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मंगलवार, 22 जून 2021

3067 ..दर्द कितने भी हों दिल में, मुस्कुराते रहिये!

सादर वन्दे...
मंगलवारीय प्रस्तुति बनानी है
सिर्फ दस ही मिनट है हमारे पास....
देर क्यों चलिए चलें...
.....

दर्द कितने भी हों दिल में,
मुस्कुराते रहिये!

अगर जो गिरा एक आंसू तो,  
तमाशा हो जायेगा!!

पोंछने वाले कम मिलेंगे,
वजह पूछने वालों का
अंबार लग जायेगा.!!!

....


पिता दिवस पर आज आपकी यादें लेकर
हुई लेखनी मौन बस आँखों से टपकती

वो बीता बचपन दूर कहीं यादों में झिलमिल
झलक आपकी बस माँ की आँखों में मिलती


एक कहावत है
 ''कौन पढ़ाये मूर्खों को कि
भाषा से साहित्य बनता है''
किन्तु ''साहित्य से ही
भाषा समृद्ध'' होती है,
और उन्हें तो कतई नहीं कि
जो भाषा, साहित्य, संस्कृति और
विचार के प्रति कहीं से भी गंभीर न हों


बद्दुआएं जुबाँ से ही नही दिल से भी निकल जाती हैं
दुखी ह्रदय के आँसूं  भी बद्दुआ बन जाती है।

संघर्षों, मुसीबतों, परेशानियों से घबराना कैसा...
सितारे अंधेरों में ही चमकते हैं सोच के  देखना ज़रा।।


मेरे घर के ड्राइंगरूम की
दक्षिणी दीवार
जो कभी थी मेरे लिए
'वॉल आफ फेम'
आज ढल गई है
यादों की दीवार में
मन को कुरेदते सूने संसार में।


नजदीकियों में, समाई हैं दूरियाँ,
पास रह कर भी कोई, दूर कितना यहाँ,
दूर कीजिए ना, दो दिलों की दूरियाँ,
यहाँ बन्दगी, कम हैं जरा!
.....
बस इज़ाज़त दें




रविवार, 6 जून 2021

3051 ..ख्वाहिशें होती हैं बहुत होती हैं

सादर वन्दे
एक लम्बे अंतराल के बाद
कोई नई खबर नहीं
आज कोई नया केस नहीं
शाब्बाश भारत
जीत गया...
...
अब रचनाएँ....

जिन्दगी के इस सफर में अकेला आज है,
बच्चों की तरह वो खुद से करता रहता संवाद है!
फिर भी अपने बच्चों की
खुशियों के लिए हर पल करता फरियाद है!
आखिर वो इक बाप है!


ख्वाहिशें होती हैं बहुत होती हैं
इधर से लेकर उधर तक होती हैं
उनमें से कुछ समेटना चाहता हूँ
तरतीब से लगाने में ख्वाहिशों को पूरी हो गयी जिंदगी
उधड़े हुऐ में से गिरी ख्वाहिशों को लपेटना चाहता हूँ


एक वस्त्र की चाहत थी यह,कि बनकर एक सुंदर चादर
नये विवाहित जोड़े की वो,बिछे मिलन की शयनसेज पर
पर बदकिस्मत था ,अर्थी में, मुर्दे के संग आज बंधा है
हरएक कपड़े के टुकड़े की होती किस्मत जुदा-जुदा है


वृक्ष हमें देते है जीवन , ये जीवन सफल बनाओ ।
तीरथ व्रत और यज्ञ के पहले ,एक एक वृक्ष लगाओ ।।

वृक्ष धरा के भूषण है , ये करते दूर प्रदूषण ।
वसुधा का श्रंगार करो तुम ,पहना पादप भूषण ।।

देते प्राण वायु जो तुम को , दूषित को हर लेते ।
अर्थ धर्म अरु काम मोक्ष , ये चार पदार्थ देते ।।


समय ने बनाया दास
हर सुविधा के साधन का
आदि हो गए है उन  सब के
जीना हुआ मुहाल उनके बिना |
एक दिन यदि  बिजली  चली जाए
हर काम अटक जाता है


आज बस
सादर

बुधवार, 19 मई 2021

3033 ..क्‍यों कि‍ इनके द‍िमाग और कुप्रवृत्‍त‍ियों का ऑड‍िट तो नहीं कराया जा सकता।

सादर वन्दे
कई दिन फंसी पड़ी रही
विशाखापत्तनम मे
दो विद्यार्थी बीमार हो गए थे
वे ठीक हुए तो आई उन्हें लेकर
उन बच्चों का परिवार भी था
कोचिंग से तौबा कर ली अब...
सोचती हूँ जो हो रहा है क्या वो सच है
भगवान करे वह झूठ हो....
रचनाएँ..


