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सोमवार, 26 मार्च 2018

983....ग्यारहवाँ क़दम हम-क़दम का...एहसास

है एक एहसास हमें भी.. विषय सरल होते हुए भी
क्लिष्ट भी है...ये.. 
एहसास नाम की चीज वास्तव में है क्या
परिभाषित तो कीजिए..
.....
परिभाषित करने की कोशिश पुरातन ज़माने से चालू है.....
घूम-फिरकर..ये प्यार में आकर टिक जाता है
.......

खलील जिब्रान के अनुसार- 'प्रेम अपनी गहराई को वियोग की घड़ियां आ पहुँचने तक स्वयं नहीं जानता।' प्रेम विरह की पीड़ा को वही अनुभव कर सकता है, जिसने इसे भोगा है। इस पीड़ा का एहसास भी सुखद होता है। दूरी का दर्द मीठा होता है। वो कसक उठती है मन में कि बयान नहीं किया जा सकता। दूरी प्रेम को बढ़ाती है और पुनर्मिलन का वह सुख देती है, जो अद्वितीय होता है। 
.........
प्यार और दर्द में गहरा रिश्ता है। जिस दिल में दर्द ना हो, वहाँ प्यार का एहसास भी नहीं होता। किसी के दूर जाने पर जो खालीपन लगता है, जो टीस दिल में उठती है, वही तो प्यार का दर्द है। इसी दर्द के कारण प्रेमी हृदय कितनी ही कृतियों की रचना करता है।
.....
इसे यहीं तक रखते हुए आप सब के द्वारा प्रसवित रचनाओं का आनन्द लेते है.....

सामान्य सूचनाः रचनाओँ का क्रम सुविधानुसार है..
मेरी फ़ोटो
जब रूह से
कोरे कागज पर
उतरते हैं
मूक अहसास तो
कहानी बनती है

मन के सूने गलियारों में किसीकी
जानी पहचानी परछाइयाँ टहलती हैं ,
दिल की सख्त पथरीली ज़मीन पर
दबे पाँव बहुत धीरे-धीरे चलती हैं !
पलकों के बन्द दरवाज़ों के पीछे
किसीके अंदर होने का अहसास मिलता है ,
कनखियों की संधों से अश्कों की झील में

आदरणीया मीना जी शर्मा....
तिश्नगी
तेरे अहसास में खोकर तुझे जब भी लिक्खा,
यूँ लगा, लहरों ने साहिल पे 'तिश्नगी' लिक्खा !!!

मेरी धड़कन ने सुनी, जब तेरी धड़कन की सदा,
तब मेरी टूटती साँसों ने 'ज़िंदगी' लिक्खा !!!

आदरणीय पुरुषोत्तम सिन्हा जी की दो रचनाएँ
अंकुरित अभिलाषा पलते एहसास,
अनुत्तिरत अनुभूतियाँ ये कैसी प्यास?

अन्तर्द्वन्द अन्तर्मन अंतहीन विश्वास,
क्षणभंगूर निमंत्रण क्षणिक क्या प्यास?

कानों मे गूंजती एक पुकार,
रह रहकर सुनाई देती वही पुकार,
सम्बोधन नहीं होता किसी का उसमें,
फिर भी जाने क्यों होता एहसास
कोई पुकार रहा मुझे बार-बार!

आदरणीय पुष्पांजली जी...
एहसास

एहसास तेरी कलम से कुछ यूं बहे
कि मुझे सर से पांव तक भिगो गये
आँखों का गीलापन अंतर्मन तक रिस गया
संवेदनाओं का गर्म पानी रग रग में भर गया



एहसास

है अगर एहसास ,
पास होने का
तो मीलों दूर भी
पास ही लगा करते हैं,
वरना तो एक ही कमरे
 में भी लोग मीलों
दूर हुआ करते हैं,

आदरणीय पंकज प्रियम की दो रचनाएँ
ग़ज़ल-एहसास
एहसास जगी है,दिल में खास
अब तो अपने, पास आ जाने दो।

