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शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017

875...समय ही इश्क हो लेता है समय से जब इश्क होता है

सादर अभिवादन।
बाल पत्रिकाएँ दम तोड़ रही है, कुछ गिने चुने अखबारों में 
साप्ताहिक कॉलम बचे है बाल साहित्य के नाम पर।
कार्टून कैरेक्टरों ने पंचतंत्र और अन्य प्रेरक कथाओं को विस्थापित 
कर दिया है, जादू-टोने, परी कथाएँ सब बीते ज़माने की बात हो गयी है। जबकि ये सच है कि बच्चों को कोर्स की किताबों के अलावा भी भरपूर मानसिक खुराक की आवश्यकता है,क्योंकि बाल साहित्य न सिर्फ बालमन का मनोरंजन करता है बल्कि बच्चों का 
मानसिक तनाव दूर करने में भी सहायक है।

चलिये अब आज की रचनाओं की ओर.........

उलूक टाइम्स से आदरणीय सुशील सर

समय ही इश्क हो लेता है समय से जब इश्क होता है


कब किस समय
पहाड़ी पगडंडियों
से अचानक उतर कर
बियाबान भीड़ में
अपने जैसे कई
मुखौटों से खेलते
चेहरों के बीच 

धरोहर से आदरणीया यशोदा दी की कलम से
बयां करेगी किस्से

ऐ कविता
एक तलब सी 
बन गई हो 
इस जिंदगी में तुम....
जो बिन तुम्हारे 
अधूरी सी 
हो चली है....

शब्दों की मुस्कुराहट से आदरणीय संजय जी की कलम से

पापा आप हो सबसे ख़ास -2 दिसम्बर जन्मदिन पर विशेष


चिड़िया से आदरणीया मीना जी लेखनी से
अपना देकर के चैन-औ-सुकूँ सब,
खुशियाँ जिनके लिए थीं खरीदी,
दर पे जब भी गए हम खुदा के,
माँगी जिनके लिए बस दुआ ही !


आकांक्षा से आदरणीया आशा जी की कलम से
स्वप्न मेरे

खुली आँखों से देखे गए सपनों की 
बात है सबसे अलग  !
होते हैं वे सत्यपरक 
अनोखा अंदाज़ लिए ,
नवीन विचारों का सौरभ है उनमें  !

पलाश से आदरणीया डॉ. अपर्णा त्रिपाठी जी की कलम से
उफ ये बड़े आदमी


बडे लोग ही देख सकते हैं
बडे भव्य सपने
छोटे लोगो के हिस्से तो
सिर्फ आते हैं
सपने

कल की रोटी के

और अंत में फ़िज़ूल टाइम से 
आदरणीय डॉ. राजीव जी की कलम से
कौन सी डोर है जो दिल को हमारे बांधे
क्यों ये बरबस ही' तेरी ओर खिंची जाती है।

आप सभी के बहुमूल्य सुझावों की प्रतीक्षा में

श्वेता

18 टिप्‍पणियां:

  1. शुभ प्रभात...
    छुट्टी के बाद स्वागत है
    वापस आते ही धमाल
    बेहतरीन प्रस्तुति
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  2. सुप्रभात। प्रासंगिक विचारणीय भूमिका के साथ खूबसूरत रचनाओं से सुसज्जित सरस और विविधता से परिपूर्ण विचारणीय अंक। सभी चयनित रचनाकारों को बधाई एवं शुभकामनाएं। आभार सादर।

    जवाब देंहटाएं
  3. सार्थक भूमिका के साथ सुंदर प्रस्तुति सभी रचनाऐं बहुत अच्छी और समय परक।
    सुप्रभात शुभ दिवस।

    जवाब देंहटाएं
  4. वाह....
    बेहतरीन रचनाएँ....
    बच्चों की पत्रिका गायब हो गई है..
    सिर्फ नन्दन दिखाई पड़ती है...
    टीवी की वजह से बच्चों की आँखों में चश्में चढ़ गऐ हैं
    एक अच्छा प्रश्न उछाला है आपने..
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  5. चंपक, लोटपोट, इंद्रजाल कामिक्स, अमर चित्र कथा और भी कई कई ले कर आते थे बचपन में। आज कुछ नजर नहीं आता है इनसब में से और ना ही कोई नई पत्रिका । बच्चों के कान से चिपका या हाथ में चिपका मोबाईल जरूर जरूरी हो गया है किताबों की जगह। सुन्दर प्रस्तुति श्वेता जी और आभार 'उलूक' के समय और इश्क को शीर्षक पर जगह देने के लिये ।