विदेशों को वैक्‍सीन मुहैया कराने का सच
निश्‍च‍ित रूप से किसी अंधे व्‍यक्‍त‍ि को तो रास्‍ता दिखाया जा सकता है परंतु जो देखते हुए अंधा बनने का नाट‍क करे, उसे कौन दृष्‍ट‍ि दे। वैक्‍सीन को दूसरे देशों में भेजने पर किए जा रहे कांग्रेस व आप के दुष्‍प्रचार के पीछे भी यही बात है जबकि हकीकत यह है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के समझौते एवं कच्चे माल के एवज में वाणिज्यिक करार के तहत वैक्सीन देने की “बाध्यता” है।

भारत ने 7 पड़ोसी देशों बंगलादेश, नेपाल, श्रीलंका आदि को 78 लाख 50 हजार वैक्सीन अनुदान के तहत उपलब्ध कराया। इन आंख वाले अंधों को कौन समझाए क‍ि 2 लाख डोज संयुक्त राष्ट्र संघ के उस शांति बल के लिए सहायता स्वरूप दी गईं जिसमें 6600 तो भारतीय सैनिक ही हैं, अन्य देशों को दिए गए कुल वैक्सीन का यह करीब 16% है।

विदेशों को दिए गए 6 करोड़ 63 लाख वैक्सीन के डोज का करीब 84 प्रतिशत डोज वाणिज्यिक समझौते व लाइसेंसिंग करार के तहत उन देशों को दिया गया जिनसे हमें वैक्सीन तैयार करने के लिए कच्चा माल व लाइसेंस मिला है।

यूके को बड़ी मात्रा में वैक्सीन इसलिए देनी पड़ी क्योंकि सीरम इंस्टिट्यूट जिस कोविशिल्ड वैक्सीन का निर्माण कर रही है उसका लाइसेंस यूके के ‘ऑक्सफोर्ड एक्स्ट्रा जेनिका’ से प्राप्त हुआ है और “लाइसेंसिंग करार” के तहत उसे वैक्सीन का डोज देना जरूरी है।

इसके अलावा वाणिज्यिक समझौते के तहत सऊदी अरब को 12.5 प्रतिशत वैक्सीन देनी है क्योंकि जहां उससे पेट्रोलियम का आयात होता है वहीं बड़ी संख्या में वहां रह रहे भारतीयों को दो डोज मुफ्त वैक्सीन देने का उसने भारत से समझौता किया है।

इसके अलावा विश्व स्वास्थ्य संगठन से हुए एक समझौते के तहत कुल निर्यात का 30 प्रतिशत वैक्सीन ‘को-वैक्स फैसिलिटी’ को दिया जाना है। 


काश कुछ ऐसा हो जाए
रात में अपार शान्ति रहे
चाहे दिन में व्यस्त  रहूँ
पर रात्रि को विश्राम करूं |  
आज की इस दुनिया में
है इतनी व्यस्तता कि
दिन दिन नहीं दिखता

अब नहीं है
सच और झूठ के बीच महीन रेखा
अब है चौड़ी खाई
जिसे नहीं फलांग सकेंगे हम
हमारे पांव हो चुके हैं बौने
हाथ कंधों से ऊपर उठते ही नहीं
गरदन झुक चुकी है
और दिमाग़ हो चला है विचारशून्य


हो वैरी का जैविक वार या प्रकृति हुई ख़फ़ा
कि तुले महाप्रलय पे धर्मराज कर रहे ज़फ़ा
विस्मित हैं सांसों के अकस्मात् थम जाने से
निरूपाय बेबस लोग उचित उपचार पाने से ।

जो किये कल के लिये संचय न काम आया
कांपते स्वजन भी छूने से ऐसी रूग्ण काया
कांधा भी ना मुनासिब बेसहारा सी मृत देह
थरथराती रूह औषधालयों पर भी है संदेह ।


कि चलो क्षितिज पार
मंज़िल है वहाँ
जहाँ दूर-दूर  सागर से
आसमां मिलता है।।

अब क्या  खौफ़... किसी का
हमने मौत से लड़कर
जीवन जीतना सीखा है।।

आशा महासाध्वी कदाचित् मां न मुञ्चति।


इति शुभम्

बुधवार, 5 मई 2021

3019 ...रूठी है किस्मत,मगर हिम्मत है हारी नहीं

सारा सारा गम हमारे ही जिम्में
अब का करें, सिर फोड़ें अपना
या फिर उन चार फुटियों के हाथ पैर तोड़ें

