पाँच लिंकों का आनन्द

पाँच लिंकों का आनन्द

आनन्द के साथ-साथ उत्साह भी है...अब आप के और हमारे सहयोग से प्रतिदिन सज रही है पांच लिंकों का आनन्द की हलचल..... पांच रचनाओं के चयन के लिये आप सब की नयी पुरानी श्रेष्ठ रचनाएं आमंत्रित हैं। आप चाहें तो आप अन्य किसी रचनाकार की श्रेष्ठ रचना की जानकारी भी हमे दे सकते हैं। अन्य रचनाकारों से भी हमारा निवेदन है कि आप भी यहां चर्चाकार बनकर सब को आनंदित करें.... इस के लिये आप केवल इस ब्लॉग पर दिये संपर्क प्रारूप का प्रयोग करें। इस आशा के साथ। हम सब संस्थापक पांच लिंकों का आनंद। धन्यवाद एक और निवेदन आप सभी से आदरपूर्वक अनुरोध है कि 'पांच लिंकों का आनंद' के अगले विशेषांक हेतु अपनी अथवा अपने पसंद के किसी भी रचनाकार की रचनाओं का लिंक हमें आगामी रविवार तक प्रेषित करें। आप हमें ई -मेल इस पते पर करें dhruvsinghvns@gmail.com तो आइये एक कारवां बनायें। एक मंच,सशक्त मंच ! सादर

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गुरुवार, 8 जून 2017

692....काश तुम कुछ समझ पाते....

सादर अभिवादन!
रिफ़ाइंड और यूरिया से बने दूध की चर्चा  पुरानी बात  हो गयी
अब तो प्लास्टिक के चावल और प्लास्टिक के अंडे चर्चा में हैं।
हमारे स्वास्थ्य के साथ ऐसा अक्षम्य अपराध.......
खाने -पीने  की चीज़ों का चुनाव अब संभलकर कीजिये।
आज का अंक लेकर हाज़िर हूँ.....प्रस्तुत हैं पाँच लिंक्स आपके 
विचारार्थ .....
मनोरंजन हेतु .... 
प्रतिक्रियाओं  हेतु......  


विगत् 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया गया। 
इस वर्ष लोगों का प्रकृति से जुड़ाव चर्चा का केंद्र बिंदु रखा गया है। अतः कमलेश माली जी की रचना व्यापक सन्देश लेकर उपस्थित हुई है 

धरा की आवाज   कमलेश माली


मेरा सीना चीर कर प्यास बुझाते हो,
मेरी बांहे काट कर घरोंदे बनाते हो,

क्या होता है वो दर्द
काश तुम कुछ समझ पाते |


धरती की पीड़ा को व्यक्त करती सुधा जी की रचना हमारे अंतःकरण को झकझोरती है -


थी मैं कभी नई दुल्हन - सी!
हो गयी आज जर्जर, गुमसुम - सी!
मेरी अंतिम साँस भी उखड़ रही है!
हालत प्रतिदिन बिगड़ रही है!

मुझको न तू इतना सता!
मुँह खोल और यह तो बता!
माता पुत्र का क्या  है नाता !
क्या ये तुझको नहीं पता !



तपिश का विकराल रूप सहन न कर पाया एक घोड़ा जयपुर में कार का अगला शीशा तोड़कर घुस गया। इंसानों के अलावा प्रकृति के अन्य अंग भी तपन से व्याकुल हो उठते हैं ... ऐसा ही सन्देश देती डॉक्टर मयंक जी की सुन्दर रचना - 



सूरज आग उगलता जाता।
नभ में घन का पता न पाता।१।

जन-जीवन है अकुलाया सा,
कोमल पौधा मुर्झाया सा,

सूखा सम्बन्धों का नाता।

नभ में घन का पता न पाता।



माँ की अनमोल  सीख का प्रतिपादन करती 
अर्चना जी की एक  सारगर्भित रचना -
हाँ तुमने सच ही कहा था माँ
लेकिन मैं ही था नादान 

शायद मैं ही था अंजान

इस दुनिया के इंसानों से

मुखोटे पहने हुए हैवानो से




वंचित वर्ग की सामाजिक दशा और मनोभावों का बखूबी चित्रण करती  धर्मेंद्र राजमंगल जी की एक मार्मिक कहानी - 
उन्होंने विरजपाल से पैसे लेकर सुंदरी को दे दियासुंदरी तब काफी 
छोटी थी और विरजपाल पूरा आदमीबचपन में माँ बाप का घर छोड़ना 
और विरजपाल की मार उसे पागल बना गयीआज सुंदरी को घर जाने की 
ख़ुशी थी लेकिन वह ये  समझ पा रही थी कि घर जाकर क्या होगा
कहीं दोबारा बेच दी गयी तोइस बात की उसको चिंता  थी|



अब आज्ञा दें रवीन्द्र को .....
आपके  स्नेहयुक्त  संदेशों की प्रतीक्षा में  सादर ...  

                                           




17 टिप्‍पणियां:

  1. शुभ प्रभात....
    वाह....बहुत अच्छी रचनाओं का चयन
    आभार.....सादर

    उत्तर देंहटाएं
  2. आदरणीय ,रवींद्र जी
    शुभप्रभात ,नये ढ़ंग से
    लिंकों का संयोजन ,सुन्दर व उद्देश्यपरक रचनाओं का चयन
    दिन-प्रतिदिन हमारे पाँच लिंकों का आनंद मंच को एक नया आयाम दे रहा है
    आपके इस सुन्दर व सार्थक प्रयास के लिए आपको बहुत-बहुत शुभकामनायें
    आभार। ''एकलव्य''

    उत्तर देंहटाएं
  3. वाह..
    बहुत खूब
    लगे रहिए
    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  4. शुभप्रभात....
    उत्तम....
    सादर।

    उत्तर देंहटाएं
  5. व्यापक संदेश के साथ बहुत सुंदर प्रस्तुति..

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत अच्छी हलचल प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  7. सक्रिय सहयोग एवं समर्थन के लिए पांच लिंकों का आनंद की ओर से सभी रचनाकारों एवं आदरणीय पाठकों का हार्दिक आभार.

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत अच्छा लग रहा है टिप्पणियों को देखकर । बढ़िया प्रस्तुति।

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. अब फब गया यह अंक । सर आपका आशीर्वाद और स्नेह इसी तरह हमें मिलता रहे।

      हटाएं
  9. मेरी कविता को सम्मिलित करने के लिए आभार |

    उत्तर देंहटाएं
  10. बहुत अच्छी रचनाएँ पेश की गयीं हैं। पांच लिंकों का आनंद का धन्यवाद और बधाई।

    उत्तर देंहटाएं

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