प्रातःवंदन
मौसम की बदलती फ़िजा आजकल सुबह-शाम पर ही पता चलता है। हल्की ठंड की चादर ओढ़े भीनी- भीनी हवा और ओस की बूंद में भीगे पेड पौधे .. अच्छा लगता है न पर काली धुंध (प्रदूषण)..मतलब कुछ न कुछ रह ही जाता है..चलिए इन कवायदो को नजरअंदाज करते हुए नजर डालते हैं लिंको पर..✍️
सुख मिल जाये...
बस थोड़ा सा सुख मिल जाये
इसी आस में मन मानव का डोला करता
इधर-उधर जा निज शक्ति को तोला करता..
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चलते-चलते वे रुक गये।
मेरा हाथ पकड़कर उपदेशक के अंदाज में बोले :
“जीवन, चलने और चलते रहने का नाम है!…लेकिन ‘चलने’ से तात्पर्य सिर्फ ‘पैर’ नहीं है, ‘साँस’ भी है!”
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ख़ूब नचाता
साँसें न लेने देता
वक़्त का ये पहिया
सब बेज़ार,
ख़ुद पर भरोसा..
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लोकतंत्र आबाद रहेगा बरसों तक
रावण आज ज़रूर मरेगा, पगला है तू !
जब-जब पाप बढ़ेंगे भू पर ,प्रभु आएँगे
नेता उनका रूप धरेगा,पगला है तू !
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रेशम के
घूँघट में हँसकर
करे चाँदनी बात.
रंगोली की
आभा सुंदर
दीवाली की रात.
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।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह ' तृप्ति '..✍️

सुंदर अंक
जवाब देंहटाएंआभार
वंदन