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मंगलवार, 1 अक्तूबर 2019

1537 ....लिखे लिखाये में सूरत दिखनी भी नहीं है

सादर अभिवादन
आ गया अक्टूबर
काफी दिनों से प्रतीक्षा थी
आओ अक्टूबर आओ
सितम्बर पहाड़ तोड़ने में
असफल रहा...
अब आपकी बारी है..गर
आप भी असफल रहे तो ..ये
फावड़ा नवम्बर का पकड़ा देना..
...हो गई काफी बक-बक
...चलिए रचनाएँ देखें..

नियति-नटी के अभिनय से
क्योंकर हम-तुम विस्मित हों,
कुछ पल तो संग चले, 
बस यही सोच-सोच हर्षित हों !
कोई भी अनुबंध ना हो, पर
पल-पल कौल निभाऊँ !
कहो ना, कौन से सुर में गाऊँ ?


दक्षिणा ...
असफल होने के बावजूद बेटे से अपनी दक्षिणा मांग आयी
तुम्हारे ,धन दौलत सोने चांदी ,मकान से सरोकार नहीं मुझे
बस तू नेक इंसान बन कर जी ले अपनी जिंदगी
इंसानियत रग रग में हो,उससे अपना पेमेंट माँग आयी।


कुछ भूल हुई तुम से भी ना बापू !?
उसी से तो है दुनिया आज बेक़ाबू
पाठ पढ़ाया तीनों को पर ...
तीनों के तीनों ही बन्दर
भला भूल गया क्यों तुमसा ज्ञानी
हर सृजन के लिए है "मादा" जरुरी
बापू ! एक भी तो बन्दरिया ली होती


हर पुरानी चीज़ से अनुबन्ध है
पर घड़ी से ख़ास ही सम्बन्ध है
रूई के तकिये, रज़ाई, चादरें    
खेस है जिसमें के माँ की गन्ध है
ताम्बे के बर्तन, कलेंडर, फोटुएँ
जंग लगी छर्रों की इक बन्दूक है

सर्वभाव क्षणिकाएं ...

क्रोध क्या है? एक सुलगती अगन है,
आग विनाश का प्रति रुप जब धरती है,
जलाती आसपास और स्व का अस्तित्व है,
क्रोध अपने से जुड़े सभी का दहन करता है।

हो गया आज को काम
कल मनाएँगे बापू का जनमदिन
इससे पहले आज का विषय
इक्यानबेवाँ विषय

पर्दा / पर्दे / परदा / चिलमन /
उदाहरण..

पूरा 
कर लें मनभेद 
इस से
अच्छा माहौल

आगे
होना भी नहीं है

झूठ सारे
लिपटे हुऐ हैं
परतों में

पर्दे में
नहाने की

जरूरत
भी नहीं है

बन्द
रखनी हैं
बस आँखें

रचनाकार....डॉ. सुशील जी जोशी

आज्ञा दें और ये गीत सुनें


20 टिप्‍पणियां:

  1. आज वृद्ध दिवस पर भी चिन्तन मंथन होना चाहिए, बड़ों का तिरस्कार अनेक घरों में होने लगा है। महानगरों में ही नहीं मीरजापुर जैसे छोटे शहर में,फिर वे कहाँ जाएँ...
    प्रस्तुति में एक हृदय को छूने वाली रचना है ,इस संदर्भ में..
    मैंने भी यहाँ के वृद्धाश्रम और समाजसेवियों का असली चेहरा देखा है..
    बारिश में भींगने के कारण पिछले चार-पांच दिनों से गंभीर रूप से अस्वस्थ हूँ। स्थिति यह है कि बिस्तरे पर से कुर्सी पर बैठने की क्षमता भी नहीं रही। अतः होटल के अपने कमरे में एकांत चिंतन कर रहा हूँ । भविष्य में वृद्धाश्रम में शरण लेने की जब भी इच्छा होती है, तो एक पत्रकार के रुप में निरीक्षण के दौरान यहाँ की स्थिति को देखकर हृदय कंतित हो जाता है। ऐसे निस्सहाय स्त्री- पुरुष किस तरह से मूलभूत सुविधाओं से वंचित यहाँ जीवन गुजार रहे हैं। हाँ, किसी विशेष अवसर पर समाज सेवक यहाँ अवश्य पहुंच जाते हैं , कुछ फल, मिठाई अथवा वस्त्र आदि लेकर , उद्देश्य उनका अपना फोटो समाचर पत्रों में प्रकाशित करना होता है। मिष्ठान को देख ये वृद्ध किस तरह से टुकुर- टुकुर ताकते है, आपने क्या कभी किसी वृद्धाश्रम में जा कर इसकी अनुभूति की है ? किसी की वेदनाओं को समझने के लिये हमें उसका साक्षात्कार करना होगा। उक्ति है न-
    " जाके पांव न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई ।"
    कभी-कभी मुझे तो लगता है कि अपने शहर के संकटमोचन मंदिर के बाहर बैठे भिक्षुक की पंक्ति में सम्मिलित हो जाना, इस तरह के वृद्धाश्रम से बेहतर होगा । कम से कम उन्हें सुबह से ही चाय ,समोसा ,ब्रेड और भी कुछ ना कुछ भक्तगण देते ही रहते हैं। ठंड में कंबल इन्हें इतना पर्याप्त मिलता है कि वह उसे बेच भी देते हैं।
    बात मान,सम्मान एवं स्वाभिमान की रही , तो वह इन वृद्धों के लिये दोनों ही स्थान पर नहीं है।
    वृद्धाश्रम में वे बंधक जैसे अवश्य है।

