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शनिवार, 4 अक्टूबर 2025

4530 ,,हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के दिग्गज पंडित छन्नूलाल मिश्र का 91 वर्ष की आयु में निधन

 सादर अभिवादन

शनिवार, 19 अप्रैल 2025

4463,4464,4465, शनिवार, रविवार और सोमवार

 क्षमा, क्षमा
सब मुझे अनुपस्थिति की सूचना देते है, हम सूचना देने लायक भी नही रहे
वायरल बुखार इतना भयंकर होता है
इन छः दिनों मे पता चला, कृपया झेल लें
पुनः क्षमा

शनिवार, 23 नवंबर 2024

4316 ..इस अंक में दो टके का दो टूक

शनिवार, 13 जुलाई 2024

4185 ...वह महिला निर्भर नहीं किसी पुरुष पर

 सादर अभिवादन



बंधु, उस सावन सी
बात नहीं है
दिव्य रुचिर हैं
ये नन्हीं बूँदें,
हरियाली भी
आज नवल है
लेकिन बंधु
इस मौसम में,
उस मौसम सी
कोई बात नहीं है

चलें रचनाओं की ओर



सिखला दो ना जरा
'रिसायकल बिन' भरना भी कभी,
ताकी कर सकूँ दफ़न
तुम्हारी बीती रूमानी बातों को।

सिखला दो ना जरा
'एम्प्टी' करना भी कभी
'रिसायकल बिन', मिटा दे जो
तुम्हारे अर्थहीन वादों को।





इलाहाबाद में निरंजन चौराहे पर
एक ट्रैफिक कांस्टेबल हुआ करता था। 
उसकी खासियत यह थी कि
वो चौराहे पर एक साथ
सारी तरफ के ट्रैफिक को
रोक देता था
फिर थोड़ी देर बाद
एक साथ सबको छोड़ देता था।


मूलाधार


चार पंखुड़ी का कमल,रंग चक्र का लाल।
साधे मूलाधार को,ऊँचा होगा भाल।।
स्वाधिष्ठान
श्रोणि क्षेत्र के चक्र को,कहते स्वाधिष्ठान।
रंग संतरी सूर्य का, करता ऊर्जावान।।





सुबह उस समय अंधेरा ही था, जब वे टहलने गये; आकाश में बादल थे।छह बजे के समाचार सुने और फिर विविधभारती पर भजन। बचपन से घर में सुबह इसी तरह रेडियो के साथ होती थी। नाश्ते में किनोवा की उपमा बनायी, उसे पता ही नहीं था कि बथुआ के बीज को किनोवा कहते हैं, इससे होने वाले अनेक फ़ायदों के बारे में अवश्य सुना था।





वह महिला निर्भर नहीं
किसी पुरुष पर,
उसे नहीं चाहिए
किसी की मंज़ूरी,
नहीं चाहिए
किसी का सहारा,
किसी का समर्थन.




हवा नहीं है, जीव नहीं है
मानवता की नींव नहीं है
रूखा-सूखा, धूल सना सा
किसी काम का कुछ भी नहीं है
रूप-नूर सब झूठी बातें
ख़ुद का प्रकाश भी पास नहीं
सदियों से जिसे जग ने पूजा
उसको है इंकार मेरा




कमाओ कीर्ति
कमाओ कुमुदिनी कर कमल
करें कोटिजन करतल कलरव
करें किरीटाभिषेक !  


बस
कल फिर
सादर वंदन

शनिवार, 6 जुलाई 2024

4178 ...मेधा पैसों से नहीं खरीदी जा सकती

 सादर अभिवादन

6 जुलाई , 2024

कह रहा है आसमां
यह समा कुछ भी नहीं।
रो रही हैं शबनमे,
नौरंगे जहाँ कुछ भी नहीं।
जिनके महलों में
हजारों रंग के जलते थे फानूस।
झाड़ उनके कब्र पर,
बाकी निशां कुछ भी नहीं।

रचनाएँ कुछ मिली जुली ....