    जवाब देंहटाएं
  6. सुप्रभात स्वेता जी,
    सुंदर प्रस्तुति , सही कहा अब बच्चों की पठन सामग्री स्कुली किताबों तक ही सीमित रह गई है। ज्यादातर बाल साहित्य से संबंधित पुस्तकें विलुप्त हो चुकी है। कहें तो बचपन अब नहीं बीतता दादा दादी की किस्सों कहानियों में ..अब ये सरपट दौड़ता है टैक्नोलॉजी में..। पर सभी जानते है जो आंनद नंदन पढ़ कर एवं उसमें आए पहेलियां,पजल्श हल कर आते थे । पर ....!! उतने आंनद तो कैंडी क्रश के दसवें भाग को पार कर के भी आते ही हे पर .. वो आंनद हमें मिलती है मानसिक तनाव के साथ,
    परिचर्चा के लिए बहुत ही विचारणीय विषय चुना था आपने, बधाई आपको एवं सभी चयनित रचनाकारों को भी शुभकामनाएं...!!

    जवाब देंहटाएं
  7. सुप्रभात..
    बेहतरीन रचनाओं का संकलन के साथ विचारणीय प्रस्तुति.. सच बच्चों की पुस्तकें गायब हो गई..
    सभी चयनित रचनाकारों को बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  8. बढ़िया लिंक संयोजन सखी...
    पराग और चन्दामामा दिखाई नहीं पड़ते
    दीदी की कलम चलने लगी
    अब हम भी सामान्यतः कोशिश कर रहे है
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  9. शुभ दोपहर...
    सत्य कहा आपने....
    कितना आनंद आता था बचपन में.....कहानियां सुनकर.....
    अब के बच्चों को स्कूल के होमवर्क थोड़े से खाली वक्त में टिवी से फुरसत ही कहां है.....

    जवाब देंहटाएं
  10. बढ़िया लिंक
    बेहतरीन प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं
  11. पहले कोचिंग और ट्यूशन्स नहीं होते थे ना !!! बस स्कूल से लौटकर थोड़ा पढ़ना होता था। माता पिता इतनी बड़ी बड़ी उम्मीदें भी नहीं लगाते थे फिर भी बच्चे कभी उन्हें निराश भी नहीं करते थे (अपवादस्वरुप कुछ हो सकते हैं)बहुत से कारण हैं आज बालसाहित्य के कम हो जाने के । आज के सभी लिंक्स बेहतरीन हैं। धन्यवाद श्वेताजी मुझे भी यहाँ शामिल करने हेतु !

    जवाब देंहटाएं
  12. बेहतरीन लिंक संयोजन ! बहुत सुंदर आदरणीया ।

    जवाब देंहटाएं
  13. बचपन की सारी पत्रिकायें याद आ गई...बेहतरीन तरीके से संकलन किया हैं

    जवाब देंहटाएं
  14. इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.

    जवाब देंहटाएं
  15. प्रिय श्वेता जी -- आज के शानदार संयोजन की सभी रचनाएँ पढ़ी | सभी अच्छी हैं और सभी रचनाकारों को हार्दिक बधाई | आज की विचारणीय भूमिका के बारे में कहूँ तो मैंने अपने दोनों बच्चों को उनके छोटे होते साहित्य से जोड़ने की भरसक कोशिश की पर उन्हें अख़बार , पत्रिकाओं में छपे कार्टून और कथा पात्रों की जगह टी वी के चलते फिरते पात्र और कार्टून ही ज्यादा अच्छे लगे | उनमे ज्यादा साहित्य प्रेम ना जगा पाने की पीड़ा भीतर तक है पर तकनीकी युग में बच्चों में साहित्यिक संस्कार रोपना बड़ा चुनौतीपूर्ण कार्य है | यह बड़े शोध का विषय है | आपने इस विषय पर चिंतन किया जो समय की मांग है | सस्नेह शुभकामना --

    जवाब देंहटाएं
  16. बेहतरीन लिंक संयोजन... सभी रचनाकारों को हार्दिक बधाई !

    जवाब देंहटाएं

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