    हमेशा की तरह दी आपकी प्रस्तुति श्रेष्ठ होती है। प्रणाम।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. कटु सत्य से परिचित कराती आपके विचार ।
      पढ़ कर इस पीड़ा को भोगना मुश्किल है ,तो जो सहते होंगे ,उनकी व्यथा का अंदाज लगाना भी मुश्किल

      हटाएं
    2. शीघ्र स्वास्थलाभ करें। कोशिश करें गिलोय की एक गोली (हिमालया की गुडुचि) रोज लेने की।

      हटाएं
    3. कर्मभोग ही बड़े भैया
      जब भी लगता हूँ ,अब संभल जाऊँगा
      फिसल के पुनः वहीं आ जाता हूँ।
      आप ने जो दवा बतायी है, वह मंगा लेता हूँ।
      प्रणाम।

      हटाएं
  2. व्वाहहहह..
    बेहतरीन..
    सादर...

    जवाब देंहटाएं
  3. सस्नेहाशीष संग असीम शुभकामनाएं छोटी बहना
    आपकी भूमिका लेखन बहुत प्यारी रहती है
    लाजबाब प्रस्तुतीकरण

    जवाब देंहटाएं
  4. सुंदर और पठनीय रचनाओं के सूत्रों से सजी आज की प्रस्तुति बहुत अच्छी लगी दी।
    नया विषय रोचक है उम्मीद है एक से बढ़कर रचनाएँ पढ़ने को मिलेगी।

    जवाब देंहटाएं
  5. सादर आभार ,
    मेरी रचना को स्थान देने के।लिए

    जवाब देंहटाएं
  6. पर्दा है पर्दा ...
    लाजवाब गीत के साथ सुन्दर रचनाओं का संकलन ...
    आभार मेरी रचना को शामिल करने के लिए ...

    जवाब देंहटाएं
  7. हल्की फुलकी भूमिका के साथ अक्टूबर का पहला अंक और पिछले अंक की छाया के रूप में सुरीला अमर गीत | दूसरा गीत भी बेहतर | सभी सराहनीय सूत्र | शशि भाई की मार्मिक टिप्पणी से वृद्ध दिवस के बारे में ज्ञात हुआ और शब्द चित्र में उकेरी वृद्धावस्था की असहायता की कल्पना कर मन बहुत विकल हो गया | बढती भौतिकता और घटती संवेदनाओं के बीच वृद्धजनों की उपेक्षा एक सामाजिक विकार के रूप में फ़ैल रहा है | श्रवण के देश में वृद्ध-आश्रमों की बढती संख्या बहुत बड़ा दुर्भाग्य है| सभी याद रखना होता कि हरेक को इस दशा से गुजरना है | एक शायर का शेर याद आ गया --



    दुनिया भी अजीब साराये फानी देखी,

    हर चीज यहाँ की आनी जानी देखी,

    जो आके न जाये वो बुढ़ापा देखा,

    ओर जा के न आये वो . जवानी देखी!!

    खैर , मेरी एक रचना उन बुजुर्गो के नाम जो अपने घर आँगन में सघन छांह भरे बरगद के समान है | जो उनकी कद्र जानते हैं उन्ही के मन के भाव ----

    बाबा की आखों से झांक रही
    स्नेह की छांव सुहानीहै
    मेरे लिए सुधारस पावन
    नयन कोर से छलका पानी है !!

    नित मेरी राह निहारा करते
    धुंधले तरल नयन गदगद से ,
    घर की दीवार को थामे बैठे -
    बाबा छाँह भरे बूढ़े बरगद से ;
    खुले है द्वार मन और घर के-
    हर ताला बेमानी है !

    शुक्र है बदौलत बूढ़े बाबा की
    आबाद आंगन -मेरे घर का -
    लरजते हाथ दुआओं वाले -
    घना साया मेरे सर का -
    उनसे ही गाँव बसा मेरा -
    अपनेपन की निशानी है

    नाज़ करे , न करें गिला

    बैठे लिए भीतर बचपन मेरा
    प्यार भरे दो बोल के भूखे
    भूला देते हर अवगुण मेरा
    मन भीतर लहराती
    यादों की फसलें धानी है!!

    सार्थक , भावपूर्ण अंक के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय दीदी । 🙏🙏



    जवाब देंहटाएं
  8. पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं ! माँ का आशीर्वाद सभी पर बना रहे

    जवाब देंहटाएं
  9. बहुत अच्छी प्रस्तुति भुमिका मोहक ,सभी सूत्र बहुत लुभावने है । मेरी रचना को शामिल करने के लिए हृदय तल से आभार।
    शशि भाई का लिखा हृदय वेदना से भर गया, न जाने जिस देश में दुश्मन भी अगर मेहमान बनकर आते तो उसे सत्कार मिलता है, उस देश में बुजुर्गो की ऐसी अवस्था पढ़ मन ग्लानि से भर गया ।
    सामाजिक संस्थाओं का भरोसा छोड़ स्वयं जूड़ना चाहिए हर उस व्यक्ति को जिसमें थोड़ी भी संवेदना बची हो ।
    सभी रचनाकारों को बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  10. बेहतरीन रचना संकलन एवं प्रस्तुति सभी रचनाएं उत्तम रचनाकारों को हार्दिक बधाई

    जवाब देंहटाएं
  11. बहुत ही सुंदर प्रस्तुति।

    जवाब देंहटाएं
  12. बहुत सुन्दर प्रस्तुति
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  13. मेरी रचना को मंच पर स्थान देने हेतु बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीया यशोदा दीदी।

    जवाब देंहटाएं
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