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शनिवार, 1 जून 2019

1415 ..कंजूसी


मैं ना बहुत कंजूस हूँ

दर्द बाँटना नहीं आता


दर्द बाँट लेना आता है
सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष

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बस, तभी से उसका नाम न केवल
कंजूस -मक्खीचूस पड़ गया,
बल्कि बेहद कंजूस को इसी नाम से
पुकारे जाने का रिवाज़ ही चल पडा।

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Ek Kanjoos Ne Kholi Mithaayi Ki Dukaan


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भ्रमर परागों पर बैठेगें 
धरी रहेगी रखवाली
खुश्बू ख़ुद उड़ने को आतुर
क्या कर लेगा जी माली 
हम तो खुशी बांटने आये
खुशी बांटकर जायेंगे
चलो बजा दो सारे मिलकर
एक बार खुलकर ताली।

आसमान से आवाज़ आयी कि हे राजा तुम्हारी राजधानी के
बीचो बीच  जो पुराना सूखा कुंआ है अगर अमावस्या की रात को
राज्य के प्रत्येक घर से एक – एक बाल्टी दूध उस कुएं में डाला जाये तो
अगली ही सुबह ये महामारी समाप्त हो जायेगी 
और लोगों का मरना बन्द हो जायेगा।

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आपके पास पैसा है…
तो लोग पूछते है… कैसा हैं?
छोड़ो इन मतलबी लोगो को,
इनका स्वभाव ही ऐसा हैं…
><
कहीं पढ़ने को मिला
स्वार्थी से अच्छा सारथि है
फिर मिलेंगे...
अब बात तिहत्तरवें विषय की
विषय
प्रदूषण
उदाहरण
कोई किसीकी बात नहीं सुनता
अपने ही अंतर के शोर से जैसे
सबके कान सुन्न हो गए हैं !
प्रदूषण की मटियाली आँधी में
न चाँद दिखता है ना सूरज

ना कोई ध्रुव तारा
इसी अंक से
साधना दीदी की रचना


प्रेषण तिथि - 01 जून 2019 (शाम 5 बजे तक)
प्रकाशन तिथि - 03 जून 2019
प्रविष्ठियाँ ब्लॉग सम्पर्क फार्म द्वारा ही


19 टिप्‍पणियां:

  1. दूसरों का दर्द बांटने में जो कंजूसी करे, वह फिर कैसा इंसान ?
    प्रयास यह होना चाहिए कि हम औरों को उनकी पीड़ा सांत्वना देते रहें।
    यह मुफ्त का सबसे नेक कार्य है।
    प्रणाम।

    जवाब देंहटाएं
  2. इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.

    जवाब देंहटाएं
  3. आदरणीय दीदी
    सादर नमन..
    सदा की तरह बेमिसाल
    सादर..

    जवाब देंहटाएं
  4. बेजोड़ प्रस्तुति।अच्छे रचनाओं का संगम। सादर।

    जवाब देंहटाएं
  5. बढ़िया अंदाज विभा दी। मनोरंजक, सार्थक प्रस्तुति।

    जवाब देंहटाएं
  6. भ्रमर परागों पर बैठेगें
    धरी रहेगी रखवाली
    खुश्बू ख़ुद उड़ने को आतुर
    क्या कर लेगा जी माली
    हम तो खुशी बांटने आये
    खुशी बांटकर जायेंगे
    चलो बजा दो सारे मिलकर
    एक बार खुलकर ताली।
    बेहतरीन रचनाओं से सजी इस प्रस्तुति हेतु तालियाँ ।।।।।

    जवाब देंहटाएं
  7. बेहतरीन और लाजवाब प्रस्तुति ।

    जवाब देंहटाएं
  8. हमेशा की तरह सराहनीय अंक दी..सभी रचनाएँ एक से बढ़कर एक है...। सुंदर संकलन।

    जवाब देंहटाएं
  9. वाह कंजूसी के इतिहास से लेकर अर्तमान तक खूब रचनाएँ | बहुत ही खूब विषय चुना आपने आदरणीय दीदी | कंजूसी बहुत ही व्यंगात्मक शब्द है उनके लिए जो चमड़ी जाये पर दमड़ी ना जाए का आचरण रखते हैं |पर कंजूसी पैसे रूपये की ही नहीं होती , कई लोग हंसने और प्रेम जताने के की भी कंजूसी करते हैं | पर ऐसा ना करें तो ही बढीया | ये दोनों चींजे बांटने से बढती हैं | असल में निर्मल ह्रदय से प्रेषित किया गया हर भाव आपकी गरिमा को बढाता है | एक और कंजूसी का ब्लॉग जगत आजकल सामना कर रहा है | वह है पाठकों की | सभी से आग्रह है कि सभी फिर से एक दुसरे के संपर्क में आयें | एक और आग्रह FB पर रचना का जो लिंक शेयर किया जाता है , उस पर प्रतिक्रिया ब्लॉग के भीतर ही दें क्योकि आपकी टिप्पणी अनमोल है | FB पर बाहर की बजाय ब्लॉग के अंदर उसकी सार्थकता अधिक है |यदि रचना सीधी डाली गयी है वहां अलग बात है |सभी रचनाकारों को सस्नेह शुभकामनायें और आपको विशेष आभार इस सुंदर प्रस्तुतिकरण के लिए | सादर प्रणाम |

    जवाब देंहटाएं
  10. बहुत शानदार संकलन रहता है आपका दी जी मनमोहक सामग्री से सजा सुंदर अंक।
    रभी सामग्री पठनीय अनुपम।
    सभी रचनाकारों को बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  11. Thank you so much for writing this article. Extremely informational on a subject I did not know much about!
    www.the-indianews.com

    जवाब देंहटाएं

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