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सोमवार, 11 मई 2020

1760 ...हम-क़दम का एक सौ उन्नीसवाँ अंक...संजीदगी

संजीदगी के साथ
संजीदा लोगों के लिए
पढ़िये मतलब
संजीदगी का
स्थिरचित्त या गंभीर 
होने की अवस्था या भाव; 
गम्भीरता; 
सौम्यता; 
संजीदा होने की 
अवस्था या भाव। 
आचरण, विचार य़ा 
व्यवहार की गंभीरता। 
स्वभाव संबंधी 
शिष्टता तथा सौम्यता। 

शुरुआत में कुछ कालजयी रचनाएँ
.........................
आदरणीय नीरज गोस्वामी
संजीदगी, वाबस्तगी, शाइस्तगी, खुद-आगही
आसूदगी, इंसानियत, जिसमें नहीं, क्या आदमी

ये खीरगी, ये दिलबरी, ये कमसिनी, ये नाज़ुकी
दो चार दिन का खेल है, सब कुछ यहाँ पर आरिज़ी

हैवानियत हमको कभी मज़हब ने सिखलाई नहीं
हमको लड़ाता कौन है ? ये सोचना है लाजिमी

मरहूम ज़नाब नाज़िम हिक़मत
जीने के बारे में.... 
जीना कोई हँसी-मज़ाक नहीं,
तुम्हें पूरी संजीदगी से जीना चाहिए
मसलन, किसी गिलहरी की तरह
मेरा मतलब ज़िन्दगी से परे और उससे ऊपर
किसी भी चीज़ की तलाश किए बगैर.
मतलब जीना तुम्हारा मुकम्मल कारोबार होना चाहिए.

आदरणीय प्रभुनारायण पटेल
प्रभुनारायण पटेल  PRABHU NARAYN PATEL
मेघ!
तुम तो दूत
दिलों के मामले में नामी हो,
कवि कुल गुरु से दीक्षित हो,
अंतर्यामी हो,
तुम्हारा अंतिम पड़ाव,
माधुरी दीक्षित का गाँव,
मुंबई - रूप रस की नगरिया,
तुम जरा संजीदगी से
उनकी बड़ी दीदी से कहना -
चलो, वर्षाजी !
अब भरलो गगरिया।

आदरणीय डॉ. राकेश जोशी

योजनाओं को चलाने को तुम्हारे
वो बड़े बंगले, वो दफ़्तर कब बनेंगे

आज तो संजीदगी से बात की है
अब ये सारे लोग जोकर कब बनेंगे

कब तलक कचरा रहेंगे बीनते यूं
तुम कहो, बच्चे ये अफ़सर कब बनेंगे


सालों से बंद संदूक में
वो तह लगे खत,
कुछ पोस्टकार्ड, कुछ इनलैंड
और कुछ लिफाफे
किताबों के नीचे दबी यें पुरानी चिट्ठियाँ,
बड़ी संजीदगी से मानो
मैने कुछ यादों को संजोया था,
कुछ अफ़सानें बटोरे थे,
तो कुछ फ़लसफ़े खोज़ लिए थे|

राकेश मालवीय की रचना
बचपन से ही लुभाती है मुझे सिलाई मशीन
सोचती हूं इस छोटी सी मशीन से आखिर
कैसे हो जाते हैं इतने काम !
एक लय में, एक जैसे सुरों के साथ
दिलचस्प है इसका संगीत
केवल एक मशीन भर नहीं है यह
जिंदगी का ताना-बाना भी बुनती है
संजीदगी से
....
नियमित रचनाएँ..
......

आदरणीय पुरूषोत्तम कुमार सिन्हा जी
दबी हुई सी अनंत चाह है संजीदगी में उनकी,
जलप्रपात सी बही रक्त प्रवाह है धमनियों में उनकी,
फिजाओं में फैलता हुआ गूंज है आवाज में उनकी।
फिर हुई हिचकी! क्या चल पड़ी हैं वो निगाहें इस ओर ?


आदरणीय रश्मि प्रभा दीदी

तुम मेरे लिए जीते रहे
हम तुम्हारे लिए जीते रहे
इतनी संजीदगी थी जीने में
कि दर्द भी शर्मिंदा हुआ ...


आदरणीय साधना वैद जी 
तुम्हारा मौन
सारी कायनात
जाने किस अनिर्दिष्ट
आतंक से भयभीत हो
एकदम खामोश है 
संजीदगी का तुम्हारा यह 
अनचीन्हा सा बाना 
मेरी समझ से 
नितांत परे है ! 



