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शुक्रवार, 17 जनवरी 2020

1645..क्योंकि जी रहा हूँ मैं अब तक प्यार-भरों के प्यार में

शुक्रवारीय अंक में
आप सभी का
स्नेहिल अभिवादन
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रांगेय राघव

17जनवरी 1923 - 12 सितंबर1962
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हिंदी,अंग्रेजी,ब्रज और संस्कृत के ज्ञाता 
"तिरूमल्लै नंबाकम वीर राघव आचार्य।"
कहानी, उपन्यास, आत्मकथा, रिपोर्ताज जैसी विधाओं के ज्ञाता, हिंदी साहित्य को  समृद्ध करने वाले, हिंदी के शेक्सपीयर कहे जाने वाले लेखक  रांगेय राघव मूल रुप से तमिल भाषी थे।

जिन्हें निम्नलिखित 
हिंदुस्तानी अकादमी पुरस्कार, डालमिया पुरस्कार, 
उत्तर प्रदेश शासन पुरस्कार, राजस्थान साहित्य अकादमी 
पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

उनका यह विपुल साहित्य उनकी अभूतपूर्व लेखन
 क्षमता को दर्शाता है। जिसके संदर्भ में कहा जाता रहा है कि ‘जितने समय में कोई पुस्तक 
पढ़ेगा उतने में वे लिख सकते थे। वस्तुतः उन्हें कृति की रूपरेखा बनाने में समय लगता था
लिखने में नहीं।‘ रांगेय राघव सामान्य जन के ऐसे
रचनाकार हैं जो प्रगतिवाद का लेबल चिपकाकर 
सामान्य जन का दूर बैठे चित्रण नहीं करते
बल्कि उनमें बसकर करते हैं। समाज और इतिहास की यात्रा में वे स्वयं सामान्य जन बन जाते हैं। रांगेय राघव ने वादों के चौखटे से बाहर रहकर सही
 मायने में प्रगितशील रवैया अपनाते हुए अपनी 
रचनाधर्मिता से समाज संपृक्ति का बोध कराया। समाज के अंतरंग भावों से अपने रिश्तों की पहचान 
करवाई।  उन्होंने केवल इतिहास कोजीवन कोमनुष्य की 
पीड़ा को और मनुष्य की उस चेतना कोजो अंधकार से जूझने की शक्ति रखती हैउसे ही 
सत्य माना।

उनकी लिखी एक कविता-
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ओ ज्योतिर्मयि ! क्यों फेंका है,
मुझको इस संसार में ।
जलते रहने को कहते हैं,
इस गीली मँझधार में ।

मैं चिर जीवन का प्रतीक हूँ
निरीह पग पर काल झुके हैं,
क्योंकि जी रहा हूँ मैं
अब तक प्यार-भरों के प्यार में...



★★★★★

आइये आज क रचनाएँ पढ़ते

 मन

मिट कर चैन मिले न जाने किरणों संग यदि उड़ जाये, उसी एक से एक हुआ तब नजर नहीं किसी को आये ! किन्तु उसे दूर जाना है लक्ष्य कई मन में पाले हैं, पाहन, जंगल, विजन, शहर भी उसके रस्ते में आने हैं !


एक सत्य - सत्य से परे

लड़की बदनसीब नहीं 
बदनसीब तुम हो 
जो उसके साथ हुए दुर्व्यवहार से नहीं दहलते 
नहीं पसीजते 
उसे मारनेवाले से कहीं अधिक हिंसक तुम हो 
जो हर बार आगे बढ़ जाते हो 
लानत है तुम पर  !!!

नदी और समंदर

मैं समंदर में मिलूँ,
खारी हो जाऊं,
इससे अच्छा है 
कि रास्ते में ही सूख जाऊं,
मीठी बनी रहूँ.



सफ़ेदपोशी

मूक-बधिर बनी सब साँसें, 
 सफ़ेदपोशी नींव पूँजीवाद की रखने लगी,  
आँखों में झोंकते सुन्दर भविष्य की धूल, 
अर्जुन-वृक्ष-सा होगा परिवेश स्वप्न समाज को दिखाने लगे |



बेचारी बुधिया को समझ नही आ रहा था कि वो कल्लू से क्या कहे, कैसे उसको समझाये। चूल्हे पर सेक रही रोटी को चूल्हे से निकाल कर, कल्लू को गोद में बिठाल ली, बालो में हाथ फिराते हुये अपनी पूरी ममता उडेलते हुये बोली- तुने कैसे समझा रे कि मै तुमको जूठा खिलाती हूँ, देख ये रोटी तेरे लिये गरमागरम बना रही हूँ न। मेरा लाल भी काहे खाये किसी का जूठा।

★★★★★★

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हमक़दम का विषय

यहाँ देखिए


कल आ रही हैं विभा दी एक विशेष

अंक लेकर कल का अंक पढ़ना न भूले।
★★★★★

विचार नभ पर कल्पनाओं के
इंद्रधनुष टाँकना ही पर्याप्त नहीं
सत्ता,संपदा,धर्म-जाति अस्वीकारो
मानवीय मूल्य सर्वव्याप्त करो

सही आकार देकर समाज को
उन्नत भविष्य का परवाज़ दो
 दावानल बन न  विनाश करो
दीपक-सा जल तमस हरो

11 टिप्‍पणियां:

  1. सारे रंग दीखते हैं प्रस्तुतीकरण में
    संग्रहनीय संकलन

    जवाब देंहटाएं
  2. मै तो भूल ही चुका था आचार्य रांगेय जी को
    आभार, काफी कहानियां पढ़ी नीहारिका,कादम्बिनी और नवनीत में..
    उत्तम प्रस्तुति..
    सादर..

    जवाब देंहटाएं
  3. सामयिक प्रस्तुतिकरण के साथ सुंदर लिंकों का चयन।
    सभी चयनित रचनाकारों को बधाई।
    धन्यवाद

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत अच्छी हलचल प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं
  5. अच्छी प्रस्तुति. मेरी कविता शामिल की शुक्रिया

    जवाब देंहटाएं
  6. बहुत ही सुन्दर भूमिका के साथ शानदार रचनाएँ प्रिय श्वेता दी.
    मुझे स्थान देने के लिये तहे दिल से आभार.
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  7. शानदार प्रस्तुति उम्दा लिंक्स...
    सभी रचनाकारों को हार्दिक बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  8. भुमिका बहुत सुंदर! रांगेय राघव जी पर शानदार शोध युक्त प्रस्तुति ,उनके बारे में बहुत कुछ जानने को मिला एक कालजयी साहित्यकार को नमन।
    सभी रचनाकारों को बधाई।
    सभी रचनाएं बहुत आकर्षक।

    जवाब देंहटाएं
  9. आदरणीय रांगेय राघव जी के बारे में पढकर अच्छा लगा ।
    ओ ज्योतिर्मयि ! क्यों फेंका है,
    मुझको इस संसार में ।
    जलते रहने को कहते हैं,
    इस गीली मँझधार में ।

    मैं चिर जीवन का प्रतीक हूँ
    निरीह पग पर काल झुके हैं,
    क्योंकि जी रहा हूँ मैं
    अब तक प्यार-भरों के प्यार में...
    उनकी पंक्तियाँ वस्तुतः मन को भा गई । पटल को तथा विशेषकर आदरणीया श्वेता जी को शुभकामनाएं ।

    जवाब देंहटाएं

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