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सोमवार, 21 जनवरी 2019

1284..हम-क़दम का चौवनवाँ अंक

स्नेहिल नमस्कार

मानवता की सीख बचपन से ही
कंठस्थ करवाया जाता है
जब घर के बड़े समझाते हैं
"सबसे प्यार करो"
"पशुओं पर दया करो"
"भूखे को खाना खिलाओ"
"प्यासे को पानी पिलाओ"
"किसी को अपने फायदे के लिए मत सताओ"
और भी न जाने कितनी अनगिनत बातें होगी
जो हम सभी समझते और जानते हैं।
फिर भी समाज में अमानवीयता और बर्बरता 
की बहुलता,असंतुलन
क्या हमारी जड़ोंं के
खोखलेपन का संकेत है?
या फिर,
मानवता और दानवता के 
दो पाटों में पीसते मनुष्य मन
की कहानी
सृष्टि के विधान के अनुसार? 

★★★★★
अब आइये हम आस्वादन करते हैं
हमक़दम के विषय पर सृजित 
आपकी कुछ नयी -पुरानी रचनाओं का-


आदरणीया अभिलाषा चौहान

हालातों से लड़ना सिखाया
सपने पूरे करने का
हौसला मन में आया
धीरे-धीरे होने लगे
अविष्कार साधन के
लोगों को जीना आया
★★★★★★
आदरणीया अभिलाषा चौहान
मानवता शुष्क होती जा रही है,
चमक अपनी खोती जा रही है।
स्वार्थ का आवरण लिपटा जबसे,
तबसे अंधेरे में खोती जा रही है।

★★★★★★
आदरणीयआशा सक्सेना

हुई मानवता शर्मसार
रोज  देखकर  अखवार
बस एक ही सार हर बार
मनुज के मूल्यों का हो रहा हनन   
 ह्रास उनका परिलक्षित
 होता हर बात में

आसपास क्या हो रहा
★★★★★★
आदरणीया अनिता सैनी जी
मानवता

प्यास  से  अतृप्त  सूख़  रहे   पेड़, 
लोग पानी  पिलाने लगे  ,
     कुछ  ने  बधाया  ढाढ़स,  
कुछ  अस्पताल  ले  जाने  लगे , 
     उलझ  गया  वो  माँझे  में ,  
पँख  उसके   फड़फड़ाने  लगे  ,
     न करेंगे अब पतंगबाजी,
मनुष्य आजीवन यही प्रण निभाने लगा,
      सींच रहें मोहब्बत के फूल, 
धरा  भी अब मुस्कुराने लगी,
फूट रहे दिलों में प्रेम के अंकुर, 
मनुष्य भी अब खिलखिलाने लगा
★★★★★
आदरणीय विश्वमोहन जी
सब कुछ मौन
निस्तब्ध, जड़
सिर्फ काल
चंचल , गतिमान !

बीच बीच में टपकते
सीमेंटी शहतीरों के शोर
‘कंक्रीट-कटर’ मशीनों की घर्र-घर्र
नेपथ्य से चीखती चीत्कार
★★★★★★

आदरयणीय अमित निश्छल जी

विवश मनुज को तीर लगाने
भोजन, वस्त्र, नीर पहुँचाने,
भगवन रूप बदलकर आख़िर
देवदूत बन आए हैं;
और निकम्मे से दिखते जो
वीर, बंधु-बांधव सारे वो
नाना प्रकार सहयोग बढ़ाने
मुद्रा-द्रव्य भी लाये हैं।

आदरणीय दिगम्बर नासवा जी
मेरी फ़ोटो
जातिवाद का जहर घोलते
राष्ट्र वेदी पर स्वार्थ तोलते
अपनो का प्रतिघात हो जब
तब कैसे जीवन बीतेगा 

★★★★★★
आदरणीय सतीश सक्सेना जी

कितना सुंदर सपना होता 
पूरा विश्व  हमारा  होता । 
मंदिर मस्जिद प्यारे होते 
सारे  धर्म , हमारे  होते ।  
कैसे बंटे,मनोहर झरने,
नदियाँ,पर्वत,अम्बर गीत । 
हम तो सारी धरती चाहें , स्तुति करते मेरे गीत ।  

★★★★★★★

आदरणीया मीना जी
बापू
मानव ने पाई देश-काल पर जय निश्चय
मानव के पास नहीं मानव का आज हृदय !

है श्लाघ्य मनुज का भौतिक संचय का प्रयास,
मानवी भावना का क्या पर उसमें विकास ?

