पाँच लिंकों का आनन्द

पाँच लिंकों का आनन्द

आनन्द के साथ-साथ उत्साह भी है...अब आप के और हमारे सहयोग से प्रतिदिन सज रही है पांच लिंकों का आनन्द की हलचल..... पांच रचनाओं के चयन के लिये आप सब की नयी पुरानी श्रेष्ठ रचनाएं आमंत्रित हैं। आप चाहें तो आप अन्य किसी रचनाकार की श्रेष्ठ रचना की जानकारी भी हमे दे सकते हैं। अन्य रचनाकारों से भी हमारा निवेदन है कि आप भी यहां चर्चाकार बनकर सब को आनंदित करें.... इस के लिये आप केवल इस ब्लॉग पर दिये संपर्क प्रारूप का प्रयोग करें। इस आशा के साथ। हम सब संस्थापक पांच लिंकों का आनंद। धन्यवाद एक और निवेदन आप सभी से आदरपूर्वक अनुरोध है कि 'पांच लिंकों का आनंद' के अगले विशेषांक हेतु अपनी अथवा अपने पसंद के किसी भी रचनाकार की रचनाओं का लिंक हमें आगामी रविवार तक प्रेषित करें। आप हमें ई -मेल इस पते पर करें dhruvsinghvns@gmail.com तो आइये एक कारवां बनायें। एक मंच,सशक्त मंच ! सादर

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मंगलवार, 27 अक्तूबर 2015

101.....तेरे और मेरे मध्य कौन सी थी रुकावट

सादर अभिवादन स्वीकारें
हमारे सहभागी कहते है
प्रतिक्रियाएँ दिखाई नहीं पड़ती

प्रत्यक्ष अनुभव भी मिला मुझे
2014 मे लिखा एक ब्लाग..

रचना पसंद आई..लिंक लिया
सूचना देने गई तो देखा
एक भी प्रतिक्रिया नहीं.....

पहली प्रतिक्रिया मेरे नाम दर्ज हुई... 
आज-कल की दुनिया मोबाईल में
समाई हुई है...

चलिए चलें आज की पसंदीदा रचनाओॆ की ओर.... 


नियति-चक्र
नही सुनती  
करबद्ध विनती,  
ज़िद्दी नियति !
लम्हों का सफ़र में... डॉ. जेन्नी शबनम  



पहला प्रेम
जिंदगी की पहली फुलपैंट जैसा
पापा की पुरानी पेंट को
करवा कर ऑल्टर पहना था पहली बार !
फीलिंग आई थी युवा वाली
तभी तो, धड़का था दिल पहली बार !

जिन्दगी की राहें में... मुकेश कुमार सिन्हा


शरद का चाँद बनकर ----
कुछ कागज में लिखी स्मृतियाँ
कुछ में सपने
कुछ में दर्द
कुछ में लिखा चाँद 

उम्मीद तो हरी है में...ज्योति खरे


तेरे और मेरे मध्य कौन सी थी रुकावट
दिन-रात जब आती थी तेरे कदमों की आहट
तब राह रोक खड़ी हो जाती थी मेरी ही घबराहट !
कहाँ तुझे बिठाना है, क्या-क्या दिखलाना है 

मन पाए विश्राम जहाँ में.....अनीता


किताबों की दुनिया
जब तुझे याद किया रंग बदन का निखरा
जब तिरा नाम लिया कोई महक सी बिखरी

शाख-ए -मिज़गां पे तिरी याद के जुगनू चमके
दामन-ए-दिल पे तिरे लब की महक सी बिखरी 

किताबों की दुनिया में ...नीरज गोस्वामी


उम्र भर हादिसों से गुज़रते रहे
इसलिए दूर हम आप सब से रहे

मछलियाँ हो गयीं अब सयानी बहुत
सब फिसलती रहीं हम पकड़ते रहे
अन्दाजे ग़ाफ़िल में चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ 


जानते हो ना तुम 
करने को बेबस का भला 
काटा जाता है बेबस का ही गला 
भूले से जब कभी जीत जाता है 
जो कोई बेबस 
तो समझो दूसरी ओर 
कोई बेबस ही हार कर 
सिसक रहा होगा। 
काव्य युग में...आशा ओझा पाण्डेय


इज़ाज़त दें यशोदा को
फिर मिलेंगे और मिलते रहेंगे







 


 



 




 

8 टिप्‍पणियां:

  1. शुभ प्रभात....

    सुंदर लिंकों का चयन किया है आपने....
    आभार आप का....

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत बढ़िया हलचल प्रस्तुति
    शरद पूर्णिमा के साथ ही वाल्मीकि जयंती की हार्दिक मंगलकामनाएं!

    उत्तर देंहटाएं
  3. सुंदर सूत्र संयोजन
    उत्कृष्ट प्रस्तुति ---

    मुझे सम्मलित करने का आभार
    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  4. सुंदर सूत्र..पांच से ज्यादा ही दिख रहे हैं..आभार मुझे इसमें शामिल करने के लिए..

    उत्तर देंहटाएं
  5. सुन्‍दर प्रस्‍तुति और आभार आपका मुझे यहां मुझै श्‍ाामिल करने के लिए

    उत्तर देंहटाएं
  6. इन सूत्रों में मुझे स्थान देने के लिए धन्यवाद.

    उत्तर देंहटाएं

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