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रविवार, 9 मई 2021

3023 ..माँ कहती है बस घर पर बैठो अगले नवरात्र तक.. मैं हूँ न..

आज मातृ दिवस
हमारे भारत में कई मंदिर व देवालय है
माताश्री के जलते हुए इक्कावन खंण्ड
विश्व के अनेक हिस्से में गिरे
इस महामारी में हम चिंता क्यों करें
माँ कहती है बस घर पर बैठो
अगले नवरात्र तक..
मैं हूँ न..

आइए आज का अँक देखें..

शब्द तो है ये छोटा सा
इसमें दुनिया समाई है
क्या कहूँ कितना प्यार है इसमें
कितनी इसकी ममता की गहराई है।

तुमको आता देख बाँसुरी रख मैं चुप हो जाता
पत्तों मे छिपकर धीरे से फिर बाँसुरी बजाता

गुस्सा होकर मुझे डाटती, कहती "नीचे आजा"
पर जब मैं ना उतरता, हँसकर कहती, "मुन्ना राजा"

"नीचे उतरो मेरे भईया तुंझे मिठाई दूँगी,
नये खिलौने, माखन-मिसरी, दूध मलाई दूँगी"


" अरे कंजूस सारा घी क्या अपने लिए बचा रखा  है? थोड़ा घी और डाल हलवे में।" धनानंद अपने रसोइये पर बिगड़ते हुए कहते हैं।

" नही मालिक घी तो इतना डाला है कि घर के बाहर तक हलवे की खुशबू जा रही  है। "धनानंद का रसोइया कुछ घबराते हुए बोला।


तुम लो, सारी दुआएँ,
सलाम मेरा,
यूँ चमकता रहे, तेरा हर सवेरा,
पर ना, भूल जाना,
दिल ही तेरा, मेरा ठिकाना,
सदा ही, धड़कूंगा मैं,
ना रुकुंगा,
हृदय मध्य, तुमसे ही आ मिलूंगा,
शायद, संभाल ले ये,
उबाल तेरा!


सोचा है
मांग लूंगा
महताब से
ईद में अबकी
उसकी मेहरीन-सी
जमजम की दो बूंद
हिफाज़त की,
अवाम की।

26 टिप्‍पणियां:

  1. सुप्रभातऔर प्रणाम सभी को। प्राथमिक कक्षा में पढ़ी सुभद्रा कुमारी चौहान जी की रचना पढ़कर मन अपार खुशी से भर उठा। स्वतः ही। रचना के बोल याद आ गए क्योंकि उस समय पसंदीदा रटी कविताओं में ये सबसे ऊपर थी।
    यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे
    मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे
    ले देतीं यदि मुझे बांसुरी तुम दो पैसे वाली
    किसी तरह नीची हो जाती यह कदंब की डाली
    तुम्हें नहीं कुछ कहता पर मैं चुपके-चुपके आता
    कौन भुला सकता है। पठनीय सूत्रों से सजा अभिनव अंक। शामिल सभी रचनाकारों को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई इस भावपूर्ण अंक के लिए। आपको आभार और प्रणाम,🙏🙏💐💐

    जवाब देंहटाएं
  2. सारे पाठक फेसबुक पर चले गए क्या,,। आज यहां कौन मनाएगा मातृ दिवस ।

    जवाब देंहटाएं
  3. मां को समर्पित मेरी एक रचना

    माँ ज्यों ही गाँव के करीब आने लगी है --------- कविता |
    माँ ज्यों ही गाँव के करीब आने लगी है -
    माँ की आँख डबडबाने लगी है !

    चिरपरिचित खेत -खलिहान यहाँ हैं ,
    माँ के बचपन के निशान यहाँ हैं ;
    कोई उपनाम - ना आडम्बर -
    माँ की सच्ची पहचान यहाँ है ;
    गाँव की भाषा सुन रही माँ -
    खुद - ब- खुद मुस्कुराने लगी है !
    माँ की आँख डबडबाने लगी है !!

    भावातुर हो लगी बोलने गाँव की बोली -
    अजब - गजब सी लग रही माँ बड़ी ही भोली ,
    छिटके रंग चेहरे पे जाने कैसे - कैसे -
    आँखों में दीप जले - गालों पे सज गयी होली ;
    जाने किस उल्लास में खोयी -
    मधुर गीत गुनगुनाने लगी है !
    माँ की आँख डबडबाने लगी है !