★★★★★★
आदरणीय रोहित जी

सुनो! मानवता रही है मुझ में
सच को सच कहा है, खैर
भैंस के आगे बीन क्यों बजाऊं-
तुम एक दायरे में हो
आभासीय स्वतन्त्रता लिए हुए.
★★★★★★


आदरणीय सुधा जी


मात्र मानव को दी प्रभु ने बुद्धिमत्ता !
बुद्धि से मिली वैचारिक क्षमता....
इससे पनपी वैचारिक भिन्नता !
वैचारिक भिन्नता से टकराव.....
टकराव से शुरू समस्याएं ?
उलझी फिर "मन" से मानवता !
★★★★★
आदरणीय साधना जी
मैं स्वयं ही 
इतना दीन न बन जाऊँ
कि उस पीड़ित की  
व्यथा ही न देख सकूँ,
किसी अबोध के सामने 
इतना बधिर न हो जाऊँ 
कि उसकी कातर 
पुकार ही न सुन सकूँ
किसी असहाय वृद्ध के सामने 
इतना वज्र न बन जाऊँ कि
उसको सहारा भी न दे सकूँ ! 

★★★★★
आदरणीया कुसुम कोठारीजी
सिसकती मानवता
सिसकती मानवता
कराह रही है

हर ओर फैली धुंध कैसी है

बैठे हैं एक ज्वालामुखी पर

सब सहमें से डरे डरे
बस फटने की राह देख रहे
फिर सब समा जायेगा
एक धधकते लावे में ।
★★★★★
उलूक के पन्ने से
जब उधार देने में रोते हो
जान तक देने 
की बात सुनी 

गई है कई बार 

तुम्हारे मुँह से 


चाँद तारे तोड़ 
कर लाने की 
बात करते हो 

कितने बेशरम 
हो तुम यार 

★★★★★
और चलते-चलते
आदरणीय शशि जी की लेखनी से
अमानवीय हाथ की बात से ही अपने विचारों को व्यक्त करने का 
प्रयास करता हूँ। जिसने प्रथम विश्वयुद्ध ( महाभारत) को जन्म दिया। 
याद करें हस्तिनापुर की वह राजसभा जिसमें एक धर्मराज ने जिन 
हाथों से पासा फेंक द्यूतक्रीड़ा में अपनी पत्नी को दांव पर लगाया था , युवराज के उस हाथ को भी जो बार - बार जंघा को थपथपा रहा था, 
किसी नारी कि अस्मत को तार- तार करने के लिये उतावला हो 
रहा था और उन हाथों को भी जिसने भरी सभा अग्रज की 
पत्नी के चीरहरण का प्रयास किया।
★★★★★
आप सभी के द्वारा सृजित
आज यह विशेषांक कैसा लगा?
आपकी बहुमूल्य शुभकामनाएँ और सुझावों
की प्रतीक्षा रहती है।
हमक़दम के अगले अंक के विषय में
जानने के लिए
कल का अंक पढ़ना न भूलें।


-श्वेता सिन्हा 

27 टिप्‍पणियां:

  1. मानवता पर विचार मंथन से भरे इस अंक की सुंदर प्रस्तुति और पथिक को भी इससे स्थान देने के लिये हृदय से धन्यवाद श्वेता जी।
    सभी को सुबह का प्रणाम।

    जवाब देंहटाएं
  2. शुभ प्रभात सखी...
    बढ़िया अंक..
    सिसकती मानवता
    कराह रही है
    सादर..

    जवाब देंहटाएं
  3. शुभ प्रभात ...
    अत्यंत ही संवेदनशी विषय पर नितांत आवश्यक प्रश्न उठाती बहुत ही सुंदर प्रस्तुति ।
    वैचारिक भिन्नता से टकराव.....
    टकराव से शुरू समस्याएं ?
    उलझी फिर "मन" से मानवता !

    जवाब देंहटाएं
  4. शुभ प्रभात आदरणीय श्वेता जी
    बहुत सुन्दर हमक़दम की प्रस्तुति
    बहुत सुन्दर मानव मन में उलझी मानवता...हर एक का आधार वही हर एक की पुकार वही, बहुत सुन्दर
    मेरी मानवता को स्थान देने के लिए सह्रदय आभार आप का ,
    सभी रचनाकारों को हार्दिक शुभकामनायें
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  5. मानवता और दानवता के पाटों के बीच पीस रहे मानव जीवन की जलन को सजीव कर दिया है आपके इस सार्थक संकलन ने.
    'बड़ी जलन है इस ज्वाला में, जलना कोई खेल नहीं है.
    इधर देखता हूँ करुणा से, मानवता का मेल नहीं है.'......बहुत आभार और बधाई इस प्रस्तुति का. सच में, कारवाँ चलता रहे.

