पाँच लिंकों का आनन्द

पाँच लिंकों का आनन्द

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मंगलवार, 20 सितंबर 2016

431...फिर एक बार देश ने आंतकी हमला झेला

जय मां हाटेशवरी...

कश्मीर के उरी सेक्टर में चरमपंथियों द्वारा किये गये हमले से...
मन आज बहुत आहत है...
अब तो अति हो गयी पाकिस्तान...

युद्ध-विराम की आड़ में किसी ने खुशहाली को मातम में बदल डाला  है,
सारे नियमों को ताक  पर रखकर पीठ में छुरा  घोंप  डाला है,
घाटी में पैदा कर दिया हैं चारों ओर  अशांति का हाल ,
बना दिया लोगों को शरणार्थी अपने ही देश में,किसकी  है ये चाल ?

पीपल का पत्ता-- हृदय रोग का रामवाण इलाज
 पीपल के वृक्ष की महानता का वर्णन करते हुये भारतीय वाग्मय के प्राण भगवान श्री कृष्ण ने जो कि याेगीराज भी कहलाते हैं ने गीता में कहा है कि मैं वृक्षों में अश्वत्थ का वृक्ष हूँ, अर्थात भारतीय आयुर्वेद के अनुसार संसार में एक प्रकार से कहा जाए तो पीपल प्रभु के समस्त गुणों का वाहक हैं।

ह्दय संबंधी समस्याअों या हार्ट अटैक आ जाने की स्थि‍ति में पीपल के पत्तों का काढ़ा बनाने के लिए
list of 4 items
1. सबसे पहले पीपल के 15 पत्ते तोड़ लें, जो हरे, आकार में बड़े और पूरी तरह से विकसित हो।
2. सभी पत्तों के ऊपर की चौंच व नीचे का डन्सल का भाग कैंची से काटकर अलग कर दें।
3. अब पत्तों को पानी से धो लें और लगभग एक गिलास पानी में धीमी आंच पर पकाएं।
4. जब यह पानी उबलकर एक-तिहाई रह जाए, तब उसे ठंडा करके छान लें, और फ्रीज या अन्य किसी ठंडे स्थान पर रख दें।

फिर एक बार
फिर एक बार देश ने आंतकी हमला झेला
फिर एक बार कई सैनिक शहीद हो गए
फिर एक बार परिबारों ने अपनोँ  को खोने का दंश झेला
फिर एक बार गृह , रक्षा मंत्री ने घटना स्थल का दौरा किया
फिर एक बार हाई लेवल मीटिंग की गयी
फिर एक बार
सभी दलों ने घटना की निंदा की

 मेरा हाल सोडियम-सा ’ [ लम्बी तेवरी, तेवर-शतक ] +रमेशराज
मेरा ‘पर’ जब-जब बाँधा  
आसमान को तका लेखनी । 6
मन के भीतर घाव हुआ  
मैं दर्दों से भरा लेखनी । 7
आदमखोरों से लड़ना
तुझको चाकू बना लेखनी । 8
शब्द-शब्द आग जैसा
कविता में जो रखा लेखनी । 9

धिक! धिक! जन-गण-मन नायक!
क्यों शर फिर सीना तान रहा?
क्यों सिमटा मेरा वितान रहा?
क्यों सहानुभूति उपजे मन में
जिन पर वर्षों अभिमान रहा?
छोड़ो दुख का जाप्य जयद
लेकर निषंग रण में उतरो,
जो विपदाएँ आएं पथ में
बन महादेव कण-कण कुतरो।

पतन - Hindi Kavita By Ram Lakhara Vipul
नव सृजनता को लिए चले थे,
नित नग्नता को पढ़ रहे
लगता नहीं क्या हड़प्पा और
जोदड़ों की ओर हम बढ़ रहे
आज बस इतना ही...

मुस्कुरा कर विदाई दे मुझको
वक़्ते-आखिर है , सोचता क्या है?
धन्यवाद।












4 टिप्‍पणियां:

  1. शुभ प्रभात भाई कुलदीप जी
    अच्छी रचनाओं से सराबोर आज की प्रस्तुति
    आभार
    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुप्रभात
    सादर प्रणाम
    बहुत सुन्दर हलचल प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति कुलदीप जी ।

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत सुन्दर हलचल प्रस्तुति हेतु धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं

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