नमस्कार ! पिछले सप्ताह कुछ व्यस्तता के कारण यहाँ आना नहीं हो पाया था .......प्रस्तुति के लिए ..यशोदा को हार्दिक आभार .... चलिए चर्चा करते हैं आज कुछ नए और कुछ पुराने लिंक्स की ....... वैसे तो चर्चा लगाते हुए कोशिश होती है कि पाठकों को सभी लिंक्स पसंद आयें ...... वरना हम चर्चाकार पूरी मेहनत करें और पाठकों को मज़ा न आये तो वही बात हो जाएगी ......
बड़का कक्का से रहा नहीं गया। पत्तल पर से उठ के गरजे, "जिसको खाना है सो खाइए और नहीं खाना है तो मुँह-हाथ धो के जाइए बैठिये जनवासा पर। हम लड़की वाले हैं...., नहीं कुछ कहते हैं ई का मतलब का सिर पे चढ़ के लघुशंका कीजियेगा..
कहावतें हमेशा ही बात को कहने का अलग तरीका है , इससे कम शब्दों में कुछ भी कहने का वज़न बढ़ जाता है .......लीजिये एक वजनदार रचना -----
हमने जो कहा पत्नी से एक कप चाय पिलाने को,
वो एक डोंगा दे गई मलाई से मक्खन बनाने को ।
अब हम बैठे बैठे चाय के इंतज़ार में भुनभुना रहे हैं,
एक घंटे से मलाई को गोल गोल घुमाए जा रहे हैं ।
अब यहाँ मक्खन बना या घी ये तो पढ़ने पर समझ आएगा लेकिन घर घर की कहानी है जो यहाँ कही गयी है ....
दोनों एक साथ ...
जी सच ही कहा की काम को कब मना किया ....... बस हर बात याद दिला दो ...... सारा काम मिल जुल कर हो जायेगा ....
इस बात में तो कोई दो राय नहीं कि काम को मना तो नहीं किया लेकिन अपने बलबूते पर काम हुआ भी नहीं .......अब मैं झूठ तो कह नहीं रही ......... वैसे तो आज कल बिना झूठ बोले काम भी नहीं चलता .......अच्छा सच्ची बताइए कि आपने क्या कभी झूठ नहीं बोला ? .... चलिए आप एक लेख पढ़ कर विचार कीजियेगा ...
आधुनिक समय में सफलता के लिए झूठ बोलना कितना ज़रुरी हो गया है! बच्चे इस ‘अनावश्यक ज्ञान’ पर बड़ों से सवाल-ज़वाब नहीं करते अन्यथा पलटकर एक बार ज़रूर पूछते कि क्या आप हमेशा ही सच बोलते हैं? अभी तक आप बिना झूठ बोले ही इतने आराम से गुज़र-बसर कर रहे हो?
वैसे आज भी हम बच्चों को यही सिखाते हैं कि सच बोलना चाहिए ...... कोशिश तो यही रहती है कि जीवन में अच्छी ही बातें धारण करें ....... और ऐसी ही सीख देती ये एक ग़ज़ल पेश है .......
शहर डूबा तो बारिश को सब ने दोष दिया ,
जिम्मेदारी तो इन्तजामों पर भी आती है |
खुद पर भरोसा हो तो चाहे जो काम करो ,,
डोरी सहारे की तो अक्सर टूट जाती है |
यहाँ तो बारिश से डूबे शहर की बात हो रही है तो दूसरी ओर सावन के महीने में बारिश की फुहारों का आनंद लिया जा रहा है ......
सोंधी-सोंधीं गंध उठे उपवन की महक निराली
इंद्रधनुष की आभा न्यारी खोल लटें बिखरा ली
गूँज उठे कजरी के धुन पड़े झूले नीम की डाली
जेठ की तपती गर्मी,स्वेद से मुक्ति सबने पा ली ।
सावन की रिमझिम हो और साथ में प्रेम या विरह न हो ऐसा मुमकिन नहीं लेखकों के लिए ....... मन में न जाने कहाँ कहाँ से भाव उमड़े चले आते हैं ...... ऐसा लग रहा है की प्रेम रोम रोम में बसा हुआ है ....