मेरा दिल भी तो, है तेरे पास
अब तो अपने रूह ,उतर जाने दो।

एहसास

तुम हो मेरा, पहला एहसास
अब तो सांसों में,बिखर जाने दो।

जगी थी दिल में, जो एहसास
शायद तुझे नहीं, वो एहसास।

तुम थी तो बिल्कुल, मेरे पास
कुछ कहना था, तुझसे खास।

आदरणीया डॉ. इन्दिरा गुप्त की कलम से

दो हाथ सिलते ही रहते 
घर भर के एहसास सदा 
कहीं  उधड़ा कहीं  खिसा सा 
कही सिलाई निकली  जाय ।
रेशमी ,सूती कभी मखमली 
धागे एहसास के सब ले आये ।
एक एक कर बड़े जतन से 
तुरपन बखिया करती जाय ।

आदरणीय आशा मौसी की दिलकश रचना
एहसास
होता है एहसास मन को
छोटे से छोटा
प्रत्यक्ष हो या परोक्ष
मन होता है साक्षी उसका
जब होती है आहट
पक्षियों के कलरव की
जान जाती हूँ देख भोर का तारा
मन को मनाती हूँ
सूर्य का स्वागत करना है

आदरणीय कुसुम जी की भाव-भीनी रचना
एक एहसास अनछुआ सा

जुगनु दंभ मे इतराते
चांदनी की अनुपस्थिति मे
स्वयं को चांद समझ डोलते
चकोर व्याकुल कहीं
सरसराते अंधेरे पात मे दुबका
खाली सूनी आँखों मे
एक एहसास अनछुआ सा
अदृश्य से गगन को
आशा से निहारता
शशि की अभिलाषा मे

आदरणीया दिव्या जी..
एहसास है ..

एहसास है....एक
मोहब्बत का  , 
महसूस किया जा सकता है
जिसे रूह से.... 
यह उस ईश्वर
की तरह है,.... जो
कण-कण में 
विद्यमान है

आदरणीया रेणुबाला जी..
सुनो ! मन की व्यथा

ये रेगिस्तान मायूसी के -
है इनमे कोई आस कहाँ ? 
तकती है  आँखे राह तुम्हारी   -
तुम बिन इनमे कोई आस कहाँ ? 
एकांत   स्नेह से अपने भर दो-
रंग दो  रीते एह्सास  मेरे !!
कभी झाँकों  इस  सूने मन  में -
 रुक   कुछ पल साथ मेरे  !!!!!

आदरणीया सुधासिंह जी ने निकाल दी अपना भड़ास
बेवफा मोहब्बत

न मालूम था कि तुम भी निकलोगे उन जैसे ही ..
खोल दी थी अपने दिल की किताब मैंने तुम्हारे सामने
उसके हर सफहे पर लिखी हर बात को गौर से पढ़ा था तुमने..
जिसमें लिखे थे मेरे सारे जज्बात, सारे एहसास...




आदरणीया नीतू जी की रचना जो स्वयं एक प्रश्न है

एहसास कभी शब्दों का मोहताज नहीं होता
ये दुनिया कायम नहीं होती अगर एहसास नहीं होता

एहसास बना एक गूढ़ प्रश्न कितना उसको सुलझाएं
हर पल होता होता मौजूद मगर वो कभी नजर न आये

आदरणीय डॉ. सुशील भाई
जब भी लिखते हैं सच ही लिखते हैं

आइना कभी नहीं देखने वाला, दिखाने के लिये रख गया

कई दिनों के बाद 
किसी दिन कभी 
जैसे शर्म ने 
थोड़ा सा हो छुआ 
लगा जैसे कुछ हुआ 
थोड़ी देर के 
लिये ही सही 
नंगे जैसे होने का 
कुछ अहसास हुआ 
हड़बड़ी में अपने ही 
हाथ ने अपने 
ही शरीर पर 
पड़े कपड़ों को छुआ 
थोड़ी राहत सी हुई 
......
इति ग्यारहवाँ क़दम
आप सभी को आपके इस प्रयास की मंगलकामनाएँ
दिग्विजय