इतना क्यों पढ़ते हैं हम
फॉरवर्ड भी करते हैं
गरम पानी पियो , भाफ खींचो नाक से
काली मिर्च का काढ़ा पियो
ये सब फॉरवर्ड करने के लिए नहीं न है
अमल में लाने को लिए है...
आइए देखें नया कुछ है का


एक पल पर्दा उठा, नज़रें मिलीं, उफ़ क्या मिलीं,
हो वही बस एक पल फिर जिंदगी जाए ठहर.
 
धूप नंगे सर उतर आती है छत पर जब कभी,
तब सुलग उठता है घर आँगन गली, सहरा दहर.
 
शब्द जैसे बांसुरी की तान मीठी सी कहीं,
तुम कहो सुनता रहूँगा, काफिया हो, क्या बहर.


छोटी सी जिन्दगी, अनुभव बड़े दे रही है,
और मै इस दर्द भरे एहसास और अनुभव को,
अपने शब्दों में पिरो कर कोरे कागज पर उतार कर,
इस दर्द को कम करने की कोशिश कर रहीं हूँ!
रूठी है किस्मत,मगर हिम्मत है हारी नहीं!
इतनी आसानी से हालत के आगे,
मैं घुटने टेकने वाली नहीं!


पहले ने लिखा – “रोटी भोजन है”।
दूसरे ने लिखा – “यह आटे और पानी का मिश्रण है”।
तीसरे ने लिखा – “यह ईश्वर का वरदान है”।
चौथे ने लिखा – “यह पकाया हुआ आटे का लौंदा है”।
पाँचवे ने लिखा – “इसका उत्तर इसपर निर्भर करता है कि ‘रोटी’ से आपका अभिप्राय क्या है?”
छठवें ने लिखा – “यह पौष्टिक आहार है”।
और सातवें ने लिखा – “कुछ कहा नहीं जा सकता”।


जड़ पर बस चलता चेतन का
मन जड़ होने से है डरता,
पल भर यदि निष्क्रिय हो बैठे
चेतन भीतर से पुकारता !

लेकिन मन को क्षोभ सताए  
अपना आसन क्यों कर त्यागे,
जन्मों से जो सोता आया
कैसे आसानी से जागे !
...
पम्मी दीदी की तबियत मे सुधार है
परिवार स्थिर है
राम भला करे
सादर

रविवार, 11 अप्रैल 2021

2095 ..तुम्हारे अबोलेपन पर भी रीझती हूँ तुम्हारे एहसास में अकेली ही भींजती हूँ

सादर वन्दे
देर से सूचना मिली
पर मिली तो
आज कुछ रचनाएं पुनर्मूल्यांकन हेतु

बार-बार नज़र रख कर उसे डराया
कुछ दिन बाद देखा उसे पेड़ पर जब
लग रहा था मानों वो शर्मिंदा है खुद से
सोचा भला प्रकृति से क्या भेद-भाव
अब वो मुझे दिखा-दिखा कर खाता है

टूट रहे अनुबंध अनोखे
जीवन को जो सींच रहे थे
काँटों की शैया पर लेटे
अपना ही इतिहास कहे थे
आस डोर हाथों से छूटे
चैन जिया का खोता तैसे
घिरता है घनघोर अँधेरा
लड़ता जुगनू उससे जैसे।।


फिर जाने क्यूं ?
 इंसान तू
ऐसे दुर्गम मार्गों पे चलता है
और बार बार फिसलता है
गिरकर टूटता है
अपने को ही,अपने हाथों से लूटता है.....


अदृश्य कांटेदार सीमान्त, जीवन
उन भूमिगत पलों में आख़िर
जाए भी तो कहाँ जाए,
अदृश्य रस्साकशी
में उलझ के
रह जाए
सभी


चाँदनी रात~
कालबेलिया नृत्य  
मरूभूमि में ।

गोधूली बेला~
तुलसी चौरे पर
जलता दीया ।


तुम्हारा सानिध्य आत्मिक सुख है
परंतु,तुम्हारे प्रेम के लिए सुपात्र नहीं मैं
अपनी अपात्रता पर ख़ुद ही खीझती हूँ
तुम्हारे अबोलेपन पर भी रीझती हूँ
तुम्हारे एहसास में अकेली ही भींजती हूँ
जब तुम्हारा मन नहीं होता...।
...
आज बस
देखती हूँ कल अवकाश मिला तो
मिलूँगी मुखरित मौन में
सादर

