पाँच लिंकों का आनन्द

पाँच लिंकों का आनन्द

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बुधवार, 6 अप्रैल 2016

264. दहक रही है ज़िन्दगी...

जय मां हाटेशवरी...

पांच लिंकों का आनंद पर आप का स्वागत है...
आज की प्रस्तुति का आरंभ...
फ़राज के चंद शेयरों से...
अब किस का जश्न मनाते हो उस देस का जो तक़्सीम हुआ
अब किस के गीत सुनाते हो उस तन-मन का जो दो-नीम हुआ
उस ख़्वाब का जो रेज़ा रेज़ा उन आँखों की तक़दीर हुआ
उस नाम का जो टुकड़ा टुकड़ा गलियों में बे-तौक़ीर हुआ
उस परचम का जिस की हुर्मत बाज़ारों में नीलाम हुई
उस मिट्टी का जिस की हुर्मत मन्सूब उदू के नाम हुई
उस जंग का जो तुम हार चुके उस रस्म का जो जारी भी नहीं
उस ज़ख़्म का जो सीने पे न था उस जान का जो वारी भी नहीं
उस ख़ून का जो बदक़िस्मत था राहों में बहाया तन में रहा
उस फूल का जो बेक़ीमत था आँगन में खिला या बन में रहा
उस मश्रिक़ का जिस को तुम ने नेज़े की अनी मर्हम समझा
उस मग़रिब का जिस को तुम ने जितना भी लूटा कम समझा
उन मासूमों का जिन के लहू से तुम ने फ़रोज़ाँ रातें कीं
या उन मज़लूमों का जिस से ख़ंज़र की ज़ुबाँ में बातें कीं
उस मरियम का जिस की इफ़्फ़त लुटती है भरे बाज़ारों में
उस ईसा का जो क़ातिल है और शामिल है ग़मख़्वारों में
इन नौहागरों का जिन ने हमें ख़ुद क़त्ल किया ख़ुद रोते हैं
ऐसे भी कहीं दमसाज़ हुए ऐसे जल्लाद भी होते हैं
उन भूखे नंगे ढाँचों का जो रक़्स सर-ए-बाज़ार करें
या उन ज़ालिम क़ज़्ज़ाक़ों का जो भेस बदल कर वार करें
या उन झूठे इक़रारों का जो आज तलक ऐफ़ा न हुए
या उन बेबस लाचारों का जो और भी दुख का निशाना हुए

अब देखिये आज के चयनित लिंक....



510. दहक रही है ज़िन्दगी...
डॉ. जेन्नी शबनम
ख़्वाब और फ़र्ज़ का भला मिलन यूँ होता कैसे
ज़मीं मयस्सर नहीं आस्मां माँग रही है ज़िन्दगी !
सब कहते उजाले ओढ़ के रह अपनी मांद में
अपनी ही आग से लिपट दहक रही है ज़िन्दगी

 
ओ री जिन्दगी
Pratibha Katiyar

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 निराशाओं के कितने ही अँधेरे
हारेंगे नहीं हम
किसी कीमत पे नहीं
कि तुझसे अपनी मोहब्बत जीकर निभाएंगे
गिले-शिकवे करने को भी
जीना तो जरूरी है न ?


फूल...
रश्मि शर्मा
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 खि‍ला हूं..नि‍हार लो...
कल मुरझाना ही है
वक्‍त रहते समेट लो
यादों में..ख्‍यालों में
हरदम खि‍ला ही रहेगा
रहती कायनात तक......


मेरी नज़रों में ऐसे ही कभी वो बे-खबर आता ...
Digamber Naswa
उसे मिट्टी की चाहत खींच लाई थी वतन अपने
नहीं तो छोड़ कर बच्चों को क्या कोई इधर आता
जिसे परदेस की मिट्टी हवा पानी ने सींचा था
वो अपना है मगर क्यों छोड़ के मेरे शहर आता


कुछ मिलावट लग रही है जहर में
सतीश सक्सेना
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तेरे जाने का यकीं दिल को नहीं
बेईमानी ही लगी , इस खबर में !
होश में जाना दिलाने याद कुछ
दम अभी बाकी बचा है, लहर में !


आज बस यहीं तक...
धन्यवाद।










5 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर चित्रों के साथ बढ़िया हलचल ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुन्दर पञ्च लिंक ... आभार मुझे शामिल करने का ...

    उत्तर देंहटाएं
  3. शुभ दोपहरी
    बढियां प्रस्तुतिकरण

    उत्तर देंहटाएं
  4. बढ़िया हलचल प्रस्तुति
    आभार!

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत बढ़ि‍या प्रस्‍तुति‍। मेरी रचना शामि‍ल करने के लि‍ए आपका धन्‍यवाद।

    उत्तर देंहटाएं

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