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सोमवार, 28 अगस्त 2017

772......लेना इनका धर्म ! देना हमारा जन्मसिद्ध कर्तव्य

"परिवर्तन" एक क्रांतिकारी शब्द जिसका महत्व तब भी था जब हम अंग्रेज हुक्मरानों के ग़ुलाम थे और आज जब हम आज़ाद राष्ट्र के नीच मानसिकता रखने वाले जनप्रतिनिधियों के तामीरदार हैं। 
अंतर केवल इतना तब हम आज़ाद देश के सपने देखा करते थे ,स्वयं के अधिकार की बात किया करते ! आज़ हम धर्म सिद्धि हेतु लालायित हैं। 

धर्म के ठेकेदार हमारे पूज्यनीय जिनका महिमामंडन 
हम आँख बंद करके बड़ी ही तन्मयता से कर रहें  हैं भले ही हमारे धर्म गुरु भोग -विलास में लिप्त हों अथवा कुछ छोटे -मोटे सामाजिक कार्य करके हमारे आँखों में धूल झोंक रहे हों। 

कुछ बुद्धिजीवी वर्ग जब हमारे आँखों पे लगा अन्धविश्वास का ये सफ़ेद चश्मा हटाने की कोशिश करता है हम उसी 'परिवर्तन के द्योतक' को  अपनी कुण्ठा की मैली चादर में लपेटकर क़ब्रिस्तान की सून-सान गलियों में एकांत भटकने को विवश करते हैं। वो चाहे देश का सच्चा सपूत 
शहीद ''राम चन्दर छत्रपति''
अथवा हममें से कोई एक मानव जाति को शर्मसार करने वाला यह कृत्य यहीं नही रुकता ! हमारी जनता जनार्दन जिसके अटूट विश्वास को अपने मज़बूत कन्धों पर ढोकर देश के पवित्र स्थल संसद तक पहुँचने वाले बड़े ही मेहनती व कर्मठ जिन्होंने अपने  सम्पूर्ण  जीवन में पवित्र गीता -क़ुरान पर हाथ रखकर न जाने कितनी बार सत्य का दामन थामा और सत्य का साथ लिया ,क्षमा कीजिएगा क्योंकि हमारे जनप्रतिनिधि देना नहीं, लेना ही जानते हैं। ये बात और है कि कभी 
राष्ट्र की अस्मिता, तो कभी किसी निर्दोष नागरिक की जान 
लेना इनका धर्म !  और देना हमारा जन्मसिद्ध  कर्तव्य 
परन्तु परिवर्तन की बात न करें ! इसमें ही आपका कल्याण है
ऐसा नहीं कि हमारा रक़्त पानी हो चुका है 
बल्कि हममें अभी भी इच्छाशक्ति की पूर्णरूप से कमी है 
कुछ मानव समय रहते चेत जाते हैं एवं कुछ चिरनिद्रा में विराजमान अपनी बारी की प्रतीक्षा करते हैं। ऐसा ही एक भारत का वीर सपूत जाग उठा एवं परिवर्तन का ध्वज बुलंद किया। परिणाम तो निश्चित था ! 
परन्तु अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज़ किया। 
इस राष्ट्र के सच्चे सपूत को 
"पाँच लिंकों का आनंद"
परिवार भावभीनी श्रद्धांजलि 
अर्पित करता है एवं आपसभी रचनाकारों व पाठकगणों से अपने विचार व्यक्त करने का अनुरोध करता है।   

शहीद ''राम चन्दर छत्रपति''
''भावभीनी श्रद्धांजलि ''

सादर अभिवादन 

चलिए आज रचनाओं में परिवर्तन का दामन थामते हुए "शब्द नगरी" के प्रमुख साहित्य साधकों की बात करते हैं जो प्रथम दृष्टया  हमारे ब्लॉग पर पधार रहे हैं। इनका स्वागत है इस परिवर्तन के मेले में एवं इस प्रस्तुति की विशेष बात यह भी है कि इसका सम्पूर्ण श्रेय मैं आदरणीया क्रांतिकारी लेखिका "रेणुबाला" जी  को देना चाहूँगा आपके प्रयास को नमन !

