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शुक्रवार, 18 जून 2021

3063.... मैं प्रयास करती रहूँगी

शुक्रवारीय अंक में आप सभी का

स्नेहिल अभिवादन।

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हाथों से वक़्त के रही फिसलती ज़िंदगी।

मुट्ठियों से रेत बन निकलती ज़िंदगी।


लम्हों में टूट जाता है जीने का ये भरम,

हर मोड़ पे सबक लिए है मिलती ज़िंदगी।



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आइये आज की रचनाओं के संसार में चलते हैं-


कुछ ऐसी यादें होती हैं जिन्हें भुला पाना

आसान नहीं होता, चलते हैं क़दम आगत की राह और मन बिसूरता रह जाता है एहसास में विगत  के

सोच में तो 

समा जाता है सब कुछ 

रील सी ही 

चलती रहती है 

मन मस्तिष्क में ,

सब कुछ एक दूसरे से 

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जीवन हो या प्रकृति
विचार एवं व्यवहार का स्थायित्व
मन की संवेदनशीलता नहीं
परिस्थितिजन्य
 भूख की तृप्ति
 पर निर्भर है जिसके मूल में
निहित है अतृप्ति

तब से ही, अवधूत सुखी हैं, बुद्धिमान पीड़ित। मूर्ख परमानंद में हैं, ज्ञानी कुंठित। इच्छा, अभीप्सा और प्रत्याशा के आराधक अवसाद में हैं, जड़भरत के अनुयायी मगन।

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विपरीत परिस्थितियों से हार नहीं मानना,

सफ़र की दुरूहताओं का डटकर सामना करना, बहुत कुछ बदलने की क्षमता रखता है सकारात्मक परिवर्तन के लिए स्वयं से बार-बार कहना कि

मैं करती रहूँगी प्रयास

एक परोक्ष-सी लड़की की अट्टहास  
मेरे कानों में गूँजती है
और तभी अँधेरा छा जाता है,
उस घोर अंधकार से ' निराशा ' आती है,
मुझे देख मुस्कुराती है,
मेरा आलिंगन करती है
और सांत्वना देने का ढोंग करते हुए 

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जब भी करना हो  सीमित शब्दों में
गूढ़ और सारगर्भित धारदार , हर बंध बाँधकर करीने से क़लम शब्दहार कह जाती है गज़ल क़माल


दृष्टि लोगों की अजब धुंधली हुई इस दौर की
इसलिए सिक्के जो खोटे थे वही छाने लगे

राग दरबारी सुना करके सियासी मंच से
कुछ बड़े चालाक भत्ते और पद पाने लगे

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सुनने वाले अगर समझ भी जाते तो
आज समाज की तस्वीर कुछ और होती
बंधकर रहते सीमाओं में सुखी न होता फिर कोई अतिक्रमण
भौतिक लोलुप्सा में फँसकर, खत्म संस्कृति होती है
नित नव संयंत्रों से धरती, छलनी होकर रोती है
ऐसी कैसी नई सभ्यता,कैसा ये अधिकार सुनो ।
अन्यायों की लगी हुई है,लंबी बहुत कतार सुनो ।।


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और चलते-चलते पढ़िए 
एक संस्मरणात्मक कहानी जिसमें निहित
पवित्र संदेश और आह्वान का कुछ अंश भी अगर डगमाते आडंबर के तीन पायों पर टिके विकलांग समाज को छू भर जाए तो  अपने अलग दृष्टिकोण से दे पायेगा सुदृढ़ और संतुलित चौथा कंधा


वैसे तो अवनीश बचपन से अपने घर-परिवार में ये चलन देखते हुए आए हैं, कि अगर किसी बुआ जी, मौसी जी या किसी भी 'कजिन' दीदी लोगों के ससुराल में किसी ख़ास आयोजन के मौके पर आमन्त्रित करने के लिए या किसी अवसर पर शुभकामनाएं देने के लिए या फिर दुःख की घड़ी में शोक प्रकट करने के लिए उन लोगों के अलावा तदनुसार फूफा जी, मौसा जी या जीजा जी या फिर उनके मम्मी-पापा से बातें की जाती रहीं हैं। हो सकता है यह पुरुष-प्रधान समाज होने के कारण ऐसा होता हो। पर अवनीश करें भी तो क्या भला .. अवनि का मायका इस मामले में है ही कुछ अलग-सा। वैसे तो अवनीश को इन में भी सकारात्मकता नज़र आती है, कि यह पुरुष-प्रधान समाज को चुनौती देती हुई, किसी महिला-प्रधान समाज को गढ़ने की प्रक्रिया वाली शायद कोई चलन या जुगत हो।

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आज के लिए इतना ही
कल का विशेष अंक लेकर आ रही ह़ै
प्रिय विभा दी।









10 टिप्‍पणियां:

  1. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    जवाब देंहटाएं
  2. बेहतरीन अग्र पंक्तियां..
    सुंदर चयन..
    आभार..
    सादर..

    जवाब देंहटाएं
  3. जी ! नमन संग आभार आपका .. इस मंच पर आज अपनी अनूठी प्रस्तुति में मेरी बतकही वाली सोच/रचना को स्थान देने के लिए ...
    आज की हर प्रस्तुत अनमोल रचनाओं के पहले आपकी अलबेली टिप्पणियाँ चार नहीं आठ चाँद लगा रही हैं मानो ... और आज की भूमिका भी क्षणभंगुर जीवन का कटु सत्य है ... पुनः आभार आपका .. बस यूँ ही ...

    जवाब देंहटाएं
  4. ये ज़िन्दगी है साहब , यूँ ही खेल रचती है
    कभी खुल के हँसती है तो कभी मुट्ठी से फिसलती है ।😄😄😄😄

    आज की प्रस्तुति के सभी लिंक्स शानदार ....

    कहीं नेताओं से गुहार
    तो कहीं राजनीति पर वार
    कहीं ज़रूरत कि
    कंधे हों चार
    कोई अपने किये गए
    प्रयास पर दृढ़
    तो कोई अपनी सोचों में
    आगत विगत पर रहा है अड़ 😆😆😆😆😆 ।

    कुल मिला कर सभी रचनाएँ (मेरी छोड़ कर ) लाजवाब ।

    सस्नेह

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत अच्छी हलचल प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं
  6. बहुत सुंदर प्रस्तुति।

    जवाब देंहटाएं
  7. हाथों से वक़्त के रही फिसलती ज़िंदगी।
    मुट्ठियों से रेत बन निकलती ज़िंदगी।//
    लम्हों में टूट जाता है जीने का ये भरम,
    हर मोड़ पे सबक लिए है मिलती ज़िंदगी।////
    जैसी चिंतन परक पंक्तियों के साथ सून्दर प्रस्तुती प्रिय श्वेता | सभी रचनाएँ पढ़ी | अच्छा लगा | एक सार्थक कथा के साथ सभी काव्य रचनाओं ने मन को हार्दिक आनन्द की अनुभूति करवाई |सभी रचनाकारों को नमन और बधाई | तुम्हें हार्दिक शुभकामनाएं और प्यार भावपूर्ण चर्चा के लिए |

    जवाब देंहटाएं
  8. सुंदर शानदार रचनाओं से सुशोभित अंक के लिए आपका बहुत आभार एवं अभिनंदन श्वेता जी,आपके श्रमसाध्य कार्य के लिए आपको मेरा नमन।मेरी रचना को चयनित करने के लिए शुक्रिया..शुभकामनाओं सहित जिज्ञासा सिंह ।

    जवाब देंहटाएं

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