सादर वन्दे
देर से सूचना मिली
पर मिली तो
आज कुछ रचनाएं पुनर्मूल्यांकन हेतु
बार-बार नज़र रख कर उसे डराया
कुछ दिन बाद देखा उसे पेड़ पर जब
लग रहा था मानों वो शर्मिंदा है खुद से
सोचा भला प्रकृति से क्या भेद-भाव
अब वो मुझे दिखा-दिखा कर खाता है

टूट रहे अनुबंध अनोखे
जीवन को जो सींच रहे थे
काँटों की शैया पर लेटे
अपना ही इतिहास कहे थे
आस डोर हाथों से छूटे
चैन जिया का खोता तैसे
घिरता है घनघोर अँधेरा
लड़ता जुगनू उससे जैसे।।

फिर जाने क्यूं ?
इंसान तू
ऐसे दुर्गम मार्गों पे चलता है
और बार बार फिसलता है
गिरकर टूटता है
अपने को ही,अपने हाथों से लूटता है.....

अदृश्य कांटेदार सीमान्त, जीवन
उन भूमिगत पलों में आख़िर
जाए भी तो कहाँ जाए,
अदृश्य रस्साकशी
में उलझ के
रह जाए
सभी

चाँदनी रात~
कालबेलिया नृत्य
मरूभूमि में ।
गोधूली बेला~
तुलसी चौरे पर
जलता दीया ।

तुम्हारा सानिध्य आत्मिक सुख है
परंतु,तुम्हारे प्रेम के लिए सुपात्र नहीं मैं
अपनी अपात्रता पर ख़ुद ही खीझती हूँ
तुम्हारे अबोलेपन पर भी रीझती हूँ
तुम्हारे एहसास में अकेली ही भींजती हूँ
जब तुम्हारा मन नहीं होता...।
...
आज बस
देखती हूँ कल अवकाश मिला तो
मिलूँगी मुखरित मौन में
सादर
आज बस
देखती हूँ कल अवकाश मिला तो
मिलूँगी मुखरित मौन में
सादर