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रविवार, 11 अप्रैल 2021

2095 ..तुम्हारे अबोलेपन पर भी रीझती हूँ तुम्हारे एहसास में अकेली ही भींजती हूँ

सादर वन्दे
देर से सूचना मिली
पर मिली तो
आज कुछ रचनाएं पुनर्मूल्यांकन हेतु

बार-बार नज़र रख कर उसे डराया
कुछ दिन बाद देखा उसे पेड़ पर जब
लग रहा था मानों वो शर्मिंदा है खुद से
सोचा भला प्रकृति से क्या भेद-भाव
अब वो मुझे दिखा-दिखा कर खाता है

टूट रहे अनुबंध अनोखे
जीवन को जो सींच रहे थे
काँटों की शैया पर लेटे
अपना ही इतिहास कहे थे
आस डोर हाथों से छूटे
चैन जिया का खोता तैसे
घिरता है घनघोर अँधेरा
लड़ता जुगनू उससे जैसे।।


फिर जाने क्यूं ?
 इंसान तू
ऐसे दुर्गम मार्गों पे चलता है
और बार बार फिसलता है
गिरकर टूटता है
अपने को ही,अपने हाथों से लूटता है.....


अदृश्य कांटेदार सीमान्त, जीवन
उन भूमिगत पलों में आख़िर
जाए भी तो कहाँ जाए,
अदृश्य रस्साकशी
में उलझ के
रह जाए
सभी


चाँदनी रात~
कालबेलिया नृत्य  
मरूभूमि में ।

गोधूली बेला~
तुलसी चौरे पर
जलता दीया ।


तुम्हारा सानिध्य आत्मिक सुख है
परंतु,तुम्हारे प्रेम के लिए सुपात्र नहीं मैं
अपनी अपात्रता पर ख़ुद ही खीझती हूँ
तुम्हारे अबोलेपन पर भी रीझती हूँ
तुम्हारे एहसास में अकेली ही भींजती हूँ
जब तुम्हारा मन नहीं होता...।
...
आज बस
देखती हूँ कल अवकाश मिला तो
मिलूँगी मुखरित मौन में
सादर

 

7 टिप्‍पणियां:

  1. पुनर्मूल्यांकन तो हो गया स्वतः
    आपने रचना का चयन किया
    आभार..
    सादर..

    जवाब देंहटाएं
  2. सुप्रभात !
    प्रिय दिव्या जी, सुंदर तथा पठनीय रचनाओं के संकलन संयोजन तथा शानदार प्रस्तुतीकरण के लिए आपका बहुत अभिनंदन और बधाई,मेरी रचना को शामिल करने के लिए हार्दिक आभार व्यक्त करती हूं,आपको ढेरों शुभकामनाएं, सस्नेह जिज्ञासा सिंह ।

    जवाब देंहटाएं
  3. आभारी हूँ प्रिय दिबू।
    सस्नेह शुक्रिया।

    जवाब देंहटाएं
  4. सुन्दर और बेहतरीन संकलन । संकलन में सृजन साझा करने के लिए हार्दिक आभार दिव्या जी ।

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत खूबसूरत प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं
  6. वाह
    बहुत ही कमाल का संयोजन
    सभी रचनाकारों को बधाई

    जवाब देंहटाएं
  7. बेहतरीन रचना संकलन एवं प्रस्तुति सभी रचनाएं उत्तम रचनाकारों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं मेरी रचना को स्थान देने के लिए सहृदय आभार 🙏 सादर

    जवाब देंहटाएं

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