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बुधवार, 23 अगस्त 2017

768..कम से कम तवील राहों के सिम्त..

२ ३ अगस्त २ ० १ ७  

।। जयतु भास्कर ।।

उषा स्वस्ति..*

समाज के लिए कुछ बातें सहज ग्राह्य  नहीं होतें..
थोपे हुए रीति-रिवाज़ ही  विद्रोह का कारण
बनी, जो एक सामूहिक आवाज़ बन कर उभरी...

जुल्म कब तक सहूँ,
गर जिंदा हूँ 
तो हक के साथ जिंदा ऩज़र आना भी ज़रूरी है..

सुप्रीम कोर्ट का एक एतिहासिक फैसला
 मुस्लिम महिलाओं के  लिए नए युग की  शुरुआत...

चलों, कम से कम तवील राहों के सिम्त एक कदम तो, बढ़ी ...

तो..फिर बढतें है,

 आज़ की लिंक की ओर जिसे अनेक कोणों

 से ढूंढ  कर एक सूत्र में पिरोने की कोशिश

जो आप सभी के समक्ष इस प्रकार से है...

प्रकृति के अमर और नश्वर रूप का मनोरम वर्णन करती
 आदरणीया श्वेता जी की रचना...




प्रकृति करेगी नित नये श्रृंगार
सूरज जोगी बनेगा

ओढ़ बादल डोलेगा द्वार द्वार
झाँकेगी भोर आसमाँ की खिड़की

कल्पतरु ब्लॉग से अनुभव पर आधारित रचना....




टिफिन तैयार करके देती हैं, वे सुबह जल्दी उठकर

सारी सब्जियाँ काटकर, पकाकर, अच्छे से सजाकर

 ऑफिस के लिये टिफिन तैयार करके देती हैं।

 परंतु कई बार होता है कि हमें या तो टिफिन का 

खाना अच्छा नहीं लगता है, टिफिन पास में होते

 हुए भी बाहर का खाना खाने की इच्छा होती है या फिर

आदरणीय सुमित प्रताप सिंह जी की रचना..

भाई जिले!
हाँ बोल भाई नफे!
आज कैसे उदास हो बैठा है?
कुछ नहीं भाई बस इस जीवन से निराश हो गया हूँ।
वो क्यों भला?


प्रियंका गुप्ता द्वारा विचारपूर्ण लेख..



बरसों क्या, शायद सदियों पुरानी कहावत है ये...नेकी कर, दरिया में डाल...| आज तक 

बाकी दुनिया की तरह मेरे लिए भी इसका बस एक ही मतलब था...किसी का भला करो 

और उसे हमेशा के लिए भूल जाओ...| भूल जाओ ताकि न तो तुमको अपने किए

 परोपकार पर कोई अहंकार हो, और न ही तुम्हारे दिल में सामने वाले से उस अहसान

आदरणीया  ----कमला सिंह ' ज़ीनत' जी, की खूबसूरत गज़ल...

इक  मेरे  सहारे  को  बस  मेरा  खुदारा था 

गर्दिश ने जो घेरा तो कुछ काम  नहीं आया 
कहने  के लिए यूँ तो  कश्ती  का सहारा



#TripleTalaqसुबह तो मिली ...
          बड़ी लंबी रात थी..

अब मैं यहीं थमती हूँ.. कल की प्रस्तुति आदरणीय रवीन्द्र जी की है.


सम्यक् समीक्षा कर अभिव्यक्त करें,
| समाप्तम् |
धन्यवाद |
पम्मी



*वैदिक संस्कृति में प्रभात में 'उषा स्वस्ति ' और रात्रि में 'निशा स्वस्ति ' कहने की 
परंपरा है 




12 टिप्‍पणियां:

  1. शुभ प्रभात..
    बेहतरीन प्रस्तुति
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  2. वाह ! लाजवाब लिंक संयोजन ! बहुत सुंदर आदरणीया ।

    जवाब देंहटाएं
  3. 'चलों, कम से कम तवील राहों के सिम्त एक कदम तो, बढ़ी ...'अपनी ज़ज्बातों को उजागर करने के लिए कब से इन अल्फाजों का इंतज़ार कर रहा था !इतनी लम्बी रात तो बीती,एक हसीन हलचल के साथ!शुक्रिया!!!

    जवाब देंहटाएं
  4. उषा स्वस्ति पम्मी जी,
    बहुत सुंदर लिंकों का संयोजन,संक्षेप में कही गयी आप की सारगर्भित बातें प्रभावपूर्ण है।
    मेरी रचना को मान देने के लिए हृदय से.अति आभार आपका।

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत बेहतरीन संकलन पम्मी जी ।

    जवाब देंहटाएं
  6. शुभप्रभात....
    सुंदर संकलन....
    आभार।

    जवाब देंहटाएं
  7. बहुत अच्छी हलचल प्रस्तुति ..

    जवाब देंहटाएं
  8. सुन्दर प्रस्तुतिकरण के साथ उम्दा संकलन...

    जवाब देंहटाएं
  9. आदरणीय पम्मी जी आज के अंक की प्रस्तुति समसामायिक मुददों की चर्चा को एक नया आयाम दे रही है शुभकामनाओं सहित ,आभार ''एकलव्य"

    जवाब देंहटाएं
  10. वाह पम्मी जी! शानदार सूत्रों का संकलन। हिंदी ,उर्दू एवं संस्कृत शब्दावली से परिचय.....उषा स्वस्ति और निशा स्वस्ति का उल्लेख अच्छा लगा। यही है नवीनता और मौलिकता की ख़ुशबू। सभी चयनित रचनाकारों को बधाई एवं शुभकामनाऐं। आभार सादर।

    जवाब देंहटाएं

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