पाँच लिंकों का आनन्द

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शनिवार, 12 अगस्त 2017

757.... दीवारें


सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष

चौथे पड़ाव
चिहुँकता मौन
झेलते अकेलेपन का दंश
कल जो दिया
आज वही तो पाया
उदाहरण में कहाँ चूके वंश




हमारी दुनिया के लोगों से 
भरी पड़ी है दूसरी दुनिया पर 
सामंजस्य स्थापित करना 
बहुत ही कठिन है 
दूसरों के दुःख सुन कर 
समझ कर अपना दुःख 
तिनका सा लगता है


भारतीय दीवारें


धान की क्यारियों में
भीगी-भीगी नरमाहट- सी
काली मिट्टी में निपजती
गौरांग नवजात -सी रूई की मखमली गुड़िया !
बरगद के पेड़ की
छाया को समेटती
पीपल की बांह पर
नीड़ों को सोने देती


तस्वीरों से भरी दीवारें



लटका दिया था
प्लास्टिक का हार,
धूल भी तो साफ नही करता कोई,
कि अब फ्रेम में दम भी घुटता है।

अब यहाँ कोने में पड़े हैं,
इंतजार है किसी दिन,
पोता आकर तोड़ देगा फ्रेम को,
आजाद हो जायेंगे,
खुली हवा में लौट जायेंगे।



कच्ची दीवार



 दिल मुझपे लुटाया है तो कुछ खास नहीं
आज या कल में तो उनको भी समझना ही था

 कितनी मुद्दत से जलाता रहा दिल को अपने
ऐसे गुलज़ार को दिलदार तो बनना ही था



अभी देर है



सजा लो लाख दरवाजे,दीवारें, महल या कोठी
बहुमूल्य इमारत से घर को बनाने में अभी देर है।

क्यों समझाते हो उन्हें, कद्र क्या है रिश्तों की
जिन्हें रिश्ता  ही समझने में अभी देर है।

जिसकी तस्वीर आब - ऐ - चश्म से धुलता रहा,
उसे तुझ तक तो पहुंचने में  अभी देर है।



><><

फिर मिलेंगे




8 टिप्‍पणियां:

  1. शुभ प्रभात दीदी
    सादर नमन..
    धूल भी तो साफ नही करता कोई,
    कि अब फ्रेम में दम भी घुटता है।
    होता ही है ऐसा..होने वाला भी है
    उत्तम चयन
    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  2. शुभ प्रभात। सुंदर प्रस्तुति। बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  3. शुभ प्रभात आदरणीय
    आज संकलन पूर्णतः भिन्न है
    दीवारों में छिपी भावनायें
    कहीं क्रंदन करती ,पुकारती
    आस से देखतीं ,टीसती
    सत्यता के पट खोलती
    दीवारें जीवन के कई रंग
    बहुत उम्दा ! आभार
    "एकलव्य"

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत ही सराहनीय उम्दा संकलन आदरणीय
    पठनीय लिंकों का संयोजन।

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत ही सुंदर प्रस्तुति। बधाई..

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति विभा जी।

    उत्तर देंहटाएं
  7. सुंदर संयोजन विभाजी...'दीवारें'शब्द से एक भूली हुई गजल याद आ गई....
    दीवारों से मिलकर रोना अच्छा लगता है
    हम भी पागल हो जाएँगे ऐसा लगता है।
    दुनिया भर की यादें हमसे मिलने आती हैं
    साँझ ढले इस सूने घर में मेला लगता है।
    किसको 'कैसर' पत्थर मारें,कौन पराया है
    शीशमहल में हर इक चेहरा अपना लगता है।
    ....सभी चयनित रचनाकारों को बधाई ।

    उत्तर देंहटाएं

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