21 टिप्‍पणियां:

  1. वाह....
    क्या बात है
    बढ़िया..
    कमाल की रचनाएँ
    मंगलकामनाएँ
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  2. सुप्रभातम् आदरणीय सर,
    वाह्ह्ह....बहुत सुंंदर सराहनीय रचनाएँ है एहसास पर। बहुत बढ़िया प्रस्तुति। सभी रचनाकारों की सृजनशीलता नमन योग्य है।
    सुंदर अंक के लिए
    आभार आपका
    सादर।

    जवाब देंहटाएं
  3. सस्नेहाशीष संग असीम शुभकामनाएं
    बहुत बढ़िया लगती है आपकी प्रस्तुतीकरण

    जवाब देंहटाएं
  4. सुप्रभात!
    अनुभूति की खूबसूरती से व्याख्या‎ करती प्रस्तावना के साथ भावनाओं के विभिन्न पुष्पगुच्छों से सुरभित करता करता अत्यन्त सुन्दर संकलन दिग्विजय जी .एक ही विषय पर इतनी सारी रचनाएँ पढ़ने का सुअवसर प्रदान करने के लिए हार्दिक आभार .

    जवाब देंहटाएं
  5. चुनिंदा रचनाओं का बेहतरीन संकलन

    जवाब देंहटाएं
  6. अहसासों का एक समुन्दर है सामने से
    जैसे मिल रही हैं नदियाँ अहसास की।

    आभार 'उलूक' के अहसास को भी खोज कर ला कर दिखाने के लिये।

    जवाब देंहटाएं
  7. आदरणीय सर,
    एहसास के हर रंग को चुना आपने,
    शानदार प्रस्तुति...सभी रचनाकारों को बधाई

    जवाब देंहटाएं
  8. सुंदर ऐहसास......आभार आप का.....

    जवाब देंहटाएं
  9. बहुत उम्दा एहसास दिलाती रचनाएं |मेरी रचना शामिल करने के लिए धन्यवाद सर |

    जवाब देंहटाएं
  10. बूढ़ा इंतज़ार

    उस टीन के छप्पर मैं
    पथराई सी दो बूढी आंखें

    एकटक नजरें सामने
    दरवाजे को देख रही थी

    चेहरे की चमक बता रही है
    शायद यादों मैं खोई है

    एक छोटा बिस्तर कोने में
    सलीके से सजाया था

    रहा नहीं गया पूछ ही लिया
    अम्मा कहाँ खोई हो

    थरथराते होटों से निकला
    आज शायद मेरा गुल्लू आएगा

    कई साल पहले कमाने गया था
    बोला था "माई'' जल्द लौटूंगा

    आह : कलेजा चीर गए वो शब्द
    जो उन बूढ़े होंठों से निकले।

    जवाब देंहटाएं
  11. वक़्त का तकाज़ा

    होंट सिल दिए
    आवाजें दबा दी
    बहरे नहीं हो तुम
    सुनते रहो बस
    आंखें खुली रखना मगर
    अंधे नहीं हो तुम
    क्या दिखाया जा रहा है
    देखो महसूस करो
    बस आवाजें दबी है
    गूंगे नहीं तो तुम
    तुम डरे नहीं थे
    डराया गया है तुमको
    बहादुर बनने का ढोंग करो
    कायर नहीं हो तुम
    क्या लिखोगे
    क़लम भी उनकी है
    कागज भी उनका है
    लिखो मगर
    बे हुनर नहीं हो तुम
    जज़्बात काबू रखो
    अहसास दबा लो
    वक़्त का तकाज़ा है
    बस होट सिले है
    गूंगे नहीं हो तुम

    जवाब देंहटाएं
  12. बहुत अच्छी हलचल प्रस्तुति ....