आदरणीय आशालता सक्सेना
जीवन में उतार चढ़ाव आते रहते  
वे नजर आते जिन्दगी की धड़कनों में
जब  धड़कन तेज हो बेकाबू होने लगती
सब कहते धीरज धरो  शांति से काम लो |
जब सांस की गति मंद पद जाती
कहा जाता व्यर्थ  चिंता किस बात की
है यही जिन्दगी का सत्य


आदरणीय अनीता सैनी
संजीदगी संग प्रश्न

संजीदगी संग प्रश्न अनुत्तरित,
रिसते निरंकुशता के गहरे घाव, 
उन्मुख अंबर को है ताकता,  
दीप्ति-दृग,सौम्य मुख प्रादुर्भाव। 



 आदरणीय सुबोध सिन्हा जी


सारा दिन संजीदा लाख रहे
मोहतरमा संजीदगी के पैरहन में
मीन-सी ख़्वाहिशें मन की, 
शाम के साये में मचलती है बारहा

निगहबानी परिंदे की है मिली 
इन दिनों जिस भी शख़्स को
ख़ुश्बू से ही सिंझते माँस की, 
उसकी लार टपकती है बारहा

आदरणीय भारती दास
कर्महीनता दुर्योधन की ..
संजीदगी जिसने निभाई
जो संजीदा हुआ यहां
उसका मकसद उसका जीना
प्रवाह प्रकाश का हुआ यहां.
अपमान-मान-अभिमान त्यागकर
धीरता को अपनाया है
ढाल एकता का बनाकर
विषाद गंभीर मिटाया है.

वक़्त की हर गाँठ पर ....मन की उपज

संज़ीदगी 
मात्र सोच में क्यों
जीने के तौर-तरीकों में
"मेरी मर्जी"
ऐसी क्यूँ
मग़रूरी है।


.....
आज का अंक यही सिमट गया
कल आ रहे हैं भाई रवीन्द्र जी 

एक सौ बीसवें विषय के साथ
सादर..



18 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरी संदर्भ अंक..
    सभी को शुभकामनाएँ
    सादर..

    जवाब देंहटाएं
  2. सस्नेहाशीष संग शुभकामनाएं छोटी बहना
    सराहनीय प्रस्तुतीकरण

    जवाब देंहटाएं
  3. सुप्रभातम् दी।
    कालजयी और समसामयिक रचनाकारोंं के सुंदर,विस्तृत विचारों का सराहनीय संकलन है यह अंक।
    सभी को बहुत बधाई।
    बहुत सुंदर प्रस्तुति दी।
    सादर।

    जवाब देंहटाएं
  4. सुप्रभात दी
    उम्दा संकलन रचनाओं का |
    मेरी रचना शामिल करने के लिए आभार सहित धन्यवाद |

    जवाब देंहटाएं
  5. सुप्रभात संग नमन आपका ... साथ ही आभार आपका आज के अंक में दिए गए विषय पर कई कालजयी रचनाओं और कई इंद्रधनुषी रचनाओं के संग मेरी रचना/विचार को साझा करने के लिए ...

    जवाब देंहटाएं
  6. वाह!!बहुत ही खूबसूरत संकलन ।

    जवाब देंहटाएं
  7. बहुत अच्छी हलचल प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं
  8. पा ही जाते हैं मंज़िल दिन-रात साथ सफ़र करते मुसाफ़िर
    पर यहाँ से वहाँ, वहाँ से यहाँ रेल बेचारी भटकती है बारहा

    आवारापन की खुज़ली चिपकाए बदन पर हमारे शहर की
    हरेक शख़्सियत संजीदगी के लिबास में।। संजीदगी को बेहतरीन, शब्दों में उतारता सार्थक अंक👌👌 । मुश्किल विषय जो बड़े गंभीर चिंतन को जन्म देताहै। सभी रचनाकारों को बधाई। आपको शुभकामनायें हमकदम का एक और सार्थक अंक सजाने के लिए। सादर🙏🙏🙏

    जवाब देंहटाएं
  9. वाह क्या बात है सुंदर रचनाओं से परिपूर्ण लाजबाव प्रस्तुति


    जवाब देंहटाएं
  10. बहुत सुंदर प्रस्तुतीकरण सार्थक भूमिका के साथ. सभी रचनाएँ बेहतरीन हैं. सभी रचनाकरो को बधाई.
    मेरी रचना हम-क़दम में सम्मिलित करने के लिए सादर आभार आदरणीया यशोदा दीदी.

    जवाब देंहटाएं
  11. बहुत ही बेहतरीन रचनाओं का संकलन आज की हलचल में ! मेरी रचना को इस संकलन में स्थान देने के योग्य समझा किन शब्दों में आपका शुक्रिया करूँ शब्द कम पड़ जाते हैं ! आपका हृदय से बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार सखी ! सप्रेम वन्दे !

    जवाब देंहटाएं
  12. हमकदम का बेहतरीन अंक ,बहुत ही सुंदर प्रस्तुति दी ,सादर नमन

    जवाब देंहटाएं
  13. बहुत ही अच्छा कविता अपने पोस्ट किया है आप किसी भी प्रकार की हिंदी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं जैसे कि धर्म, महान लोग आदि मेरे इस वेबसाइट से Clik Here

    जवाब देंहटाएं
  14. बहुत सुन्दर कविता है, मैं भी एक शायर हूँ, गुलज़ार साहब की शायरी पढ़े gulzar shayai

    जवाब देंहटाएं

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