 

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2021

2048..अनुग्रह तेरा कुछ ऐसा,मुमकिन नहीं कि ठुकरा दूँ

सादर वन्दे
आज कोई छुट्टी नहीं 
फिर भी मैं यहां हूँ..
अगर मैं सोचूं कि मुझे
किसी की भी ज़रूरत नहीं..
तो ये मेरा 'अहम' है
और अगर मैं सोचूं कि
सबको मेरी ज़रूरत है..
तो ये मेरा 'वहम' है
सच तो ये है
हम सब एक दूसरे के पूरक हैं 
आइए रचनाओँ देखें....

मोल-भाव पर उठती-गिरती,
ये दुनिया बाज़ार सरीखी
साथ किसी दिन चल कर मेरे,
चैन मुझे ले देना,मालिक।

बिना नेह के ‘शरद’ व्यर्थ है,
दुनिया भर का सोना-चांदी
अच्छा लगता अपनेपन का  
सूखा चना-चबेना, मालिक।


उर समेटे यातनाएं
होंठ सौम्या रेख बिखरी
ताप सहकर धूप गहरी
स्वर्ण जैसे और निखरी
यूँ हथेली रोक लेती
चूड़ियों का मौन क्रंदन।।

अनुग्रह तेरा कुछ ऐसा,मुमकिन नहीं कि ठुकरा दूँ,
जाम-ऐ-शराब-ऐ-मोहब्बत,मैं कब इंकार करता हूँ।

कहे 'परचेत',ऐ साकी,है कहने को न कुछ बाकी,
कुछ तो बात तुझमे,मैं तेरी मधु से प्यार करता हूँ।


हम तो देते तुम्हें एक ही नाम ...
बिन पेंदी का लोटा
जो किसी का ना होता
बस...
ढलमलाता
एक कोने से दूसरे कोने तक
जब तक पूर्ति ना हो जाए स्वार्थ।


किंतु क्या करें बताइए
आपकी विद्वता का ?
जिसके भार तले
साधारण जन मन
दबते चले जाते हैं ।
धराशायी हो जाता है
आत्मविश्वास इनका,
तिनका-तिनका जोङा
जो साहस जुटा कर ।
......
बस छुट्टी खतम
सादर





रविवार, 7 फ़रवरी 2021

2032 ..ये अंतर्रात्मा क्या होती है माँ

सादर वन्दे
आज की प्रस्तुति 
में पढ़िए कुछ नई-जूनी रचनाएं

छवि को देख गुंजन को यकीन नहीं हुआ कि यह वही
छवि है जिसकी चंचलता और शरारतों से उन
पाँच सखियों की मंडली गुलजार हो जाया करता
थी । अगर एक दिन वह न आती तो दूसरे दिन उसकी
जम कर क्लास लगती कि कल वह
कहाँ थी ? कॉलेज से बी.ए.करने के बाद वह अपने
पिताजी के ट्रांसफर के साथ ही परिवार सहित भोपाल
शिफ्ट हो गई । उदयपुर में सभी से फोन सम्पर्क कुछ
समय रहा लेकिन धीरे-धीरे सभी घर-गृहस्थी में रम गई ।


किसी भी कविता में
दो पक्ष होते हैं-
कलापक्ष तथा भावपक्ष;
कलापक्ष का निर्वाह होता है-
व्याकरण और गणित द्वारा
जो होता है- नितान्त यांत्रिक।
भावपक्ष असीम है
यह मन को प्रतिबिम्बित करता है


ये अंतर्रात्मा क्या होती है माँ?
बिटिया ने एक कहानी पढ़ते-पढते पूछा।
'मन' मैंने कहा।
'मन' का मतलब क्या?उसने पूछा!
"मन जो दिमाग से अलग होता है।
बुद्धि-विवेक,छल-प्रपंच से अलग
जिसकी ध्वनि सुनी जा सकती है,
जहाँ से सदा सच्ची और अच्छी आवाज़ आती है।
मैंने कहा।


होती हैं थोड़ी अल्हड़ थोड़ी बिंदास
घूमती रहती हैं आजीवन धुरी बन कर
अपनी माँ के आसपास
माँ की अनुपस्थिति, और
जिम्मेवारियों का बोझ
बना देता है उन्हें वक़्त से पहले समझदार
फिर भी अपनी किस्मत मानकर
हर ताना सह लेतीं हैं,


जो सभी देख रहे हैं।
खीझता हुआ आदमी
फटे सपनों से
बतियाने से डरता है
वो
नहीं कर पाता
संवाद
नहीं दे पाता
पायजामें की जेब में रखे
अपने
सपने पर कोई तर्क।
.....
बस..
कल कोई और
सादर

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2021

2026 ..आज का एकल संग्रह ..अवधारणा

सादर वन्दे....