''मैं मटमैला माटी सा''
प्रथम रचना आदरणीय "एस कमलवंशी" जी की जो मानव के जीवन की सारभौमिक सत्य पर आधारित है 

जनम हुआ माटी से मेरा, माटी पर ही लिटाया,
माटी चखी, माटी ही सखी, माटी में ही नहाया।
माटी-घर, माटी ही घाट, माटी के खेत का खाया,
माटी-चाक आजीविका, माटी का धन मैं लाया।। 

"झोपड़े का मानसून"
दूसरी 'कृति' आदरणीय "मनोज कुमार खंसली" द्वारा रचित

उसके बदन से चिपकी साड़ी,
माथे से बहकर फैले कुमकुम,
या केशों से टूटकर गिरते मोतियों कि कैसे करूँ बात???...
रूमानी अफ़सानों में ?!!!?
जब बैठकर गुजरी है,...यहाँ रात,
भीगने से बचाते बिछौना बच्चे का, ...
फूस के कच्चे मकानों में ?!!!?

  ग़ज़ल.........  

आदरणीय "महातम मिश्रा'' जी की एक गज़ल 

 "गज़ल" तुझे दर्द कहूँ या खुशी 
आंखों को चुभी बेवशी छुट हाथ ले लो तिरंगा
 अभी उम्र है, कि बदनशी।।
 भूख आजादी गरीबी आहत आँसू है कि हँसी।। 

 ये कैसा सिलसिला है.......
आदरणीया "अपर्णा त्रिपाठी" जी की एक 
'कृति' 

 क्यो नही रुकता ये सिलसिला
सिलसिला जिसमें चले जाते है सब
धरम की आड में बिना समझे
एक अन्धेरी खोखली गली


 सच्चा सौदा था नहीं, पता चल गया आज।
छल-फरेब के जाल को, समझा सकल समाज।।

देख लिया संसार ने, कामुकता का हाल।
बाबाओं ने कर दिया, गन्दा पूरा ताल।।

 जिओ और जीने दो
अंत में, आदरणीय "रविंद्र सिंह यादव" जी की एक 
'कृति' 

कितना नाज़ां / स्वार्थी  
और वहशी है तू ,
तेरे रिश्ते 
रिश्ते हैं 
औरों के फ़ालतू।
चलो अब फिर 
समझदार
नेक हो जायें 

चलते -चलते "मेरी भावनायें" 

मैं आज मरूँगा 
कल आऊँगा 
तुझको सत्य दिखाऊँगा !
तेरे मैले क़ब्रों पर 
अश्रु नहीं बहाऊँगा !
कल वे फाड़ेंगे 
तेरी क़ब्रें 
देख -देख 
चिल्लाऊँगा !
रोएगा तूँ 
रक़्त के अश्रु 
कायर तुझे बताऊँगा !
ओ ! धरती पर रेंगनें वालों 
कीड़ा तुझे बनाऊँगा !
शान भरा, ये गौरव मष्तक 
आगे नहीं झुकाऊँगा !
शर्म -शर्म चिल्लाऊँगा मैं 
शर्म -शर्म चिल्लाऊँगा 
कीड़ा तुझे बनाऊँगा !

