सादर अभिवादन
बंधु, उस सावन सी
बात नहीं है
दिव्य रुचिर हैं
ये नन्हीं बूँदें,
हरियाली भी
आज नवल है
लेकिन बंधु
इस मौसम में,
उस मौसम सी
कोई बात नहीं है
चलें रचनाओं की ओर
सिखला दो ना जरा
'रिसायकल बिन' भरना भी कभी,
ताकी कर सकूँ दफ़न
तुम्हारी बीती रूमानी बातों को।
सिखला दो ना जरा
'एम्प्टी' करना भी कभी
'रिसायकल बिन', मिटा दे जो
तुम्हारे अर्थहीन वादों को।
इलाहाबाद में निरंजन चौराहे पर
एक ट्रैफिक कांस्टेबल हुआ करता था।
उसकी खासियत यह थी कि
वो चौराहे पर एक साथ
सारी तरफ के ट्रैफिक को
रोक देता था
फिर थोड़ी देर बाद
एक साथ सबको छोड़ देता था।
मूलाधार
चार पंखुड़ी का कमल,रंग चक्र का लाल।
साधे मूलाधार को,ऊँचा होगा भाल।।
स्वाधिष्ठान
श्रोणि क्षेत्र के चक्र को,कहते स्वाधिष्ठान।
रंग संतरी सूर्य का, करता ऊर्जावान।।
सुबह उस समय अंधेरा ही था, जब वे टहलने गये; आकाश में बादल थे।छह बजे के समाचार सुने और फिर विविधभारती पर भजन। बचपन से घर में सुबह इसी तरह रेडियो के साथ होती थी। नाश्ते में किनोवा की उपमा बनायी, उसे पता ही नहीं था कि बथुआ के बीज को किनोवा कहते हैं, इससे होने वाले अनेक फ़ायदों के बारे में अवश्य सुना था।
वह महिला निर्भर नहीं
किसी पुरुष पर,
उसे नहीं चाहिए
किसी की मंज़ूरी,
नहीं चाहिए
किसी का सहारा,
किसी का समर्थन.
हवा नहीं है, जीव नहीं है
मानवता की नींव नहीं है
रूखा-सूखा, धूल सना सा
किसी काम का कुछ भी नहीं है
रूप-नूर सब झूठी बातें
ख़ुद का प्रकाश भी पास नहीं
सदियों से जिसे जग ने पूजा
उसको है इंकार मेरा
बस
कल फिर
सादर वंदन







