पाँच लिंकों का आनन्द

पाँच लिंकों का आनन्द

आनन्द के साथ-साथ उत्साह भी है...अब आप के और हमारे सहयोग से प्रतिदिन सज रही है पांच लिंकों का आनन्द की हलचल..... पांच रचनाओं के चयन के लिये आप सब की नयी पुरानी श्रेष्ठ रचनाएं आमंत्रित हैं। आप चाहें तो आप अन्य किसी रचनाकार की श्रेष्ठ रचना की जानकारी भी हमे दे सकते हैं। अन्य रचनाकारों से भी हमारा निवेदन है कि आप भी यहां चर्चाकार बनकर सब को आनंदित करें.... इस के लिये आप केवल इस ब्लॉग पर दिये संपर्क प्रारूप का प्रयोग करें। इस आशा के साथ। हम सब संस्थापक पांच लिंकों का आनंद। धन्यवाद एक और निवेदन आप सभी से आदरपूर्वक अनुरोध है कि 'पांच लिंकों का आनंद' के अगले विशेषांक हेतु अपनी अथवा अपने पसंद के किसी भी रचनाकार की रचनाओं का लिंक हमें आगामी रविवार तक प्रेषित करें। आप हमें ई -मेल इस पते पर करें dhruvsinghvns@gmail.com तो आइये एक कारवां बनायें। एक मंच,सशक्त मंच ! सादर

समर्थक

सोमवार, 19 अक्तूबर 2015

इच्छा होती होगी फिर से युवा होने की...अंक तिरानबे

जैसे-जैसे
ब्लाग की उम्र
बढ़ती जा रही है
आप से आप

कड़ियों की संख्या भी
बढ़ती ही जा रही है
अपनी उम्र की तरह....


आज के अंक में पढ़िए कुछ नई-जूनी रचनाएं....


उफ़ अरहर की दाल ने,हाल किया बेहाल। 
दो सौ रुपया प्रति किलो,से ऊपर है दाल।



एक खत.....
तुम्हारे मन में भी 
ख्यालों का बवंडर उठता होगा 
बंद आँखों के सत्य में 
तुम्हारे कदम भी पीछे लौटते होंगे 
इच्छा होती होगी 
फिर से युवा होने की 
दिल-दिमाग के कंधे पर 
गलतियों की जो सजा भार बनकर है 


आज मैंने देखा सड़क पर
एक नन्हा सांवला बच्चा
प्यारा सा,, खाने की थाली में कुछ ढूंढ़ता हुआ
उस थाली में था भी तो ढ़ेर सारा पकवान .....
वहीँ पास उसकी बहन थी
जो एक सुन्दर से दिए के
साथ खेल रही थी .....


कल मैंने एक विदेशी दोस्त को दादरी घटना की थोड़ी डिटेल बताई  
दोस्त थोडा चोंका, फिर उसने जो जवाब दिया कसम से शर्म से सर झुक गया ..
उसका जवाब था.....तो भाई इसका मतलब यह हुआ की इंडिया में एक जानवर को माता कहा जाता है 
यानि हर नस्ल की माता,नागोरी, थरपारकर, भगनाड़ी, दज्जल, गावलाव,गीर, नीमाड़ी, इत्यादि इत्यादि,


दिल के किसी कोने मैं
हसरतें करवट बदलती है
नयी उमंगें उमड़ती है...
कुछ पुरानी लौ लगती है
सपनों को पंख, और
उम्मीदों को उम्र चढ़ती है


बचपन के स्मरण से नौरता का भूला सा गीत .....
चिंटी चिंटी कुर्रू दै
बापै भैया लातुर दै
गुजरात के रे बानियां
बम्मन बम्मन जात के
जनेऊ पैरें धात के
टींका दयें रोरी कौ
हार चड़ाबें गौरी खों


फट जाने दो गले की नसें
अपनी चीख से 
कि जीने की आखिरी उम्मीद भी 
जब उधड़ रही हो 
तब गले की इन नसों का 
साबुत बच जाना गुनाह है


हवा पर लिखा मैंने तेरा नाम
ले गयी उड़ाकर  हवा तेरा नाम
समंदर की रेत  पर लिखा  तेरा नाम
मिटा दिया लहरों ने हर बार  तेरा नाम

इस बार इतना ही
शतक से
सात कदम की 

दूरी पर हैं हम
आज्ञा दें यशोदा को

आज सुनिए
साज भी आवाज भी
















8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढ़िया लिंक के साथ ही बनारसी पान का जायका लिए मस्त गाना प्रस्तुति हेतु आभार!

    उत्तर देंहटाएं
  2. मेरी कविता शामिल करने के लिए बहुत धन्यवाद यशोदा जी। अन्य सभी लिंक्स के लिए धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  3. शामिल करने के लिए बहुत धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत खूब। सभी लिंक बहुत ही अच्‍छे हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  5. शामिल करने के लिए बहुत धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं

आभार। कृपया ब्लाग को फॉलो भी करें

आपकी टिप्पणियाँ एवं प्रतिक्रियाएँ हमारा उत्साह बढाती हैं और हमें बेहतर होने में मदद करती हैं !! आप से निवेदन है आप टिप्पणियों द्वारा दैनिक प्रस्तुति पर अपने विचार अवश्य व्यक्त करें।

टिप्पणीकारों से निवेदन

1. आज के प्रस्तुत अंक में पांचों रचनाएं आप को कैसी लगी? संबंधित ब्लॉगों पर टिप्पणी देकर भी रचनाकारों का मनोबल बढ़ाएं।
2. टिप्पणियां केवल प्रस्तुति पर या लिंक की गयी रचनाओं पर ही दें। सभ्य भाषा का प्रयोग करें . किसी की भावनाओं को आहत करने वाली भाषा का प्रयोग न करें।
३. प्रस्तुति पर अपनी वास्तविक राय प्रकट करें .
4. लिंक की गयी रचनाओं के विचार, रचनाकार के व्यक्तिगत विचार है, ये आवश्यक नहीं कि चर्चाकार, प्रबंधक या संचालक भी इस से सहमत हो।
प्रस्तुति पर आपकी अनुमोल समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक आभार।




Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...