सोचे हम कुछ यादगार अंक दें आज का
पढ़िए....साग्रह  दिव्या

अवधारणा !
शायद, चेतना का वो मूल तत्व,
जो,
वस्तु को उसके अर्थ तथा
अर्थ को उस वस्तु के
बिम्ब के साथ जोड़ती है
और चेतना को,
संवेदनात्मक बिम्बों से अलग,
इक स्वतंत्र रूप से
पहचानने की संभावना पैदा करती है !

इस अंक में...
मेरे उर में क्या अन्तर्हित है,
यदि यह जिज्ञासा हो,
दर्पण ले कर क्षण भर उस में मुख अपना,
प्रिय! तुम लख लो!


वे गायन, जिनके न आज तक
गाकर सिरा सका जल-थल,
जिनकी तान-तान पर आकुल
सिहर-सिहर उठता उडु-दल।

आज सरित का कल-कल, छल-छल,
निर्झर का अविरल झर-झर,
पावस की बूँदों की रिम-झिम
पीले पत्तों का मर्मर,


हुआ रूप-दर्शन
जब कृतविद्य तुम मिले
विद्या को दृगों से,
मिला लावण्य ज्यों मूर्ति को मोहकर,-
शेफालिका को शुभ हीरक-सुमन-हार,-
श्रृंगार
शुचिदृष्टि मूक रस-सृष्टि को।



गान गायक का नहीं व्यापार,
उसकी विकलता है;
राग वीणा की नहीं झंकार,
उसकी विकलता है;
भावनाओं का मधुर आधार
सांसो से विनिर्मित,
गीत कवि-उर का नहीं उपहार,
उसकी विकलता है।


मुझे देखते ही
अरहरी लजाई,
मनाया-बनाया,
न मानी, न मानी;
उसे भी न छोड़ा -
पथिक आ रहा था,
उसी पर ढकेला;
हँसी ज़ोर से मैं,
हँसी सब दिशाएँ,
हँसे लहलहाते
हरे खेत सारे,
हँसी चमचमाती
भरी धूप प्यारी;
बसंती हवा में
हँसी सृष्टि सारी!
हवा हूँ, हवा मैं
बसंती हवा हूँ!

मेरी आँखों के अश्रु भी, तुझे पिघला सके न क्यों
तेरी नफ़रत की गठरी को, दिवस और रात ढोया हूँ।

कदर तुझको नहीं मेरी, तेरी खातिर सहा कितना,
मिली रुस्वाइयाँ फिर भी, प्रीत - माला पिरोया हूँ ।
...
अग्रज भाई पुरुषोत्तम जी को आभार
एक एतिहासिक संग्रह तैय्यार किया है
सादर


सोमवार, 18 जनवरी 2021

2012 ...पाप-पुण्य तय करने वाले हम होते कौन हैं भला

 सादर वन्दे
रविवार को
लिखना हो रहा है
कल छपेगी
अच्छा दिन है रविवार
सारे के सारे 
बचे-खुचे काम
सलटा लिए जाते हैं
और सलटा भी
लेना भी चाहिए
आसानी से मिलने वाला लाभ है
..
आइए चलें
साथ ...प्रतिभा कटियार

साथ का सबसे सुंदर पल वह होता है जब आप साथ हों और पैदल चल रहे हों. संवाद स्थगित. भीतर भी बाहर भी. हम दोनों उस रोज ऐसे ही साथ में थे. कदम आगे बढ़ रहे थे और मन उन्हीं क़दमों में लिपटा किलक रहा था. जैसे कोई ख़्वाब हो जिसे हम जी रहे हों.


