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शनिवार, 8 सितंबर 2018

1149...हिन्दी दिवस पखवाड़ा... भारतेन्दु हरिश्चन्द्र


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आप सभी को
यथायोग्य प्रणामाशीष
मुझे बैंगलोर में रहना है... परिवार वालों की इच्छा है
रहना पसंद नहीं आ रहा ... कारण क्या हो सकता है...
हिन्दुस्तान में हिन्दी के लिए गुहार
जन्मदिन कल है हिन्दी के जनक

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भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

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भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

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भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

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फिर मिलेंगे...
हम-क़दम
सभी के लिए एक खुला मंच
आपका हम-क़दम का पैंतीसवाँ क़दम
इस सप्ताह का विषय है
'मितवा'
...उदाहरण...
कल से क्या
आज से गवाही ले मितवा
आंखों में झीलें हैं
झीलों में रंग
रंगवती हलचल की
-हरीश भादानी
उपरोक्त विषय पर आप को एक रचना रचनी है
एक खास बात और आप इस शब्द पर फिल्मी गीत भी दे सकते हैं

चाहूँगा मैं तुझे....
दर्द भी तू चैन भी तू
दरस भी तू नैन भी तू
मितवा ...
मेरे यार तुझको बार बार
आवाज़ मैं न दूँगा, आवाज़ मैं न दूँगा

अंतिम तिथि :: आजशनिवार 08 सितम्बर 2018
प्रकाशन तिथि :: 10 सितम्बर 2018  को प्रकाशित की जाएगी ।

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11 टिप्‍पणियां:

  1. सुप्रभातम् दी:)
    भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पर आज यह विशेष संकलन संग्रहणीय है। भारतेंदु हरिश्चंद्र की कालजयी रचनाएँ आज के संदर्भ में भी प्रासंगिक है।
    उन्होंने साहित्य की अनेक विधाओं में रचनाएँ की..उनकी लिखी कह-मुकरी बहुत पसंद मुझे-
    सीटी देकर पास बुलावै।
    रुपया ले तो निकट बिठावै॥
    लै भागै मोहि खेलहिं खेल।
    क्यों सखि साजन, नहिं सखि रेल॥

    ग़ज़ल का हास्य रुप उन्होंने हज़ल रचा। मातृभाषा के संदर्भ में उनकी रचना की दो पंक्तियाँ-

    निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल
    बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।

    एक प्रतिभाशाली रचनाकार का परिचय करवाने के लिए आभार आपका दी।
    सादर।

    जवाब देंहटाएं
  2. आदरणीय दीदी
    सादर नमन
    इतनी सुन्दर प्रस्तुति
    आभार....
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति ।

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत सुंदर प्रस्तुति शानदार रचनाएं

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति ।

    जवाब देंहटाएं
  6. सुंदर प्रस्तुति है। जब हरिश्चंद्र इंटर कालेज वाराणसी में पढ़ता था,तो मुख्य द्वार से प्रवेश करते ही भारतेंदु हरिश्चंद्र की प्रतिमा का दर्शन करता था, और स्मारक पर अंकित वे शब्द -
    निज भाष उन्नति अहै,सब उन्नति को मूल..
    पूरे चार वर्षों तक इस प्रतिमा के समीप से गुजरा , फिर भी हिन्दी की उपेक्षा की मैंने, बस गणित के सवालों में उलझा रहा। परंतु अपनी इस उद्दंडता की सजा आज मुझे निश्चित ही मिल रही है कि जब कुछ अभिव्यक्त करना चाहता हूं, तो शब्द नहीं सुझते हैं।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. कोशिश करते रहें कामयाबी जरूर मिलेगी...
      जब जिस की जरूरत होती है उसी हिसाब हम प्राथमिकता तय करने के लिए विवश होते हैं...

      हटाएं
  7. आधुनिक हिंदी के पितामह भारतेंदु हरिश्चंद्र के ऊपर उन के जन्म दिवस पर शानदार संकलन ।

    जवाब देंहटाएं
  8. इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.

    जवाब देंहटाएं
  9. रीति काल के छोर पर और नवयुग के आगमन क्षितिज पर भारतेंदु का उदय उस चन्द्रमा के सदृश हुआ जिसने अपनी चाँदनी से सहित्य को न केवल धवल निर्मलता प्रदान की प्रत्युत साहित्य के आँगन में व्याप्त समस्त कुरीतियों का उच्छेदन किया. बहुत सुन्दर संकलन. बस केवल सबसे पहले लेख में एक गलत जानकारी दी गयी है कि उनका जन्म सुंघनी साहू के परिवार में हुआ. सुंघनी साहू के परिवार में जयशंकर प्रसाद का जन्म हुआ था, भारतेंदु का नहीं. इसे सुधार लिया जाय, अन्यथा पाठकों को इस महत्वपूर्ण मंच से भ्रामक सूचना चली जाएगी.

    जवाब देंहटाएं

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