पाँच लिंकों का आनन्द

पाँच लिंकों का आनन्द

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सोमवार, 2 मई 2016

290.....तुम्हारी इक इक ख्वाहिश पर जीने को दिल चाहता रहा सदा

सादर अभिवादन...
कल मज़दूर दिवस भी गुज़र गया
मज़दूरी...कौन करता है
एक कामगार अपने पेट के लिए
कहीं भी..किसी के यहां भी 
और कुछ भी काम करके
पैसे लेता है और अपने परिवार का 
भरण-पोषण करता है
कुछ मज़दूर ऐसे भी होते हैं
जो किसी काम के न करने के पैसे लेते हैं...


अब सिमटते है उजाले थाम कर आँचल  आज
फिर सुबह आती नई खुशियाँ लिये दामन आज

देख तेरे नैन हम उसमे समा कर रह गये
बाँध कर तुमने हमें क्यों कर रखा साजन आज

नीर भरी रहती थी नदिया, 
लेकिन अब खुद प्यासी है। 
देख कंठ प्यासे लोगों के,
मन में बड़ी उदासी है।

विजुअल पत्रकारों के भेष में छुपे 
राजदीप ,रवीश जैसे दलाल 
खुद को एक समय सत्ता और देश की 
धारा मोड़ने वाला "टर्नर" समझते थे !


सरोकार नामा में....दयानन्द पाण्डेय
यह दल्ले पत्रकार  किस मुंह से प्रेस क्लबों में समारोहपूर्वक मज़दूर दिवस की हुंकार भरते हैं , मुख्यमंत्री या किसी मंत्री की कोर्निश बजा कर ? जिन अख़बारों या चैनलों में मनरेगा से भी कम मज़दूरी मिलती हो , मणिसाना , मजीठिया या किसी भी वेतन सिफारिश की धज्जियां उड़ती हों , वह लोग किस मुंह से मज़दूर दिवस की बात करते हैं ? यह मज़दूर दिवस जब रहा होगा , तब रहा होगा , मज़दूरों की अस्मिता ! आज तो यह सरासर धोखा है मज़दूरों के साथ ।  तो जाइए , चले जाइए , मैं नहीं देता इस धोखे में सने मज़दूर दिवस की बधाई।  आप बुरा मानते हैं तो मान जाइए , अपनी बला से !


प्यार में....रेवा टिबड़ेवाल
कर लो चाहे
जितनी बड़ी बड़ी
बातें.......
लिख लो चाहे
जो मन को अच्छा लगे ,



आज की शीर्षक रचना....
आँखों में नमी है भी तो क्या ...
होठ मुस्कुरा उठे ..
तुम्हारी इक इक ख्वाहिश पर जीने को दिल चाहता रहा सदा
शब्द ही नहीं मिले ...कभी इक मुस्कुराहट उभरती रही


आज्ञा दें यशोदा को
फिर मिलते हैं





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