सादर अभिवादन
यूँ तो हर दिन नया, हर पल नवीन है। समय के घूमते पहिये में तारीखों के हिसाब से फिर एक साल जा रहा है और नववर्ष दस्तक दे रहा है। लोग आने वाले भविष्य के लिए नये संकल्प लेते हैं। चलिये हम और आप भी 'अंगदान' के सार्थक महत्त्व पर विचार करते है मानवता के नाम। मृत्यु के बाद
ये नश्वर देह अगर किसी को जीवन दे पाये इससे बढ़कर
मनुष्यता और पुण्य कुछ नहीं।
ये नश्वर देह अगर किसी को जीवन दे पाये इससे बढ़कर
मनुष्यता और पुण्य कुछ नहीं।
हमारी आँखें किसी के अंधेरे जीवन में उजाला भर सकती है। शरीर के अन्य उपयोगी अंग लीवर,दिल,गुर्दे त्वचा,टिशू(उत्तक), फेफड़ा इत्यादि हमारी मृत्यु के उपरांत किसी के काम आकर उनके जीवन में खुशियाँ भर सकती है। हर प्रकार की भ्रांति से परे मानवता के लिए क्या आप ऐसे उदार संकल्प के महत्व पर इस नववर्ष पर सोच सकते है? एक बार विचार अवश्य करियेगा।
चलिए अब पढ़ते है आज की रचनाएँ....
आदरणीया यशोदा दी की कलम से प्रसवित विचारणीय रचना

जब तक जी रहा
क्यों फ़िक्र करता निरंतर
ना तो परवाह कर
ना तू सोच इतना
जब जो होना है हो
जाएगा
जो मिलना है मिल
जाएगा
आदरणीय अयंगर सर जी की कलम से निकली भावपूर्ण,
स्नेहयुक्त, पवित्र अभिव्यक्ति
स्नेहयुक्त, पवित्र अभिव्यक्ति

अब चिड़िया को होश नहीं,
पहले जैसा जोश नहीं,
पर फिर भी खामोश नहीं,
फुदक नहीं वह पाती है,
बस चींचींचींचीं गाती है.
आदरणीया रेणुबाला जी की हृदय के भावों को गूँथकर
तैयार की गयी सुंदर रचना
तैयार की गयी सुंदर रचना

आत्मा की अतल गहराइयों में -
जो भरेगा उजास नित नित ,
दिन महीने गुजर जायेगे -
आँखों से ओझल न होगा किंचित ;
हो ना जाऊं तनिक मैं विचलित
प्राणों में अनत धीरज भर देना तुम !!
आदरणीय पुरुषोत्तम जी की सुंदर कृति

आपके ही ख्वाब में......
ये आ गया हूँ मैं कहाँ, पतवार थामे हाथ में,
हसरतों के आब में,
खाली से किसी दोआब में,
या आपकी यादों के किसी अछूते महराब में.
आदरणीया अपर्णा जी की नये साल के खूबसूरत ख़्वाब बुनती
उम्मीद से भरी रचना
उम्मीद से भरी रचना

नए साल में,
सरहद पर खून के छींटे
शायद कम गिरे,
छोड़ दिए जांय बेक़सूर कैदी,
सरकारी कार्यालयों में
धूल फांकती फाइलें
ले ही आयें घरों में उजास,
आदरणीया राधा जी का हमारे मंच पर स्वागत है उनकी कलम से
प्रसवित सर्वधर्म समभाव का सार्थक संदेश देती बहुत सुंदर रचना
प्रसवित सर्वधर्म समभाव का सार्थक संदेश देती बहुत सुंदर रचना
नफरत की दीवारें तोड़ो
शॉल शराफत का ही ओढ़ो
इंसानों के दिल को जोड़ो
कभी न पूजाघर को तोड़ो
धर्म हमेशा यही सिखाता
जीने की है कला बताता
आदरणीया विभा दी की कलम से निकली सुंदर संदेशात्मक रचना

"किसी का हक़ नहीं कि आपकी खुशियाँ छीने... अगर आपको पसंद नहीं तो अब , जब वे बुलाएँ तो आप तब बोलिए... देखते हैं... देखेंगे... इनसे पूछते हैं... खुद जाने का निर्णय आप कर सकती हैं... ऐसा ऊँगली क्यूँ पकड़ाईं आप ? दोषी आप भी हैं... !
और अंत में आदरणीय सुशील सर जी के उलूक टाइम्स से
चचा ग़ालिब के लिये अलग अंदाज़ में
चचा ग़ालिब के लिये अलग अंदाज़ में

अब तो एक ही
गालिब रह गया है
जमाने में गालिब
कुछ भी कहना
उसी का
शेरे गालिब हुआ
फिर मिलेंगे नये साल में तब तक के लिए
आप सभी की बहुमूल्य सुझावों की प्रतीक्षा में
वक्त के पहियों में बदलता हुआ साल
जीवन की राहों में मचलता हुआ साल
चुन लीजिए लम्हें ख़ुशियों के आप भी
ठिठका है कुछ पल टहलता हुआ साल