( प्रस्तुत अंश मेरे स्वयं के विचार व लेखनी की विवशता है )

23 टिप्‍पणियां:

  1. शुभ प्रभात भाई ध्रुव सिंह जी
    जागरूकता जरूरी है
    हम प्रयास ही कर सकते हैं
    एक बेहतरीन प्रस्तुति
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  2. आदरणीय ध्रुव जी,
    सुप्रभात,
    परिवर्तन का सराहनीय प्रयास आपके द्वारा।
    आपके सुंदर ओजपूर्ण विचारों से सजा आज का सुंदर अंक,शब्द नगरी के विचारशील रचनाकारों की लाज़वाब कृतियाँ ,सुंदर प्रस्तुति करण और आपकी लेखनी के सार्थक शब्द। मेरी श्रद्धांजलि हर उस शहीद को जो देश की खातिर आये दिन शहीद होकर गुम हो जाते है।जिन्हें चार दिन बाद कोई याद भी नहीं करता।
    शुभकामनाएँ आपको सुंदर संयोजन के लिए और चयनित रचनाकारों को बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  3. परिवर्तन के मेले के सभी सूत्रों एवं सूत्रधार का आभार एवं नमन! छत्रपति की आहुति कुसंस्कार के रक्तबीजों को झुलसाती रहेगी. समाज में न्याय, मर्यादा और संस्कार ध्रुव की तरह अटल रहेंगे.

    जवाब देंहटाएं
  4. बेहतरीन संकलन ध्रुव जी ,आपके विचार क्रान्तिकारी और समाज मे परिवर्तन लाने में सक्षम हो,प्रयासरत रहें सच्ची जागरूकता सच्चे विचारों से आती ही है ।

    जवाब देंहटाएं
  5. हमारे भारत की जनता बहुत सहनशील है..।
    मार खाते रहते हैं...
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  6. मैं आज मरूँगा
    कल आऊँगा
    तुझको सत्य दिखाऊँगा !
    तेरे मैले क़ब्रों पर
    अश्रु नहीं बहाऊँगा !

    very touching lines.
    Really very fine observations pendowned.

    Thanks to consider my writing for 5 links.

    जवाब देंहटाएं
  7. आदरणीय ध्रुव जी भावपूर्ण भुमिका के साथ सुंदर चर्चा.....

    जवाब देंहटाएं
  8. बहुत अच्छी भूमिका के साथ सुन्दर हलचल प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं
  9. मैं आज मरूँगा
    कल आऊँगा
    तुझको सत्य दिखाऊँगा !
    तेरे मैले क़ब्रों पर
    अश्रु नहीं बहाऊँगा !
    कल वे फाड़ेंगे
    भावपूर्ण अभिव्यक्ति.।
    बेहतरीन संग्रहणीय संकलन..
    सभी रचनाकारों को बधाई..
    धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं
  10. चुनिन्दा रचनाओं का संकलन आज की हलचल में ! सभी बहुत ही सुन्दर एवं सारगर्भित ! आभार इस प्रस्तुति के लिए एकलव्य जी !

    जवाब देंहटाएं
  11. ध्रुव जी की धारदार कलम से लिखी भूमिका ने इस चर्चा को नया आयाम दिया है। इस चर्चा में सम्मलित सभी रचनाओं के रचनाकार को हार्दिक शुभकामनाएँ एवं बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  12. बहुत ही आकर्षक शुरुआत के साथ उम्दा लिंक संकलन...और अंंत में आपकी भावनाएं.... जो पाठक को भावविभोर करने में सर्वथा सक्षम हैं...वाह!! ध्रुव जी! बहुत ही उम्दा प्रस्तुति.... बधाई...

    जवाब देंहटाएं
  13. उत्तेजक उद्वेलित करते विचार हैं आपके ...
    अच्छे सूत्र संजोये हैं ...

