सादर अभिवादन
आ गया अक्टूबर
काफी दिनों से प्रतीक्षा थी
आओ अक्टूबर आओ
सितम्बर पहाड़ तोड़ने में
असफल रहा...
अब आपकी बारी है..गर
आप भी असफल रहे तो ..ये
फावड़ा नवम्बर का पकड़ा देना..
...हो गई काफी बक-बक
...चलिए रचनाएँ देखें..
आ गया अक्टूबर
काफी दिनों से प्रतीक्षा थी
आओ अक्टूबर आओ
सितम्बर पहाड़ तोड़ने में
असफल रहा...
अब आपकी बारी है..गर
आप भी असफल रहे तो ..ये
फावड़ा नवम्बर का पकड़ा देना..
...हो गई काफी बक-बक
...चलिए रचनाएँ देखें..
नियति-नटी के अभिनय से
क्योंकर हम-तुम विस्मित हों,
कुछ पल तो संग चले,
बस यही सोच-सोच हर्षित हों !
कोई भी अनुबंध ना हो, पर
पल-पल कौल निभाऊँ !
कहो ना, कौन से सुर में गाऊँ ?
तुम्हारे ,धन दौलत सोने चांदी ,मकान से सरोकार नहीं मुझे
बस तू नेक इंसान बन कर जी ले अपनी जिंदगी
इंसानियत रग रग में हो,उससे अपना पेमेंट माँग आयी।
कुछ भूल हुई तुम से भी ना बापू !?
उसी से तो है दुनिया आज बेक़ाबू
पाठ पढ़ाया तीनों को पर ...
तीनों के तीनों ही बन्दर
भला भूल गया क्यों तुमसा ज्ञानी
हर सृजन के लिए है "मादा" जरुरी
बापू ! एक भी तो बन्दरिया ली होती
हर पुरानी चीज़ से अनुबन्ध है
पर घड़ी से ख़ास ही सम्बन्ध है
रूई के तकिये, रज़ाई, चादरें
खेस है जिसमें के माँ की गन्ध है
ताम्बे के बर्तन, कलेंडर, फोटुएँ
जंग लगी छर्रों की इक बन्दूक है
सर्वभाव क्षणिकाएं ...

क्रोध क्या है? एक सुलगती अगन है,
आग विनाश का प्रति रुप जब धरती है,
जलाती आसपास और स्व का अस्तित्व है,
क्रोध अपने से जुड़े सभी का दहन करता है।
हो गया आज को काम
कल मनाएँगे बापू का जनमदिन
इससे पहले आज का विषय
इक्यानबेवाँ विषय
पर्दा / पर्दे / परदा / चिलमन /
उदाहरण..
पूरा
कर लें मनभेद
इस से
अच्छा माहौल
आगे
होना भी नहीं है
झूठ सारे
लिपटे हुऐ हैं
परतों में
पर्दे में
नहाने की
जरूरत
भी नहीं है
बन्द
रखनी हैं
बस आँखें
रचनाकार....डॉ. सुशील जी जोशी
आज्ञा दें और ये गीत सुनें
सर्वभाव क्षणिकाएं ...

क्रोध क्या है? एक सुलगती अगन है,
आग विनाश का प्रति रुप जब धरती है,
जलाती आसपास और स्व का अस्तित्व है,
क्रोध अपने से जुड़े सभी का दहन करता है।
हो गया आज को काम
कल मनाएँगे बापू का जनमदिन
इससे पहले आज का विषय
इक्यानबेवाँ विषय
पर्दा / पर्दे / परदा / चिलमन /
उदाहरण..
पूरा
कर लें मनभेद
इस से
अच्छा माहौल
आगे
होना भी नहीं है
झूठ सारे
लिपटे हुऐ हैं
परतों में
पर्दे में
नहाने की
जरूरत
भी नहीं है
बन्द
रखनी हैं
बस आँखें
रचनाकार....डॉ. सुशील जी जोशी
आज्ञा दें और ये गीत सुनें


