में
मुस्कुराता हुआ ख़्वाब है आँखों में
महकता हुआ गुलाब है आँखों में

बूँद-बूँद उतर रहा है मन आँगन
एक कतरा माहताब  है आँखों में

उनकी बातें,उनका ही ख़्याल बस
रोमानियत भरी किताब है आँखों में

★★★★★

एक सुंदर गीत सुनिये

आपके द्वारा सृजित यह अंक आपको कैसा लगा कृपया 
अपनी बहूमूल्य प्रतिक्रिया के द्वारा अवगत करवाये
 आपके बहुमूल्य सहयोग से हमक़दम का यह सफ़र जारी है
आप सभी का हार्दिक आभार।



अगला विषय जानने के लिए कल का अंक पढ़ना न भूले।

अगले सोमवार को फिर उपस्थित रहूँगी आपकी रचनाओं के साथ







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