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सोमवार, 10 अगस्त 2020

1851 ..हम-क़दम का एक सौ तीसवां अंक..व्यथा..

सादर अभिवादन
क्या है व्यथा.....क्या है परिभाषा
आम बोल-चाल की भाषा में कम ही बोला जाता है
व्यथा शब्द कम ही आता है 
लिखने में नई कविताओं में
फिर भी कोशिश करते हैं परिभाषित करने की
जितनी भी पूर्वरचित रचनाएं पढ़ी...
व्यथा का का आशय पीड़ा, दुख, क्षोभ ही परिलक्षित हुआ
आप गढ़िए नई परिभाषाएँ नए जमाने की...



आज की शुरुआत प्रतिष्ठित रचनाओं से

स्मृतिशेष महादेवी वर्मा
दीप मेरे जल अकम्पित,
धुल अचंचल !
सिन्धु का उच्छ्वास घन है,
तड़ित् तम का विकल मन है,
भीति क्या नभ है व्यथा का
आँसुओं से सिक्त अंचल !

स्वर-प्रकम्पित कर दिशाएँ,
मीड़ सब भू की शिराएँ,
गा रहे आँधी-प्रलय
तेरे लिए ही आज मंगल।


आदरणीय शैल सिंह
थक गई हूँ विषम भार ढोते
ज़िम्मेदारियां जो कांधे रखे तुम,
पूँजी सौंप तुम्हें उन कर्तव्यों की 
अब मुक्त होना चाहती हूँ ,
कह रहा मन खिन्न हो जो 
उस व्यथा का जरा संज्ञान लो,


मीठी-मीठी बातों से अपनी, 
अबलाओं को छल रहे हैं, 
कुकर्म कर्म नित्य कर रहे हैं।

कभी छुपा रुस्तम बन वे, 
पीछे से बाण चलाते हैं।
उनकी चतुर चौकड़ी में फंस, 
उन्हीं को व्यथा सुनाते हैं।


अशोक श्रीवास्तव
उपजी हूं मैं दिल से तेरे
संतुष्ट बहुत हो मुझे बनाकर
विनय आज करती हूं तुमसे
सुनलो व्यथा हमारी कविवर

कवि तुम्हारे शब्द सुनहरे
शिल्प तुम्हारा भी रुचिकर
अलंकार से रुप निखरता
भरना रस से लगता हितकर


आदरणीय कविता जी
कितने दुख अन्दर रख कर, बहता है ये सागर खामोश,
जाने कौन सी व्यथा कह नही पाता, जो बढा लिया आक्रोश।

मन की बीती मन में लपेटे, अपने अन्दर कितना कुछ समेटे,
ये जानें बस वो लहरें, जो खुद को उठाकर किनारे पर पटके।


आदरणीय मधुसूदन साहा

कभी न पूछो किसी नदी से
उसकी व्यथा पुरानी

सदियों से
उसने मुश्किल के
कितने दिन काटे हैं,
कब कितने
खाई खंदक को
जीवन में पाटे हैं,
बहुत कठिन है संघर्षों की
उसकी कथा-पिहानी।

ब्लॉग जगत से
आदरणीय पुरुषोत्तम सिन्हा द्वारा रचित
निस्पंद मन भ्रमर

संभव है डूब जाएँ, सृष्टि की ये कल्पनाएँ!

व्यथा के अनुक्षण, लाख बाहों में कसे,
विरह के कालाक्रमण, नाग बन कर डसे,
हर क्षण संताप दे, हर क्षण तुझ पर हँसे,
भटकने न देना, तुम मन की दिशाएँ!

करवट ....

सो जाऊँ कैसे, मैं, करवटें लेकर!
पराई पीड़ सोई, एक करवट,
दूजे करवट, पीड़ पर्वत,
व्यथा के अथाह सागर, दोनो तरफ,
विलग हो पाऊँ कैसे!
सो जाऊँ कैसे?
सत्य से परे, मुँह फेर कर!


बरसों ढ़ले ....

फिर मिली, वही व्यथा,
फिर, झंझावातों सी बहती सदा,
फिर एकाकी, दिन-रैन ढ़ले!

बरसों ढ़ले, सांझ तले, तुम कौन मिले!


लहर! नहीं इक जीवन! ....

वेदना ही है जीवन, व्यथा किसने ना सहा!
क्यूँ भागते हो जीवन से?
लहरों को, कब मैंने जीवन कहा?



....
हमारे पाठकों द्वारा रचित रचनाएँ..
.......

