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मंगलवार, 4 अगस्त 2020

1845 ...कैद मैना को आसमाँ का ख़्याल आता है

राखी भी लिपट गई कलाइयों में
सादर नमस्कार..
किसी ने बांध दी है राखी कोरोना को भी
दक्षिण भारत से समाचार है कि 
कोरोना का जोर अब कम है
कारण बताया गया कि
भारत में पैदा होने वाले बच्चों को
दना-दन कई टीके गोद दिए जाते हैं.
..मसलन.... सबसे पहले माता का फिर
डी. पी. टी., बी. सी. जी., टी. आई. बी. सी.
और अंत में रोटॉवायरस..

और दो बूँंद जींदगी की हर वर्ष
अमिताभ जी पिलवाते ही रहते है

विदेशों में इन टीकों को महत्व नहीं देते
मुझे तो लगता है कि 
डिप्थीरिया (गलघोटू) का ही रूप है कोरोना
जिसमें गलें के अंदर और फेफड़ों में सफेदी सी जम जाती है
जिससे बच्चे को सांस की तकलीफ होती है
जो कि पेनीड्योर इन्जेक्शन से ठीक होता है
विस्तार से फिर कभी..
आज की विशेष प्रस्तुति पर एक नज़र...


नाम ....
Woman, Girl, Freedom, Happy, Sun
मेरा नाम पुराने स्टाइल का है,
थोड़ा लम्बा भी है,
मुझे बिल्कुल पसंद नहीं है,
पर यही नाम जब कभी 
उसके होंठों पर होता है,
मुझे अच्छा लगता है.


ग़म के फ़साने में उलझ जाता हूँ ...

जाने कैसी तेरी जुल्फों की है फ़ितरत जानां ।
मैं तेरा अक्स बनाने में उलझ जाता हूँ ।।

तोड़ जाती है कमर रोज़ यहां महँगाई ।
मैं तो परिवार चलाने में उलझ जाता हूँ ।।


लाभ-हानि ...

क्या तुम्हें एहसास नहीं होता?
नये किसलय निकले दिखलाई नहीं देते...
पीलापन! न ना पीलापन कहूँ तो
पीलिया का ख्याल आता है
उफ्फ्! वायरल शर्त।
वृद्धि हुई स्तरों बिलीरुबिन
क्षतिग्रस्त जिगर गर्त
किसी रोग को याद नहीं करना... 
तुमलोग क्या कहते हो येल्लोइश?
अच्छा! कुछ अंग्रेजी के शब्द तुम्हें भी जमने लगे हैं


सावन सोमवार औऱ मैं ...
यह देखने के लिए
घंटो खड़े रहते थे
सावन सोमवार के दिन
मंदिर के सामने
कितना पागलपन था उन दिनों


एक धारा ...

वो, भिगोते थे, कभी बारिशों में,
लरजते थे, कभी सुर्ख फूलों पे हँस कर,
यूँ, सिमट आते थे, दबे पाँव चलकर,
अब वो मिले, दो बूँद बनकर,
और, नैनों में उतरे!
यूँ मन की गली से, वो गुजरे!


आवाज दे रही ...
दबी चिंगारी है;  फिर भी उबाल आता है।
कैद मैना को आसमाँ का ख़्याल आता है।

सिलसिला ऊँची उड़ानों का यूँ तो उसकी;
जाने क्यों फिर घरौंदे का सवाल आता है।
...
हम-क़दम
अब 130 वाँ विषय..
व्यथा

इस विषय पर लिखिए 
आप अपनी किसी भी विधा की रचना 
और भेज दीजिए कॉन्टैक्ट फ़ॉर्म के ज़रिये
08 अगस्त 2020 तक
उदाहरण

कि जिसमें एक प्रतिज्ञा करूँ
वही दो बार शब्द बन जाय
बताऊँ बार-बार वह अर्थ
न भाषा अपने को दोहराय

अरे अब ऐसी कविता लिखो
कि कोई मूड़ नहीं मटकाय
न कोई पुलक-पुलक रह जाय
न कोई बेमतलब अकुलाय

छंद से जोड़ो अपना आप
कि कवि की व्यथा हृदय सह जाय
थाम कर हँसना-रोना आज

उदासी होनी की कह जाय
रचयिता
श्री रघुवीर सहाय


अब बस
कल आएँगी पम्मी बहन
सादर



12 टिप्‍पणियां:

  1. सस्नेहाशीष व शुभकामनाओं के संग हार्दिक आभार आपका

    उम्दा प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं
  2. आदरेषु
    बढ़िया प्रस्तुति..
    विस्तृत आलेख की प्रतीक्षा में
    सादर..

    जवाब देंहटाएं
  3. शुभ प्रभात,
    इस बेहतरीन मंच का हिस्सा बनना, हमेशा ही एक सुखद अनुभूति और ढेर सारी प्रेरणाएं दे जाता है। आभारी हूँ इस पटल का।

    जवाब देंहटाएं
  4. सुन्दर प्रस्तुति,
    बेहतरीन लींको का संकलन....

    जवाब देंहटाएं
  5. सुंदर प्रस्तुति.आभार आपका

    जवाब देंहटाएं
  6. बहुत अच्छी हलचल प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं
  7. अत्यंत सुंदर अभिव्यक्तियों से भरी हुई सुंदर प्रस्तुति।
    पढ़ कर बहुत आनंद आया। आज की प्रस्तुतियां थोड़ी भिन्न भी थीं सो और आनंद बढ़ गया।
    बहुत ही सुंदर मंच है यह और युवा से लेकर वृद्ध तक, अब के लिए कुछ न कुछ होता है यहां।
    सबों को प्रणाम।

    जवाब देंहटाएं
  8. हार्दिक शुभकामनाएं
    बहुत सुंदर सूत्र संयोजन
    सभी रचनाकारों को बधाई
    मुझे सम्मलित करने का आभार
    आपको साधुवाद

    जवाब देंहटाएं

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