    अनगिन चेहरों ढूंढ रही माँ -
    चेहरा एक जाना - पहचाना सा ,
    चुप सी हुई किसी असमंजस में
    भीतर भय हुआ अनजाना सा ;
    खुद को समझाती -सी माँ -
    बिसरी गलियों में कदम बढ़ाने लगी है !
    माँ की आँख डबडबाने लगी है !!


    शहर था पिंजरा माँ खुले आकाश में आई -
    थी अपनों से दूर बहुत अब पास में आई ,
    उलझे थे बड़े जीवन के अनगिन धागे
    सुलझाने की सुनहरी आस में आई
    यूँ लगता है माँ के उग आई पांखें-
    लग अपनों के गले खिलखिलाने लगी है
    माँ की आँख डबडबाने लगी है !!!

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. बहुत खूबसूरती से माँ की भावनाओं को उकेरा है ।

      हटाएं
    2. वाह! आदरणीया दीदी जी माँ पर एसी सुंदर रचना तो आप ही प्रस्तुत कर सकती हैं। मन को छूती,भावपूर्ण पंक्तियाँ। सादर प्रणाम आपकी लेखनी को।

      हटाएं
    3. ये तुम्हारा स्नेह है प्रिय आँचल। हार्दिक स्नेह और आभार 💐❤️❤️💐

      हटाएं
    4. प्रिय दीदी, आपका सादर आभार 🙏🙏🌷❤️

      हटाएं
    5. वाह!!! अत्यंत भावपूर्ण और मार्मिक!

      हटाएं
    6. जी आभार आपका 🙏🙏

      हटाएं
  4. https://renuskshitij.blogspot.com/2017/10/blog-post_30.html

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. कहां जाएंगे सखी, आएंगे तो घर पर ही..
      सादर..

      हटाएं
    2. बिलकुल सही कहा आपने। जैसे उड़ी जहाज़ की पंछी फिरी जहाज़ पर आयो!

      हटाएं
  5. बहुत सुन्दर आज का अंक,प्रिय रेणु जी आपकी रचना लाज़बाब है।

    जवाब देंहटाएं
  6. सभी जन सदा सुरक्षित व स्वस्थ रहें

    जवाब देंहटाएं
  7. जी बहुत बढ़िया।
    मैंने तो इनमें से कुछ रचनाओं को पहले ही पढ चुका हूं...पर आपने बेहतरीन रचनाओं को यहाँ प्रस्तुत किया है।

    जवाब देंहटाएं
  8. बहुत खूबसूरत लिंक सजाए हैं ।कदंब का पेड़ पढ़ बचपन की याद आ गयी । विश्वमोहन जी की रचना विशेष पसंद आई ।
    अच्छी प्रस्तुति आज की। ।

    जवाब देंहटाएं
  9. आहा!सुभद्रा कुमारी चौहान जी की यह मनभावन कविता हमने सातवी कक्षा में पढ़ी थी तभी से मुझे बहुत प्रिय है यह कविता। आज पुनः पढ़ मन आनंदित हो गया। मंच को बहुत आभार 🙏
    मातृ दिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं। बहुत सुंदर अंक है। सभी रचनाएँ बेहद उम्दा 👌
    मेरी रचना को स्थान देने हेतु आपका हार्दिक आभार 🙏
    सभी को सादर प्रणाम 🙏

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  10. वाह शानदार रचना प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं
  11. बहुत सुंदर अंक। सुभद्राकुमारी चौहानजी की यह सुंदर कविता अविस्मरणीय रचनाओं में से एक है। सादर।

    जवाब देंहटाएं
  12. आज का अंक पढ़कर आनंद आ गया । सुभद्रा कुमारी चौहान जी की कविता पढ़कर बचपन की सुंदर स्मृति उभर आई,जब हिलहिल कर कविताएं रटते थे ।आदरणीय यशोदा दीदी आपका बहुत आभार, प्रिय रेणु जी आपकी कविता ने तो मन को मोह लिया,कितनी सुंदर सच्चाई बयां की आपने । आप सभी को मातृ दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं एवम बधाई ।।

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  13. बहुत सुंदर लिंक! बधाई और आभार!!!

    जवाब देंहटाएं

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