पुकार तुम्हारी गुदगुदाकर कहती है,
मेरी साँसों में बचा है प्रेम अब भी...।
प्रेम का एक रूप ये भी कि पति ये सोचता है कि वक़्त आने पर पत्नी भला कुछ कर भी पाएगी ? उसमें तो आत्मविश्वास ही ही नहीं ......... वैसे होता तो शायद यही है की पति ही पत्नी के आत्मविश्वास को पनपने नहीं देते ...... और वक़्त पड़ने पर वो क्या कर गुज़रती है पढ़िए इस कहानी में .....
कहानी में तो कुमुदनी खिल गयी ........ लेकिन कभी कभी खिलना तो दूर की बात अंकुरण भी नहीं हो पाता......
एक खूबसूरत ग़ज़ल पढ़िए ....
सबका हुनर शुमार में लाया न जाएगा.
हर बीज से दरख्त उगाया न जाएगा.
हर शख्स का नसीब बनाया न जाएगा.
ये जाम हर किसी को पिलाया न जाएगा.
यहाँ तो दरख़्त उगाने में संशय है और वहां गाँव में रहते रहते पेड़ तो क्या पूरा गाँव ही नहीं दिख रहा ...... अब ये व्यंग्य है या मर्मस्पर्शी रचना ........ आप पाठक ही निर्णय करें .....
जब कभी शहर से कोइ मित्र लौट कर रामफल से अपने पैसों और सफलताओं की नुमाईश करता कि
उसके पास मकान है, पैसा है, कार है...और तुम बताओ रामफल, तुम्हारे पास क्या है? तब गाँव की
जमीन को माँ का दर्जा दे उसकी सेवा में अपना जीवन समर्पित कर देने वाला रामफल, कुछ कुछ
दीवार फिल्म के शशी कपूर सा महसूस करता हुआ मुस्करा कर कहता कि मेरे पास माँ है!!
बात कर रहे हैं माँ की तो ज़रा देखिये की माँ के नाम से भी लोग कितना खिलवाड़ कर लेते हैं .
.......सच आज हर रिश्ते में जैसे स्वार्थ बस गया है ......पढ़िए एक लघु कथा ...
यह बच्चे हमारे पास भगवान का रूप है मिसेज सिन्हा , आप इन में से एक भी ले जायेंगी तो यह आपको दुआ देंगे , न जाने कौन कठोर हृदय इंसान है , जो इन नन्ही रूहों को यहाँ छोड़ जाते हैं । आप जैसी कुछ पुण्य आत्माएं इनका जीवन संवार देती है "।
अब ऐसी बातों से मन विचलित होना स्वाभाविक है .......... और इन बातों से ही क्यों ? ज़िन्दगी में न जाने कितनी बातें या कितनी घटनाएँ मन को परेशान करती रहती हैं ....... और हम विचार शून्य से हो जाते हैं ........ इतने की अपनी लेखनी को विराम देते हुए कह उठते हैं कि ----
आज ना चलती तनिक भी मन की
उपजे ना प्रीत का राग कोई !
विरक्त हृदय में अनायास ही
व्याप्त हुआ विराग कोई !
चैन नहीं आता पल को भी
देह -प्राण रहे रीत मेरे!
चलते चलते ........विश्व इमोजी दिवस के बारे में जानकारी
......... इसके बारे में मुझे भी आज ही पता
चला तो सोचा आपके साथ साझा कर लूँ शायद विचलित
मन को कुछ आराम आये ....
इमोजी का आशय स्मार्ट मोबाइल पर विस्तार में कुछ भी लिखने के स्थान पर एक संकेतक द्वारा अपनी सारी भावनाओं को उजागर कर देना है. इसकी बढ़ती लोकप्रियता और उपयोगिता को देखते हुए 17 जुलाई को दुनिया भर में विश्व इमोजी दिवस मनाया जाता है.
आशा है आपको ये प्रस्तुति पसंद आई होगी .......... फिर मिलते हैं अगले सोमवार को कुछ चुनी हुई पोस्ट्स के साथ ....... तब तक के लिए विदा ...... नमस्कार |
संगीता स्वरुप