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बुधवार, 18 दिसंबर 2019

1615... छद्म उत्पातों भरा जग..


।। भोर वंंदन ।।


वर्तमान परिपेक्ष्य को चरितार्थ करतें चंद शेर..


यहाँ पर नफ़रतों ने कैसे कैसे गुल खिलाये हैं
लुटी अस्मत बता देगी दुपट्टा बोल सकता है



बहुत सी कुर्सियाँ इस मुल्क में लाशों पे रखी हैं
ये वो सच है जिसे झूठे से झूठा बोल सकता है



सियासत की कसौटी पर परखिये मत वफ़ादारी
किसी दिन इंतक़ामन मेरा गुस्सा बोल सकता है
मुनव्वर राणा



आज के लिंकों में शामिल रचनाकारों के नाम क्रमानुसार पढ़ें..✍


आ० चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ जी,
आ० पल्लवी गोयल जी,
आ० कमल उपाध्याय जी,
आ० दिगंबर नासवा जी और
आ० अमित निश्छल जी

🔸☃️🔸






है कोढ़ गर तो कोढ़ के छाले न जाएँगे
जो जो भी कारनामें हैं काले न जाएँगे



आएगा वक़्त जाने का जब मैक़दे से घर
हम कोई भी हों साथ ये प्याले न जाएँगे


🔸☃️🔸




जब कहा हुआ
कहा जाएगा
और फिर
कहा जाएगा
और तब तक
के लिए छोड़
दिया जाएगा


🔸☃️🔸



टिकोरी सरकार की नीतियों से खफा था। खफा होना भी चाहिए। प्रधानमंत्री साहब ने कहा था की जीतकर आएंगे और आते ही मंदिर बनवाएंगे और उससे पहले युवकों को रोजगार दिलवायेंगे। इसी चक्कर में टिकोरी उत्तम्मा - 

🔸☃️🔸




या शायद नहीं भी रुकता
पर मुझे याद है तुमने रोका नहीं था
(वैसे व्यक्तिगत अनुभव से देर बाद समझ आया,
माँ बाप बच्चों की उड़ान में रोड़ा नहीं डालते)..



जो यहाँ सद्भाव रखता, जीवनीभर मात खाता।।
उष्ट्र, निज पुरुषार्थ के बल, हो गया बंधक सदा को।
तेंदुओं के शीश मिलते, सिंधु वाली घाटियों से।।
दुश्मनी, वनराज को थी...


🔸☃️🔸
हम-क़दम का नया विषय

यहाँ देखिए

🔸☃️🔸
।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह 'तृप्ति'..✍

8 टिप्‍पणियां:

  1. सियासत की कसौटी पर परखिये मत वफ़ादारी
    किसी दिन इंतक़ामन मेरा गुस्सा बोल सकता है
    बेहतरीन अश़आर..
    सादर...

    जवाब देंहटाएं
  2. हमेशा की तरह लाजवाब प्रस्तुति।

    जवाब देंहटाएं
  3. किसी दिन इंतक़ामन मेरा गुस्सा बोल सकता है...
    .
    गंभीर, चिंतनीय, समसामयिक घटनाक्रमों को देखते हुए, मुनव्वर साहब की यह पंक्ति मन में, एक बार तो जरूर गूंज उठेगी। 👏🏻👏🏻👏🏻
    .
    सुयोग्य रचनाओं से संबद्ध इस अंक के लिए आपको सादर शुभकामनाएँ आदरणीया।
    .
    छद्म उत्पातों भरा जग,
    छल, छली से हार जाता।...
    इस पंक्ति को लिखते वक्त, तथाकथित सभ्य समाज की असभ्य प्रवृत्तियों का अनायास ही स्मरण हो आया। मन में इस बात को लेकर ऊहापोह भी हुआ कि न जाने कितनों को तकलीफ़ भी हो सकती है इन शब्दों से। मगर इन सब बातों से कलम को क्या लेना देना? उसने अपना काम किया।
    आज के इस अंक का शीर्षक “छद्म उत्पातों भरा जग..” देखकर बहुत अच्छा लग रहा है। हृदयतल से सादर अभिनंदन🙏🏻🙂🙏🏻।

    जवाब देंहटाएं
  4. बेहतरीन भूमिका के साथ पठनीय हलचल

    जवाब देंहटाएं
  5. सुन्दर भूमिका व सुन्दर संकलन। मेरी रचना को स्थान देने के लिए सादर आभार ।

    जवाब देंहटाएं
  6. भावभीनी हलचल ...
    आभार मेरी रचना को जगह देने के लिए ...

    जवाब देंहटाएं

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