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मंगलवार, 18 अगस्त 2020

1859...राजनीति भावुक दृष्टिकोण बख़ूबी तलाश लेती है...


सादर अभिवादन। 

मंगलवारीय प्रस्तुति में आपका स्वागत है। 

अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव 
दिलचस्प होता जा रहा है 
दोनों उम्मीदवारों का प्रचार 
भारत से निकटता दर्शा रहा है
राजनीति भावुक दृष्टिकोण 
बख़ूबी तलाश लेती है 
सत्ता हथियाने के बाद 
सिर्फ़ अपने हित-लाभ में
बस अपने लिए सांस लेती है।
-रवींद्र   
आइए अब आपको आज की पसंदीदा रचनाओं की ओर ले चलें-

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जो फल नहीं पाईं कभी 
 ऐसी दुआओं से घिरे
 क्यूँ जी रहे हो जिंदगी 
यूँ छद्म भावों से घिरे
बस मौन हो सहते रहे 
हर जुल्म को,अन्याय को 
तुम बाँच भी पाए कहाँ 
आयु के हर अध्याय को


15 August 2020 Speech, Images | Happy Independence Day 2020
मुझे मान है इस धरती के
नदिया पर्वत अम्बर पर
मुझे गर्व चरणों को धोते
विनत भाव से सागर पर !
कण्ठ कण्ठ से जहाँ फूटता
भारत माँ का गान है
मैं भारत की बेटी हूँ
और भारत मेरी शान है !

हर बार अपने वजूद के प्रवाह के पहले
मुझे जुड़ना होता है
खुद पतवार बनना होता है 
ये सच है कि, मैं खंडित होती हूँ
कुछ बातों से, जज्बातों से
आपदाओं से, विपदाओं से
लेकिन ठीक उसी वक्त
मुझे ईश्वर की खंडित प्रतिमा
किसी मंदिर के आँगन में
एक कोने में रखी मिलती है


जुड़ नहीं पाता अपने परिवार की जड़ों से 
खो देता है हक़ जिसका वह है हक़दार।
मल लेता है वह अपनी ही देह पर मटमैले दाग़  
और ज़िंदगी भर धोता रहता है निष्ठा के घोल से।
घर से भागा लड़का अभागा होता है।
अपने ही बनाए दायरे में खड़ा स्वयं से जूझता है।
 


पर कहीं नहीं इन वीरों का,
 इतिहास में नाम लिखा है,
इनके असीम बलिदानों को,
बस काल चक्र ने देखा है।

ऐसे ही एक गुमनाम वीर की,
में यह कथा सुनाती हूँ,
इन्हें और इनके परिवारों को,
में नित नित शीष झुकाती हूँ।

दशरथ जी के संतान योग पर भारी, रावण की अभिसंधि.... गगन शर्मा 

 

जिसका अपनी इन्द्रियों  भावनाओं पर पूरा नियंत्रण हो ! इसके साथ ही अपने जीवन भर के पुण्यों की आहुति, बिना किसी हिचक, सोच या पछतावे केयज्ञ में होम कर सके ! क्योंकि उन्हीं पुण्यों के तेज और प्रताप से दैवी प्रसाद का निर्माण संभव था। 
*****

हम-क़दम का अगला विषय है-
'मुंडेर'
उदाहरणस्वरूप उपन्यासकार / कवयित्री मनीषा कुलश्रेष्ठ जी की एक कविता- 
एक औरत के गुनाह- मनीषा कुलश्रेष्ठ

"ये गुनाह हैं क्या आखिर?
ये गुनाह ही हैं क्या?
कुछ भरम,
कुछ फन्तासियां
कुछ अनजाने - अनचाहे आकर्षण
ये गुनाह हैं तो
क्यों सजाते हैं
उसके सन्नाटे?
तन्हाई की मुंडेर पर
खुद ब खुद आ बैठते हैं
पंख फडफ़डाते
गुटरगूं करते
ये गुनाह
सन्नाटों के साथ
सुर मिलाते हैं
धूप - छांह के साथ घुल मिल
एक नया अलौकिक
सतरंगा वितान बांधते हैं
सारे तडक़े हुए यकीनों
सारी अनसुनी पुकारों को
झाड बुहार
पलकों पर उतरते हैं
ये गुनाह
एक मायालोक सजाते हैं
फिर क्यों कहलाते हैं ये
एक औरत के गुनाह?"

- मनीषा कुलश्रेष्ठ 

साभार : हिंदी समय डॉट कॉम
***** 
आज बस यहीं तक 
फिर मिलेंगे आगामी गुरूवार। 
रवींद्र सिंह यादव


12 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन प्रस्तुति..
    आभार..
    सादर..

    जवाब देंहटाएं
  2. सराहनीय प्रस्तुति
    बेहद पसंद का शब्द

    जवाब देंहटाएं
  3. वाह!!अनुज रविन्द्र जी ,खूबसूरत प्रस्तुति ,दमदार भूमिका संग ।

    जवाब देंहटाएं
  4. अत्यंत सुंदर व आनंदकर प्रस्तुति। सभी रचनाएँ सशक्त व प्रेरणादायक हैं।
    मेरी रचना को स्थान देने के लिये हृदय से आभार। इस सुंदर व प्रव्म मयि साहित्यिक मंच से जुड़ना मेरे लिये सौभाग्य है।
    आप सबों को प्रणाम ।

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत ही सुन्दर सूत्र आज की हलचल में ! मेरी रचना को स्थान देने के लिए आपका हृदय से बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार रवीन्द्र जी ! सादर वन्दे !

    जवाब देंहटाएं
  6. बेहद खूबसूरत प्रस्तुति।

    जवाब देंहटाएं
  7. बेहतरीन प्रस्तुति।मुझे स्थान देने हेतु सादर आभार आदरणीय सर

    जवाब देंहटाएं
  8. बेहद खूबसूरत प्रस्तुतियां, हमारे हिंदी ब्लॉग पर भी पधारें प्रेरणादायक सुविचार

    जवाब देंहटाएं
  9. आदरणीय रवींद्रजी, देर से आने के लिए क्षमा चाहती हूँ। बेहतरीन लिंक्स का संयोजन। सोच के दायरे को विस्तृत करती हुई भूमिका। मेरी रचना को पाँच लिंकों में स्थान देने के लिए हृदय से धन्यवाद आपका। सादर।

    जवाब देंहटाएं

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