    जवाब देंहटाएं
  6. इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.

    जवाब देंहटाएं
  7. सुप्रभात |धन्यवादमेरी रचना शामिल करने के लिये |

    जवाब देंहटाएं
  8. हलचल का सुन्दर चौवनवाँ अंक। आभार श्वेता जी 'उलूक' के पन्ने को स्थान देने के लिये।

    जवाब देंहटाएं
  9. वाह!!श्वेता ,बहुत खूबसूरत प्रस्तुति!!

    जवाब देंहटाएं
  10. शानदार प्रस्तुती.
    मानवता पर सकारात्मक दृष्टिकोण की रचनाएँ बेहद उम्दा लगी.
    आभार.

    जवाब देंहटाएं
  11. सुंदर प्रस्तुति शानदार रचनाएं मेरी रचना को स्थान देने के लिए आपका बहुत बहुत आभार श्वेता जी।

    जवाब देंहटाएं
  12. मानवीय संवेदनाओं को व्याख्यायित करती विविधरंगी खूबसूरत रचनाओं को सुन्दर संकलन ।

    जवाब देंहटाएं
  13. विचारधाराओं का मंथन ... उद्वेलित करते हुए संकलन के सभी प्रतिभागी ... सुंदर रचनाएँ ...
    आभार मेरी रचना को इस संकलन में शामिल करने के लिए

    जवाब देंहटाएं
  14. बहुत ही सुन्दर रचना संकलन एवं प्रस्तुति श्वेता जी,
    'आवश्यकता ने हमें'अनुराधा जी की रचना है,आप
    उसे सही कर दें।
    मेरी रचना को स्थान देने के लिए सहृदय आभार ।

    जवाब देंहटाएं
  15. वाह!!बहुत सुंदर प्रस्तुति!!

    जवाब देंहटाएं
  16. बहुत सुन्दर रचनाओँ का संकलन एक अच्छे विषय पर।

    जवाब देंहटाएं
  17. अपनी रचना को इस अंक में देख कर विस्मित विमुग्ध हूँ श्वेता जी ! हृदय से आपका बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार ! मैं एक हफ्ते के लिए बाहर गयी हुई थी ! कम्प्युटर और इंटरनेट से दूर इसलिए रचना भेज नहीं सकी ! इसका दुःख भी था मुझे ! लेकिन चमत्कृत हूँ कि आपने मेरे ब्लॉग से सर्वथा सटीक रचना चुन कर मुझे इस सफ़र में अपने हमकदमों से पिछड़ने से बचा लिया ! हृदय से आभार आपका !

    जवाब देंहटाएं
  18. मानवता और दानवता के
    दो पाटों में पीसते मनुष्य मन
    की कहानी
    सृष्टि के विधान के अनुसार?


    गहरे सवाल हैं इस बात मे..
    सुंदर संकलन स्वेता जी।बहुत सुंदर रचनाये।
    आभार

    जवाब देंहटाएं
  19. शानदार प्रस्तुतिकरण उम्दा लिंक संकलन....
    मेरी रचना को स्थान देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार...।
    आश्चर्य चकित हूँ श्वेता जी आपके इस कौशल पर कैसे नयी पुरानी रचनाएं विभिन्न ब्लागों से संकलित कर विशेषांक को और भी विशेष बना कर सजाया हैं आपने...सादर नमन आपको...

    जवाब देंहटाएं
  20. सुन्दर संकलन |मेरी रचना शामिल करने के लिये धन्यवाद श्वेता जी |

    जवाब देंहटाएं
  21. उम्दा प्रस्तुति बेमिसाल प्रारंभ सामायिक चिंतन देती सटीक भुमिका।।
    सारा संकलन आकर्षक।
    सफर में और व्यस्तता में विषय पर कुछ नही लिख पाई पर घोर आश्चर्य! श्वेता आपकी प्रतिबद्धता से मैं अभिभूत हूं आप मेरी रचना खोज कर ले आईं अचानक अपनी रचना देख कर मैं विस्मय और आंनद से भर गई। सच मैं आभार कह कर आपके अथक प्रयास और कर्मठता को कम नही कर सकती बस स्नेह स्नेह और साधुवाद ।

    जवाब देंहटाएं

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