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सोमवार, 18 जनवरी 2021

2012 ...पाप-पुण्य तय करने वाले हम होते कौन हैं भला

 सादर वन्दे
रविवार को
लिखना हो रहा है
कल छपेगी
अच्छा दिन है रविवार
सारे के सारे 
बचे-खुचे काम
सलटा लिए जाते हैं
और सलटा भी
लेना भी चाहिए
आसानी से मिलने वाला लाभ है
..
आइए चलें
साथ ...प्रतिभा कटियार

साथ का सबसे सुंदर पल वह होता है जब आप साथ हों और पैदल चल रहे हों. संवाद स्थगित. भीतर भी बाहर भी. हम दोनों उस रोज ऐसे ही साथ में थे. कदम आगे बढ़ रहे थे और मन उन्हीं क़दमों में लिपटा किलक रहा था. जैसे कोई ख़्वाब हो जिसे हम जी रहे हों.


आसान नहीं होगा, माउंट एवरेस्ट से माउंट सिकदर करना ...गगन शर्मा

आजकल माउंट एवरेस्ट का नाम बदल कर माउंट राधानाथ करने की बात की जा रही है ! अच्छी बात है। पर ऐसा होना क्या आसान काम है ! यह कोई देश की सड़क, प्रांत या रेलवे स्टेशन का नाम तो है नहीं कि जिसे हम अपनी मर्जी से जब चाहें, जो चाहें रख लें ! ऐसा करने के पहले कई-कई देशों, यूनेस्को तथा ब्रिटेन की भी रजामंदी व अनुमति लेनी पड़ेगी और ये प्रयास भी अपने आप में माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई जितना ही मुश्किल होगा ....................!


हम हो रहे ग़ाफ़िल ... सुबोध सिन्हा

अब तथाकथित खरमास खत्म हो चुका है।
पुरखों के कथनानुसार ही सही,
आज भी बुद्धिजीवी लोग कहते हैं कि
खरमास में शुभ कार्य नहीं करना चाहिए।
अब पुरखों की बात तो माननी ही होगी,
नहीं तो पाप लगेगा। ख़ैर ! ...
बुद्धिजीवियों के हुजूम के रहते
पाप-पुण्य तय करने वाले हम होते कौन हैं भला ? .. शायद ...


विपन्नता ....कुसुम कोठारी'प्रज्ञा'


हाहाकार मचा है भारी
नैतिकता की डोर सड़ी
उठा पटक में बापूजी की
ले भागा है  चोर छड़ी
ऐसे भारत के सपने कब
बनी विवशता अभिन्नता ।।

पलायन ... शेखर सुमन

"तुमने लिखना क्यों छोड़ दिया... "
"पता नहीं...
शायद अब लिखने को कुछ बचा नहीं....
और अब मैं कुछ लिखना भी नहीं चाहता,
अनजाने लोगों के दिल के तार छेड़ने के लिए
इंसान कब तक लिख सकता है... पता है,
मेरे पास पढ़ने वालों की कभी कमी नहीं रही..
लेकिन अब शायद वक़्त आ गया है कि
ज़िन्दगी के इस परिवर्तन को स्वीकार कर लिया जाए... "



सूखती फसलें, झुलसती चेतना
लहलहाती ज़िन्दगी लाओ ज़रा

किस क़दर गुमसुम हुआ बचपन यहां
एक मुट्ठी ही ख़ुशी लाओ ज़रा

बनके "वर्षा" तुम भगीरथ की तरह
आज धरती पर नदी लाओ ज़रा
......
कल किसने देखा
पर मैं ज़रुर देखूँगी
आशावादी हूँ न
सादर

9 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छा लगता है कल पर यकीन करता देखकर
    सदैव स्वस्थ्य और दीर्घायु हो
    सुन्दर प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर..
    आभार..
    सादर..

    जवाब देंहटाएं
  3. प्रिय दिव्या अग्रवाल जी,
    आपने लिखा है - "कल किसने देखा / पर मैं ज़रुर देखूँगी / आशावादी हूँ न" .... आपकी इस आशावादिता को नमन 🙏
    यह आशा ही है जो हमें भविष्य के प्रति सकारात्मक बनाए रखते हुए हमारे वर्तमान को सहज बनाए रखती है।
    बहुत शुभकामनाएं 🙏
    मेरी पोस्ट को शामिल करने हेतु हार्दिक आभार 🙏
    सस्नेह,
    डॉ. वर्षा सिंह

    जवाब देंहटाएं
  4. मुझे सम्मिलित कर सम्मान देने हेतु हार्दिक आभार

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत अच्छी हलचल प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं
  6. सुंदर साकारात्मकता भावप्रवण प्रस्तुति।
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  7. वाह! भूमिका और उपसंहार दोनों ही अत्योत्तम बधाई दिव्याजी
    सुंदर लिंको को पढ़वाने के लिए।
    सभी रचनाकारों को बधाई।मेरी रचना लेने के लिए हृदय तल से आभार।
    शेखर जी को टिप्पणी नहीं लिखी जा रही बहुत हृदय स्पर्शी सृजन है ।
    लेखक का पलायन पूरी तरह कभी नहीं हो सकता।
    सस्नेह।

    जवाब देंहटाएं

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