    जवाब देंहटाएं
  14. प्रिय ध्रुव -----सर्वप्रथम आपके निर्मल सहयोग के प्रति मेरा हार्दिक आभार - जो आपने शब्द नगरी के जगमगाते साहित्य नक्षत्रों को सुधि ब्लॉग जगत से परिचित करवाया | प्रिय कमलवंशी और प्रिय मनोज अपार संभावनाओं से भरे युवा कवि हैं - दोनों के रचना संसार में समाज के प्रति भावपूर्ण और संवेदनशील दायित्व का बोध होता है ,तो वहीँ आदरणीय महत्तम मिश्रा जी साहित्य की गुम हो रही विधाओं -जैसे दोहा , कवित्त , कुंडली , इत्यादि के कुशल रचनाकार हैं - इन सबकी प्रतिभा सराहनीय है | अभिभूत हूँ कि आपने मेरे सुझाव का समर्थन किया | आज के लिंक के सभी रचनाकारों को पढ़ा | सभी का उम्दा लेखन सराहनीय है |सभी को हार्दिक बधाई | आज के लिंक की भूमिका शानदार और भावपूर्ण है | न्याय समर के योद्धा की पुण्य-स्मृति को कोटिश नमन ! आपके जोशीले शब्दों में स्वाभिमान का ज्वार स्पष्ट है बिना इसके जीवन कहाँ सार्थक ? आपकी रचनात्मकता का प्रवाह बना रहे | सस्नेह आपको बहुत शुभकामना

    जवाब देंहटाएं
  15. आदरणीय ध्रुवजी,शब्दनगरी पर मैं नहीं लिखती किंतु शब्दनगरी पर पढ़ती रहती हूँ। रेणुबाला जी को भी ब्लॉग से पहले वहाँ पढ़ा था। शब्दनगरी से मेरा परिचय आदरणीय एम आर अयंगर जी ने कराया था। रेणुजी का सुझाव मानकर आपने हमें इन सुंदर व जोशीले रचनाओं के पठन का अवसर दिया,सादर धन्यवाद आप दोनों को। शहीद छत्रपति के लिए किन शब्दों में श्रद्धांजली दें ? आज मनुष्यता को शर्मसार करने वाले दरिंदों, भेडियों से लङने की ताकत रखने वाले वीरों की इस तरह जुबान बंद कर दी जाती है । मन विकल हो उठता है, उनके लिए।
    .... ध्रुवजी, आपकी विद्रोही शैली मुझे बड़ी पसंद है।
    आप ऐसे ही लिखते रहें। शुभकामनाएँ।

    जवाब देंहटाएं
  16. वाह ध्रुव जी!
    आपकी प्रस्तुति आनंदित करती है।
    भावोत्तेजक भूमिका और अंत में आपकी कोमल भावंनाओं के बीच सुन्दर ,सामयिक ,विचारणीय रचनाओं की सजावट ,सब कुछ नया -नया। उत्तम।
    मेरी रचना को स्थान देने के लिए आभार।
    सादर।
    चर्चा में देर से शामिल होने के लिए क्षमा।

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  17. Sarvpratham sabhi gunijano/bhadrajano,sammaniya evam aadarniy sadasyon tak mera vinamra karbadh pranam preshit ho,....charcha mein deri se sammalit hone par kshama prarthi hoon,...main kritygatapurn aabhar vykat karna chahunga aadarniy Sh.Dhruv Ji ka jinki lekhni ke vishay mein kuchchh kehna ravi ko diya/baati dikhane ke saman hai,...aur jinohne hamari matri-bhasha Hindi mein abhivykti hetu ek utkrisht,adbhut,aditiya evam avishvasniy dharatal/manch taiyar kar mujhe usme sahbhagita ka avsar pradan kiya,...jiske liye mai unka sadaiv aabhari rahunga,...sath hi Aadarniya Smt. Renu ji jaisi vigy-vidushi tatha nipun lekhanikar se prapt protsahan se aaj mere paanv zameen par nahi pad rahe,...unki zarra-nawazi/protsahan/hausla-afjai/utsahvardhan hetu hridyatal ki gahraiyon se barambar aabhar,...antatah punah "Paanch Linko ka Anand" ke Gan-manya sansthapakon ka koti-koti dhanyawad jo is bhagirath prayas ke liye bhuri-bhuri prashansa ke patra hain,...Aasha karta hoon yah manch Hindi Sahitya tatha hum sabhi ko kshitij ke paar naveen shikhron/aayamon ko sthapit karne ka marg prashast karega,....Aap Sabka sahridya Dhanyawad,...Manoj Khansli "aNVESH".

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