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शनिवार, 11 अप्रैल 2020

1730... "हाँ तुम रहो"

सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष
शब्दों में कहा करते थे
सब प्राणी एक से हैं
लेकिन
जो जिस पद पर थे
उस हिसाब से मद में थे
प्रकृति समझा रही है
वक़्त है प्रायश्चित कर लो
प्रवृति बदल लो
निवृति के पहले
मतभेद नहीं मिटाए जाते
‘श्वजन’ ‘स्वजन’ कहलाते
अशक्त असक्त हो जाते
अँगना अंगना से छूट जाता
अंश का अंस नहीं मिलता


जब भी प्रश्न सामने खड़े हो जाते हैं हम अक्सर भूतकाल में चले जाते हैं,
सोचने लगते हैं कि हमने पहले क्या किया था! हमारे बचपन में ना टीवी था,
ना बाहर घूमने की इतनी आजादी! बस था केवल स्कूल और घर या फिर मौहल्ला।
स्कूल में सांस्कृतिक कार्यक्रम होते ही रहते थे
लेकिन उनमें हिस्सा लेने की कूवत हम में नहीं थी।


हाँ तुम रहो
किसी डाल पर बसंत के जैसे
खिलो इसी ऋतु में
इस युग का ऋण चुकाने के लिए
करो सारे जतन
सबसे प्रेम करने के लिए


तुम मुझे देखकर ,मुड़  के चलती रहो
मैं विरह में मधुर गीत गाता  रहूँ
मैं  ज़माने की ठोकर ही खता रहूँ 
तुम ज़माने को ठोकर ही लगाती रहो 
जिंदगी के कमल पर गिरुं ओस सा


समन्दर में लहरें बहुत तेज
उठ-उठकर ठीठक रहीं थीं तब
वही किनारे पर बैठी हुई बची जिन्दगी ने
उसे नई सुबह का इंतजार करने को कहा
रौशन जहान में
माना की सितारे टूटते भी हैं


संसार मेरा मीत है
सौंदर्य मेरा गीत है
मैंने अभी तक समझा नहीं
क्या हार है क्या जीत है
           दुख-सुख मुझे जो भी मिले
           कुछ मैं सहूं कुछ तुम सहो।


><><
पुन: मिलेंगे
><><


अब बारी है विषय की
115 वाँ विषय
लघुकथा
आपको लघुकथा लिखनी है
प्रेरणा इस अंक की पहली रचना पढ़कर लें
अंतिम तिथिः 11 अप्रैल 2020
प्रकाशन तिथिः 13 अप्रैल 2020
ब्लॉग सम्पर्क फार्म द्वारा ही मान्य

8 टिप्‍पणियां:

  1. शब्दों में कहा करते थे
    सब प्राणी एक से हैं
    लेकिन
    जो जिस पद पर थे
    उस हिसाब से मद में थे
    प्रकृति समझा रही है
    वक़्त है प्रायश्चित कर लो
    प्रवृति बदल लो
    निवृति के पहले
    मनन योग्य पंक्तियाँ लिखी ह़ै दी।
    सभी रचनाएँ सदा की तरह उत्कृष्ट है।
    सराहनीय संकलन।
    सुंदर प्रस्तुति।
    प्रणाम दी।

    जवाब देंहटाएं
  2. आदरणीय शुभ प्रभात
    हमेशा की तरह शानदार
    सादर नमन...

    जवाब देंहटाएं
  3. वाह!बेहतरीन प्रस्तुति ।

    जवाब देंहटाएं
  4. हाँ तुम रहो
    किसी डाल पर बसंत के जैसे
    खिलो इसी ऋतु में
    इस युग का ऋण चुकाने के लिए...
    इस पंक्ति ने वस्तुतः मन को छू लिया है। यथार्थ में हमे अपने सामाजिक कर्ज का बोध ही नहीं होता और कर्म की खिल्ली तो हम अक्सर उड़ाते ही रहते हैं ।
    - आँखें खोलती इस प्रस्तुति के लिए साधुवाद ।

    जवाब देंहटाएं
  5. प्रकृति समझा रही है
    वक़्त है प्रायश्चित कर लो
    प्रवृति बदल लो
    निवृति के पहले
    शानदार प्रस्तुति उम्दा लिंको से सजी...।

    जवाब देंहटाएं
  6. हाँ तुम रहो
    किसी डाल पर बसंत के जैसे
    खिलो इसी ऋतु में
    इस युग का ऋण चुकाने के लिए
    करो सारे जतन
    सबसे प्रेम करने के लिए
    बनो परमात्मा
    संत कबीर
    बहुत सुंदर अंक आदरणीय दीदी | खेद है कल प्रतिक्रिया नहीं दे पायी | जब तक सब रचनाएँ पढ़ ना लूं लिख नहीं पाती | आपका संकलन हमेशा विशेष रहता है | इस बार भी बेमिसाल | सादर प्रणाम और आभार |

    जवाब देंहटाएं

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