निवेदन।

*हम अपने पाठकों का हर्षित हृदय से सूचित कर रहे हैं कि शनिवार दिनांक 14 जुलाई, रथयात्रा के दिन हमारे ब्लॉग का तीसरा वर्ष पूर्ण हो रहा है, साथ ही यह ब्लौग अपने 11 शतक भी पूरे कर रहा है, इस अवसर पर आपसे
आपकी पसंद की एक रचना की गुज़ारिश है, रचना किसी भी विषय पर हो सकती है, जिससे हमारा तीसरी वर्ष यादगार वर्ष बन जाएगा* रचना दिनांक 13 जुलाई 2018 सुबह 10 बजे तक हमे इस ब्लौग के संपर्क प्रारूप द्वारा भेजे।
सादर


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रविवार, 28 मई 2017

681...''कारवां तो हम बनाते हैं''

                                                       

 ''कारवां तो हम बनाते हैं''
आओ ! साथी, हम
मिल करके
दूर देश को
साथ चलें
कोमल सा
एक हृदयस्पर्शी
एक दूजे की
आवाज़ बनें।
सादर अभिवादन आप सभी गणमान्य पाठकों का
आज की पसंदीदा रचनाओं की ओर
कदम बढ़ाते हैं


 'भावों की गरिमा'.... 'सुधा सिंह जी' 


                                              


भावों की क्या बात करें
भावों की अपनी हस्ती है
भावो के  रंग भी अगणित हैं
इससे ही दुनिया सजती है
                              


                                                                       
                                              
बुजुर्गों के लिये थोड़ी मुहब्बत द़िल मे रख लेना
मुसलसल उम्र ढ़लती है शज़र गिर जायेगा एक दिन।    
                                                                           
                       
'अंतर्मन' ...... आदरणीय 'विभा ठाकुर जी' की रचना मन को छूती हुई 


                                                        

कही कोई देख न ले कि
बेटी के जन्म पर माँ खुश हैं
कही कोई सास को ताने न मार दे
तेरी बहु कैसी है आई!

अपनी रचना के माध्यम से सपनों के महत्व  पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं कि 
प्रत्येक मानव के जीवन में स्वप्न अहम् भूमिका निभाते हैं  

                                                     

गूँजती हैं कहीं जब ठिठकते से कदमों की आहट,
 बज उठती है यूँहीं तभी टूटी सी वीणा यकायक,



                                                   

मृदुल-स्नेह की विह्वलता सी
ईश की अनुपम सुन्दरता सी.
दायित्व निभाती हर पल सारे
बहाती ममता साँझ-सकारे

'श्वेता सिन्हा जी' की अनूठी रचना जो 'भावनाओं' को 'प्रकृति' से जोड़ती है

                                                           


हवा के नाव पर सवार

बादल सैर को निकलते है
असंख्य ख्वाहिशों की कुमुदनी
में खिले सितारों की झालर
झील के पानी में जगमगाते है


                       
    अंत में, मैं "एकलव्य" आदरणीय 'यशोदा दीदी' एवं 'पाँच लिंको का आनंद' परिवार के सभी सदस्यों का हृदय से आभार प्रकट करता हूँ जिन्होंने मुझे आज की प्रस्तुति बनाने योग्य समझा।    
आज्ञा दें 
धन्यवाद। 








12 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत उम्दा संकलन,सुंदर लिंकों का चयन,मेरी रचना को मान देने के लिए शुक्रिया।

    उत्तर देंहटाएं
  2. शुभ प्रभात.....
    मंजे हुए चर्चाकार की तरह
    कमाल की प्रस्तुति
    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  3. शुभ प्रभात जी
    सारी रचनाए बहुत सुन्दर है 🌹

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत उम्दा प्रस्तुति. मेरी रचना को स्थान देने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया. सादर

    उत्तर देंहटाएं
  5. एकलव्य जी को उनकी रचनाओं के संकलन के अथक प्रयास हेतु बधाई। भाई मजा आ गया।

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत अच्छी हलचल प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  7. अपनी सशक्त रचना के माध्यम से समाज को करारा जवाब

    उत्तर देंहटाएं
  8. स्वागत है 'एकलव्य'। बहुत उम्दा प्रस्तुति।

    उत्तर देंहटाएं
  9. बहुत बढियासंकलन...
    गहन अध्ययन का परिणाम-ध्रुव जी!बहुत बहुत शुभकामनाएं...

    उत्तर देंहटाएं
  10. आज की प्रस्तुति के लिए एकलव्य जी बधाई के पात्र हैं। पाठकों की अभिरुचियों के अनुरूप रचनाओं का चयन कर आपने आज के अंक को आकर्षक और विचारणीय प्रस्तुति बना दिया है। सभी चयनित रचनाकारों को भी हार्दिक बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  11. खूबसूरत हलचल! हार्दिक बधाई एकलव्य जी ।

    उत्तर देंहटाएं

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