क्यों सोचता है इंसान ऐसा ?
जो न ग़म, ख़ुशी में समझे फर्क
और एग्जिट की ही सोचे हर वक़्त
क्यों उस किनारे की तलाश करे
जो समंदर के उस पार सी हो
दिखाई न दे क्षितिज हीन दिशाहीन !!





नासूर बनते इस घाव का उपचार बहुत सोच-समझ कर, बड़ी सूझ-बूझ और सतर्कता से तुरंत करना बेहद जरुरी है नहीं तो जाति, धर्म, आरक्षण के कारण बंटते देश-समाज की सिरदर्दी बढ़ाने के लिए एक और जमात सदा के लिए आ खड़ी होगी ! जिसके मुंह में मुफ्तखोरी का खून लग चुका होगा ! आज देश की हालत और समय का तकाजा है कि मुफ्त में मछली देने के बजाय मछली पकड़ना सिखाया जाए, ताकि अपने पैरों पर खड़ा हुआ जा सके ! आबादी के परमाणु बम पर बैठे देश को मुफ्तखोरों, परजीवियों की नहीं कर्म-वीरों की जरूरत है !


जीवन का यह कलश  रीतता


कितना रस्ता चल कर आया
फिर भी कहीं नहीं पहुँचा है,
जाने कब यह राज खुलेगा
मंज़िल पर ही सदा खड़ा है !

एक सुकून उतरता भीतर
मधुर परस जब उसका मिलता,
जिसका पता खोजते ही तो
जीवन का यह कलश रीतता !





"बिल्कुल नहीं मैं सारा समय अपने बच्चों को ही दूँँगी ताकि कल वह तुम्हारे बच्चे के जगह पर खड़ा हो और तुम्हारी जगह पर मैं।"  

मोहिनी की बात सुनकर राशि ने मन में सोचा - ओह तो ये पढ़े लिखे भी लोग इतनी गिरी सोच रखते है। मेधा पैसों से नहीं खरीदी जा सकती।




इस अवसर के उस अक्सर को
मोह दिया सब त्याग
मणि कर्णिका के घाटों का
अब पानी कौन उतारे

उतराता मैं इतराता
जानू ज्ञान गंगा के घाट
बसी अजोध्या जी जू में
राह बिसूरे राम के ठाठ
मुझसे मेरा ब्रम्ह भ्रमण
नयना क्यों दुखियारे





बाद में वह लड़का जब-तब मांस लाता और गांधीजी उसे खाते। उन्हें अब स्वाद आने लगा था।  पर बाद में उन्होंने मांस खाना छोड़ दिया। इसलिए नहीं कि वे इसे खराब मानते थे, बल्कि इसलिए कि इसके लिए उन्हें अपने धर्मपरायण  मां-बाप से झूठ बोलना पड़ता था। एक तो उनका वैष्णव परिवार था उसपर से गांधी जी पर जैन प्रभाव था। मांस खाना तो उनके लिए अत्यंत ही घृणित काम था। उन्हें यह महसूस हुआ कि मांस खाने से भी ज़्यादा बुरा वे माता-पिता से चुरा कर खाने का काम कर रहे हैं। उन्होंने मांस खाना छोड़ दिया। उनका मांसाहार हमेशा के लिए छूट गया। माता-पिता यह कभी नहीं जान पाए कि उनका बेटा मांसाहार कर चुका है।





मैं पहली पंक्ति लिखता हूँ
और डर जाता हूँ राजा के सिपाहियों से
पंक्ति काट देता हूँ

मैं दूसरी पंक्ति लिखता हूँ
और डर जाता हूँ बाग़ी गुरिल्लों से
पंक्ति काट देता हूँ
(यह रचना कविता कोश से ली है)


बाहर बारिश हो रही है
मात्र यह चित्र राहत देता है


******
आज बस
कल
सादर वंदन
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