    जवाब देंहटाएं
  13. बहुत अच्छा संकलन,मेरी रचना सम्मिलित करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद

    जवाब देंहटाएं
  14. जी आदरणीय बहुत उम्दा प्रस्तुति सुंदर विवेचनात्मक एहसास सभी रचनाऐं एक गहरे एहसास से रची बसी।

    जवाब देंहटाएं
  15. एहसास को परिभाषित करती ख़ूबसूरत भूमिका. बिषय आधारित रचनाओं का चाव सुखद एहसास से भर देता है. हम-क़दम का सिलसिला अब चल पड़ा है नयी राहें तलाशने. आप सब का आभार इस प्रयास में नये रंग भरने और सृजन को नये आयाम देने के लिये.
    इस अंक में सम्मिलित रचनाकारों को बधाई एवं शुभकामनायें.
    शानदार प्रस्तुतिकरण के लिये आदरणीय दिग्विजय भाई जी को बधाई.
    बस थोड़ा-सा इंतज़ार और .....कल के अंक में मिलेगा आपको हम-क़दम का अगला बिषय.
    सादर.

    जवाब देंहटाएं
  16. वाह ! सारे रचनाकारों की अनुभूतियों के हर रंग को बिखेरती बहुत सुन्दर प्रस्तुति ! मेरी एहसासों के रंग भी इस बहुरंगी कैनवस पर शोभा पा रहे हैं इसके लिए आपका हृदय से आभार दिग्विजय जी ! बहुत बहुत धन्यवाद एवं सभी रचनाकारों को हृदय से बधाई एवं शुभकामनाएं !

    जवाब देंहटाएं
  17. एहसास का एहसास किए बिना एहसास जैसे गूढ़ विषय पर नहीं लिखा जा सकता । एहसास के बिना तो मनुष्य ऐसा हो जाता है जैसे कोमा में पड़ा संवेदनहीन मरीज!!!
    सभी रचनाकारों की रचनाएँ पढ़ीं, व्यक्तिगत रूप से टिप्पणी अभी नहीं की हैं किंतु संवेदनाओं के विविध रंगों से सजी ये सभी रचनाएँ मन में तरह तरह के एहसास अवश्य जगा गईं ।
    प्रभावपूर्ण भूमिका एवं सुंदर रचनाओं से सजा हमकदम का अंक लाने हेतु आदरणीय दिग्विजय जी को भी साधुवाद।

    जवाब देंहटाएं
  18. एक से बढ़कर एक रचनाएँ संजोयी गई है.
    सभी रचनाकारों को बधाई व शुभकामना.
    मेरी भड़ास को भी सबने शांतिपूर्वक बर्दाश्त किया यह भी काबिलेतारीफ है. शुक्रिया आप सभी सुधि जनों का. 😊 😊 😊

    जवाब देंहटाएं
  19. आदरणीय दिग्विजय जी,
    अहसासों से भरी इस पुस्तक के हर पन्ने को पढ़ने का आनंद आपके शानदार प्रस्तुतिकरण से द्विगुणित हो गया । हमकदम के दीर्घायु होने की हार्दिक शुभकामना के साथ सभी रचनाकारों को बधाई ।
    सादर ।

    जवाब देंहटाएं
  20. आदरणीय दिग्विजय जी --- एक से बढ़कर एक आंतरिक अनुभूतियों को संजोती रचनाये और बेहतरीन सार्थक भूमिका में खलील जिब्रान की प्रेम पर अमर पंक्तियों ने चार चाँद लगा दिए | ये बहुत ही बड़ा सत्य है पीड़ा और विरह में से ही साहित्य को अमर रचनाएँ मिली है जो साहित्य और मानवता की थाती हैं | सभी रचनाकारों को सार्थक सृजन के लिए हार्दिक शुभ कामनाये | और आपने मेरी रचना शामिल की जिसके लिए आपकी आभारी हूँ | दुआ है नये एहसासात की महफिले यूँ ही सजती रहें | सादर ----

    जवाब देंहटाएं
  21. एहसासों से भरी बहुत ही शानदार प्रस्तुति...

    जवाब देंहटाएं

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