आसान नहीं होगा, माउंट एवरेस्ट से माउंट सिकदर करना ...गगन शर्मा

आजकल माउंट एवरेस्ट का नाम बदल कर माउंट राधानाथ करने की बात की जा रही है ! अच्छी बात है। पर ऐसा होना क्या आसान काम है ! यह कोई देश की सड़क, प्रांत या रेलवे स्टेशन का नाम तो है नहीं कि जिसे हम अपनी मर्जी से जब चाहें, जो चाहें रख लें ! ऐसा करने के पहले कई-कई देशों, यूनेस्को तथा ब्रिटेन की भी रजामंदी व अनुमति लेनी पड़ेगी और ये प्रयास भी अपने आप में माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई जितना ही मुश्किल होगा ....................!


हम हो रहे ग़ाफ़िल ... सुबोध सिन्हा

अब तथाकथित खरमास खत्म हो चुका है।
पुरखों के कथनानुसार ही सही,
आज भी बुद्धिजीवी लोग कहते हैं कि
खरमास में शुभ कार्य नहीं करना चाहिए।
अब पुरखों की बात तो माननी ही होगी,
नहीं तो पाप लगेगा। ख़ैर ! ...
बुद्धिजीवियों के हुजूम के रहते
पाप-पुण्य तय करने वाले हम होते कौन हैं भला ? .. शायद ...


विपन्नता ....कुसुम कोठारी'प्रज्ञा'


हाहाकार मचा है भारी
नैतिकता की डोर सड़ी
उठा पटक में बापूजी की
ले भागा है  चोर छड़ी
ऐसे भारत के सपने कब
बनी विवशता अभिन्नता ।।

पलायन ... शेखर सुमन

"तुमने लिखना क्यों छोड़ दिया... "
"पता नहीं...
शायद अब लिखने को कुछ बचा नहीं....
और अब मैं कुछ लिखना भी नहीं चाहता,
अनजाने लोगों के दिल के तार छेड़ने के लिए
इंसान कब तक लिख सकता है... पता है,
मेरे पास पढ़ने वालों की कभी कमी नहीं रही..
लेकिन अब शायद वक़्त आ गया है कि
ज़िन्दगी के इस परिवर्तन को स्वीकार कर लिया जाए... "



सूखती फसलें, झुलसती चेतना
लहलहाती ज़िन्दगी लाओ ज़रा

किस क़दर गुमसुम हुआ बचपन यहां
एक मुट्ठी ही ख़ुशी लाओ ज़रा

बनके "वर्षा" तुम भगीरथ की तरह
आज धरती पर नदी लाओ ज़रा
......
कल किसने देखा
पर मैं ज़रुर देखूँगी
आशावादी हूँ न
सादर

मंगलवार, 29 दिसंबर 2020

1992 ..स्वार्थ छोड़कर, करें भलाई, ईशदूत बन, संग चलें हम

सादर वन्दे
आ रहा है
और जा भी रहा है
चलता रहेगा
आना-जाना
सालों का भी
और इंसानों का भी
रुकता नहीं है 
ये आना-जाना..
.....
रचनाएँ..

कारण क्या है...!! .... साझेदारी


जलते देख रहे हो तुम भी 

प्रश्नव्यवस्था के परवत पर

क्यों कर तापस वेश बना के, 

जा बैठै बरगद के तट पर   

हां मंथन का अवसर है ये  

स्थिर क्यों हो कारण क्या है ?



ये कैसी लगन ....आत्म रंजन

वो कभी प्रेम से चूमे गए,

कभी आँसुओं में भीगे ख़त ,

वो सूखे गुलाब जिनमें 

ताज़ा है इश्क की महक,

वो तुम्हारे साथ खिंचवाई तस्वीरें 


साल मुबारक ..अमृता प्रीतम ...उन्मुक्त उड़ान

जैसे दिल के फ़िक़रे से

एक अक्षर बुझ गया

जैसे विश्वास के काग़ज़ पर

सियाही गिर गयी

जैसे समय के होंटो से

एक गहरी साँस निकल गयी

और आदमज़ात की आँखों में

जैसे एक आँसू भर आया

नया साल कुछ ऐसे आया...



सल्ललाहो अलैहि वसल्लम ....दिव्य नर्मदा

कब्ज़ा, सूद, इजारादारी

नस्लभेद घातक बीमारी

कंकर-कंकर में है शंकर

हर इंसां में है पैगंबर

स्वार्थ छोड़कर, करें भलाई

ईशदूत बन, संग चलें हम

सल्ललाहो अलैहि वसल्लम


दर्द लिखे बूटे .... शरद सिंह

मन के रूमाल पर

दर्द लिखे बूटे।

रिक्शे का पहिया

गिने

तीली के दिन

पैडल पर पैर चलें

तकधिन-तकधिन

....
बस
अब अगले वर्ष
सादर


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