आदरणीय साधना वैद
जब चंदा ने तारों ने मेरी कथा सुनी 
जब उपवन की कलियों ने मेरी व्यथा सुनी 
जब संध्या के आँचल ने मुझको सहलाया 
जब बारिश की बूँदों ने मुझको दुलराया ।
भावों का क्या ये तो यूँ ही बह आते हैं 
पर तुमने तो एक बार पलट कर ना देखा ।


आदरणीय आशा सक्सेना
जब विष बुझे  शब्दों के बाण
मुहँ के  तरकश से निकलते
क्षत विक्षत मन करते
उसे  विगलित करते | 
दिल का सारा चैन हर लेते
व्यथा मन की जानने की
किसी को यूं तो जिज्ञासा न होती


आदरणीय अनुराधा चौहान
जल प्लावन, भूकंप झटके
रूप प्रलय का धरा धरी
पहाड़ मिटा पेड़ों को काटे
पर्यावरण विनाश करे
व्यथा धरा की कर अनदेखी
हरियाली का नाश करे
मानवता का बैरी बनता
मानव को ही मार रहा
काल मुहाने बैठा मानव
दानव जैसा रूप धरा


आदरणीय शुभा मेहता
My photo
मेरी व्यथा की कथा 
क्या कहूँ......
मैं हूँ इक "आम"आदमी 
"आम"आदमी 
जो होता नहीं 
कभी खास...।
कभी पेंशन पाने को 
सरकारी दफ्तर के
चक्कर लगाता 


आदरणीय कुसुम कोठारी
उधर सीपी बिखरी पड़ी थी
दो टुकड़ों में
कराहती रेत पर असंज्ञ सी
अपना सब लुटा कर
व्यथा और भी बढ़ गई
जब जाते-जाते
मोती ने एक बार भी
उसको देखा तक नही,
बस अपने अभिमान में
फूला चला गया
सीप रो भी नही पाई


आदरणीय उर्मिला सिन्हा
सदियों के बाद....
समझ में आई बात
व्यथा के पन्नों पर
किसने लिख दी रात।।

पत्थर की  दीवारों पे
किसने नाजुक फूल उकेरे
तन्हाई की भींगी रातों में
क्यों यादों के मोती चमके।।

आदरणीय अभिलाषा ,चौहान
"व्यथा की कथा"

पुत्रवती युवती बडभागी,
पुत्र न हो तो बने अभागी।
जननी बन कर पीड़ा पाई,
दुनिया तुझको समझ न पाई ।
पाल-पोस कर बडा किया जब,
संतति बन गई स्वयं पराई।
सही व्यथा'औ 'रही एकाकी,
झोली में पीड़ा भर लाई।

आदरणीय अनीता सैनी
क़लम की व्यथा ...

वे बरसात की बूँदों-से होते हैं  
जिनका चेहरा नहीं होता फिर भी आवाज़ आती है 
न कोई रंग न कोई रुप बस पानी की बूँदें होती हैं  
बादल भी गढ़ते हैं कभी कभी आकार उनका 
तारे बन चमकते हैं झाँकते हैं  आसमान से 
कभी कोहरा बन अनुभव कराते हैं अपना 
फिर सूरज की किरणों के साथ ओझल हो जाते हैं 
उन किरदारों के हृदय में सुकून भरती है क़लम 
मिठास भरती है  शब्दों में उनके 
हँसी की खनक पॉकेट में रखती है  
.....
सही व सटीक रचनाएँ
कल मिलिए भाई रवीन्द्र जी से
131 वें विषय के साथ
सादर..





12 टिप्‍पणियां:

  1. निःशब्द हूँ, अपनी चार रचनाओं को प्रतिष्ठित रचनाओं की श्रेणी में पाकर और विभोर भी।
    व्यथा, जैसै शब्द, शायद कविताओं की आत्मा होती हैं तभी तो विविध रचनाकारों ने इस फर अपनी विलखती शब्दों में भावों को पिरोकर, बेहतरीन रंग दे दिया है।
    समस्त रचनाकारों व गुणीजनों को शुभकामनाएँ।
    पुनः आभार।

    जवाब देंहटाएं
  2. सुप्रभात
    मेरी रचना शामिल करने के लिए आभार सहित धन्यवाद जी |

    जवाब देंहटाएं
  3. वाह!शानदार प्रस्तुति ।मेरी रचना को स्थान देने हेतु हृदयतल से आभारी हूँ ।

    जवाब देंहटाएं
  4. ओह...
    हम देख नहीं पाए...
    नही तो हम भी अपनी व्यथा लिख ही देते
    शुभकामनाएँ
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  5. सुन्दर प्रस्तुति ।हमारी रचना को चर्चा मंच पर स्थान देने
    के लिए ह्रदय से आभारी हूँ।

    जवाब देंहटाएं
  6. विभिन्न रचनाकारों की खूबसूरत रचनाओं में व्यथा के इतने आयाम और इतने रूप देख कर अभिभूत हूँ ! आज के संकलन में आपने मेरी रचना को भी स्थान दिया आपका हृदय से बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार यशोदा जी ! सप्रेम वन्दे ! सभी रचनाकारों को हार्दिक शुभकामनाएं !

    जवाब देंहटाएं
  7. बहुत ही सुंदर प्रस्तुति।मेरी रचना को स्थान देने हेतु सादर आभार आदरणीय दी।

    जवाब देंहटाएं
  8. बहुत अच्छी हलचल प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं
  9. बहुत सुंदर प्रस्तुति, मेरी रचना को स्थान देने के लिए आपका हार्दिक आभार आदरणीया।

    जवाब देंहटाएं
  10. बेहतरीन रचना संकलन,बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति
    सभी रचनाएं व्यथा को परिभाषित करती हुई।
    उत्तम सृजन के लिए सभी रचनाकारों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं 🙏🙏 मेरी रचना को स्थान देने के लिए सहृदय आभार आदरणीया 🙏🙏

    जवाब देंहटाएं

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