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गुरुवार, 9 जनवरी 2020

1937...क्योंकि लगी आग में झुलसा अपने घर का कोई नहीं होता है...

सादर अभिवादन।

आइए पढ़ते हैं आज की पसंदीदा रचनाएँ- 


 

क्योंकि
लगी
आग में
झुलसा
अपने
घर का
कोई नहीं
होता है

लगे रहिये

गुंडों के
देवत्व को
महिमामण्डित
करने में 



 
सुलगाई चिंगारी, जलाया उसने ही देश मेरा
ये तैमूर, बाबर, चंगेज, अंग्रेज
लूटे थे, उसने ही देश
ना फिर से हो, उनका प्रवेश
हो नाकाम, वो ताकतें
हों वो, निस्तेज!


 

      सैनिक
सैनिक सीमा पर खड़ा ,सजग रहे दिन रात।
देश प्रेम सब कुछ अहो ,मात पिता अरु भ्रात।।

मात पिता अरु भ्रात, घाम अति सहता सरदी।
तन पर झेले घात, बदन पर पहने वरदी ।।
करती सुधा प्रणाम, कर्म उनका यह दैनिक।
साहस का प्रतिरूप,त्याग दे जीवन सैनिक।।



 

एक बार
लम्बी बाहों की तरह
क्योंकि मफलर
भी लगता है मुझे मेरा अपना
जो रहता है तैयार
हमेशा बाहें फैलाये .......!!



  
एक इवेंट मैनेजर के अनुसार शादी के खर्चों में कटौती हर तरह से जरूरी है। उनका मानना है कि इन खर्चों का कोई अंत नहीं होता। और पैसे चाहे जिसके लग रहे हों, इसका लगभग पच्चीस से तीस प्रतिशत फिजूलखर्च ही होता है। शादी में पैसे को सोच-समझ कर खर्च किया जाए, तो इन्हीं बचे हुए पैसों का इस्तेमाल बाद में कई उपयोगी चीजों पर किया जा सकता है। नई जिंदगी शुरू करने के लिए कई चीजों की जरूरत होती है, अगर आपको पैसा खर्च ही करना है, तो उसे आवश्यकता अनुसार ही खर्च करना चाहिए और फिजूलखर्ची करने से बचना चाहिए l


हम-क़दम का विषय
विषय क्रमांक 103
चोट
उदाहरण

लगी है चोट जो दिल पर बता नहीं सकते
ये वो कसक है जो कहकर सुना नहीं सकते

तुम्हारे प्यार को भूलें तो भूल जायें हम

तुम्हारी याद को दिल से भुला नहीं सकते

रचनाकार स्मृतिशेष गुलाब खंण्डेलवाल

प्रविष्ठियां शनिवार दिनांक 11 जनवरी 2020 को 
शाम तीन बजे तक ही स्वीकार्य। 


आज बस यहीं तक 
फिर मिलेंगे अगले गुरूवार। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

6 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन प्रस्तुति...
    आभार..
    सादर..

    जवाब देंहटाएं
  2. शुभ प्रभात
    मेरी रचना "जलता देश" को अपने पटल उद्धृत करने हेतु साधुवाद आदरणीय। इस भाव को जन-जन तक पहुँचाएँ, तो और भी अच्छा।
    चोट तो अपनों ने पहुँचाई, ग़ैरों में कहाँ दम था, खोट है अपनी ही नीयत में, ये गम क्या कम था, आजाद हुए हम वर्षो पहले, ये आजादी क्या कम था, अब डूब रहे हम आजाद गगन में, चोट लगी है फिर इस मन में, पढना-लिखना व्यर्थ हुआ, डूब रहे हैं हम जब, पानी भी कम था।
    चोट दे रहे, समाज के चेतक, चोट उन्हें अब पहुँचाना है, व्यर्थ हमें क्यूँ टूट जाना है।

    जवाब देंहटाएं
  3. सभी रचनाएँ उम्दा मेरी रचना शामिल करने के लिए आभार !!

    जवाब देंहटाएं
  4. आभार रवींद्र जी जगह देने के लिये। उम्दा प्रस्तुति।

    जवाब देंहटाएं
  5. वाह!रविन्द्र जी ,सुंदर संकलन ।

    जवाब देंहटाएं

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