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शनिवार, 11 जनवरी 2020

1639...चेतना

सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष 
बीते कल 10 जनवरी 2020
विश्व हिन्दी दिवस था
दिवस क्यों मनाना पड़ा, क्यों मनाना चाहिए यह चिंतन का विषय है। चिंतन का आधार है चेतना..
क्या है यह चेतना
सँभाला अपने को। दुकान में ग्राहक खड़े हैं।
जोर-जोर से मुँह पर पानी के छपाके मारे।
 "चुप, चुप।" काँपते होठों को बरजा।
"अब बस, हो गए पाँच मिनट। आज का तेरा रोने का कोटा खत्म।"
उखड़ी साँसे सँभाली। होंठ खींचकर मुस्कान चिपकाई।
मुस्तैदी से काउंटर के पीछे आ खड़ी हुई।
"एस, नेक्स्ट पर्सन प्लीज।
क्यों होती है चेतना
अदभुत. करो मेहनत से तुम सब पढ़ाई बबुआ ,
नाहीं जीवन होई आगे दुखदायी बबुआ ।
पढ़ लिख लेबौ तौ ज्ञान बढ़ जाई ,
चाहे जहाँ रहीबो सम्मान बढ़ जाई ।
होई शिक्षा से सबकै भलाई बबुआ ,
नाहीं जीवन होई आगे दुखदायी बबुआ

सभी के पास होती है चेतना
जनहितकारी काम करोगे।
दुःखियों के दुःख दर्द हरोगे।।
जनता क्षमा नहीं करती है।
सच्चे पर सब कुछ हरती है।।
मत लग जाना तुम इतराने।

काश उधार में मिलती चेतना
हाथी-सा बलवान, जहाजी हाथों वाला और हुआ
सूरज-सा इंसान, तरेरी आँखों वाला और हुआ
एक हथौड़े वाला घर में और हुआ
माता रही विचार अंधेरा हरने वाला और हुआ
दादा रहे निहार सवेरा करने वाला और हुआ
एक हथौड़े वाला घर में और हुआ

क्या हुआ. मारो मत बच्चा है.

माताराम, अभी तो हाथ भी नहीं लगाया. हम मार नहीं रहे. सिर्फ पूछने में इतना चिल्ला रहा है.

दीदी, भाभी आदि से आंटीजी, माताराम में हुए प्रमोशन की पीड़ा बच्चों के रोने के आगे गौण थी. माताओं को बीच बचाव करते देख पड़ोसी के लॉन में झुरमुट में छिपी दो लड़कियां भी हाथ जोड़े मेरे सामने आ खड़ी हुईं. वे भी लगातार चीख कर रोती जाती थी.

    ><><
पुन: मिलेंगे...
    ><><

आज का विषय
विषय क्रमांक 103
चोट
उदाहरण

लगी है चोट जो दिल पर बता नहीं सकते
ये वो कसक है जो कहकर सुना नहीं सकते
तुम्हारे प्यार को भूलें तो भूल जायें हम
तुम्हारी याद को दिल से भुला नहीं सकते

रचनाकार स्मृतिशेष गुलाब खंण्डेलवाल

प्रविष्ठियां आज शनिवार दिनांक 11 जनवरी 2020 को 
शाम तीन बजे तक ही स्वीकार्य

7 टिप्‍पणियां:

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