सादर अभिवादन
अनर्थ भी हल हो गया
एक कसाई की वधशाला से छूट कर गाय भाग गई। कसाई पकड़ने के लिए पीछे-पीछे दौड़ा। गाय एक सन्त आश्रम के पीछे घनी झाड़ियों में घास चर रही थी और कसाई की आँखों से ओझल थी।
कसाई ने सन्त से पूछा-”इधर से गाय निकली है क्या? आपने उसे देखा है क्या?” सन्त सोचने लगे सच बोलने से गाय के प्राण जायेगा। इसलिए परिणाम को देखते हुए शब्द छल करने में कोई हर्ज नहीं।
बार-बार पूछने पर उनने उत्तर दिया-”जिसने देखा है बोलता नहीं, जो बोलता है उसने देखा नहीं।” कसाई इस ब्रह्मज्ञान की भाषा का अर्थ न समझ सका और आगे चला गया। ऋषि पत्नी ने इस रहस्य वचन का कारण पूछा तो उनने कहा-”गाय का प्राण बचाने के लिए शब्द छल किया गया। सो जो कहा गया वह असल भी नहीं था। नेत्रों ने गाय देखी थी। वे बोलते नहीं। जीभ बोलती है वह देखती नहीं। इस प्रकार सत्य वचन की चिन्ह पूजा भी हो गई और नग्न सत्य के कारण होने वाला अनर्थ भी हल हो गया।”
और भी है... वो भी आएगा पर शैनेः शैनेः
रिमझिम रिमझिम बरखा आई
सावन में शिव वंदन करते ।
भोले कष्ट सभी के हरते ।।
बिल्वपत्र घृत दूध चढ़ाते ।
दान भक्ति से पुण्य कमाते ।।
काँवड़ ले काँवड़िये जाते ।
गंंगाजल सावन में लाते ।।
बम बम भोले का जयकारा ।
अंतस में करता उजियारा ।।
सावन में शिव वंदन करते ।
भोले कष्ट सभी के हरते ।।
बिल्वपत्र घृत दूध चढ़ाते ।
दान भक्ति से पुण्य कमाते ।।
काँवड़ ले काँवड़िये जाते ।
गंंगाजल सावन में लाते ।।
बम बम भोले का जयकारा ।
अंतस में करता उजियारा ।।
तुम जग के हो पालक भोला,
तिरछी तेरी चाल है।
जटे में तेरे गंगा शोभे,
चंदा तेरे भाल है।
ललाट शोभे रोली -चंदन,
भभूत तेरे गाल है।
आया है सावन ,
है मनभावन,
बहने लगी बयार।
बूँदों से सजती,
न्यारी धरती,
टिपटिप की है धार।।
सबको वर्षा जल संचयन करना है
अपशिष्ट जल का प्रबंधन करना है
जल पुनर्भरण उपाय अपनाकर
जल संरक्षण को बढ़ावा देना है
जल जीवन मिशन आज और कल
उद्देश्य इसका सुरक्षित नियमित पेयजल
हर गांव पहुंचे हर घर नल से जल
हर घर नल से जल
हे राम!
तुम उस रोज मेरे देश आए थे बुद्ध
तब तुम्हारे भेस में अचानक ही
मैंने मोहम्मद को देख लिया था
ये उसी दिन की बात है
जब मैं जामा मस्जिद की उन ऊंची-ऊंची सीढ़ियों पर
चढ़ते-चढ़ते ठिठक गया था एकाएक
मेरे पासवर्ड में न लय है,
न कोई मीटर,
मैं तो यह भी नहीं जानता
कि उसकी भाषा क्या है,
भाषा है भी या नहीं।
सुरंगों से हो कर गुज़रती है रात, सीने
में फड़फड़ाते हैं इतिहास के पृष्ठ,
अंधेरे उजाले के मध्य खो से
जाते हैं कहीं उम्मीद भरे
स्वाधीन पहर, बहुत
कुछ चाहा था
हमने अग्नि
शपथ
लेने
से पहले, मशाल की लौ में उभरते हैं
शैल चित्र, धूसर शून्यता घेरे हुए,
**
आज बस
सादर वंदन



